रविवार, 12 मार्च 2017

अपने फैसले खुद क्यों नहीं लेता मुस्लिम समुदाय

बंटवारे के गुस्से ने तब देश के हिंदुओं और मुसलमानों में एक दूसरे के लिए नफरत भर दी थी। कुछ साल पहले तक देश के लिए मर मिटने वाले भारतीय अब हिंदू और मुसलमान दो खेमों में बंट चुके थे। आगे क्या हुआ, यह इतिहास है। जिन मुसलमानों को जिन्ना के टू नेशन थ्योरी पर यकीन नहीं था, उन्होंने कभी भी पाकिस्तान जाने की नहीं सोची। बाद में सियासी समीकरण इस तरह सेट किए गए कि कांग्रेस खुद को मुसलमानों की एकमात्र मसीहा पार्टी के तौर पर पेश करने में कामयाब रही। जनसंघ और फिर 90 के दशक में राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भी अपना परचम लहराया। कांग्रेस जहां भाजपा को मुस्लिम विरोधी साबित कर मुसलमानों का वोट बटोरने में कामयाब होती रही तो क्षेत्रीय पार्टियों ने भी जातिवादी और स्थानीय मुद्दों को हवा देकर सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान मुसलमानों की अगुआ बनी कांग्रेस ने समुदाय को कभी खुद अपने बारे में सोचने का मौका नहीं दिया। दंगे होते रहे पर सवालों के घेरे में हमेशा भाजपा को रखा गया। धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और फिर असहिष्णुता जैसे शब्दों के सियासी इस्तेमाल ने केवल नेताओं को जबरदस्त फायदा पहुंचाया। लेकिन मोदी के सत्ता पर काबिज होने के बाद काफी कुछ बदला है, जो शायद अब मुसलमानों को भी समझना होगा।

पहले 2014 का लोकसभा चुनाव और हाल में यूपी समेत पांच राज्यों में भाजपा की शानदार विजय। इसमें वैसे तो क्षेत्रीय पार्टियों समेत देशभर के नेताओं के लिए संदेश छिपा है पर सबसे ज्यादा अगर किसी समुदाय को सोचने पर मजबूर होना पड़ा है तो वह है देश का मुसलमान।

बाबरी मस्जिद की बात कर पार्टियों ने मुसलमानों को खुद फैसला लेने नहीं दिया और फिर गुजरात दंगों की याद दिलाकर पिछले डेढ़ दशक से उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। दंगों में दोनों समुदायों के लोग मारे गए, कोर्ट ने फैसला भी सुनाया पर मुसलमानों का हितैषी बनने के लिए नेता उस पर ही सवाल उठाते रहे।

दूसरी तरफ एक बड़ी बात जो गौर करने की है वो है यूपी में भाजपा द्वारा एक भी मुसलमान को उम्मीदवार न बनाना। भाजपा कह रही है कि टिकट देने में जिताऊ फैक्टर को ही केवल आधार बनाया गया। हिंदू-मुस्लिम के आधार पर लोगों को बांटकर टिकट नहीं दिए गए। हो सकता है यह सच हो पर मुसलमानों के लिए यह सोचने का वक्त है। अपने देश में 80 फीसदी हिंदू और करीब 14 फीसदी मुसलमान हैं और अगर एक पार्टी केवल हिंदुओं के बल पर चुनाव जीतकर सत्ता में आ जा रही है तो उनके प्रतिनिधित्व का क्या होगा। अल्पसंख्यकों के अपने मुद्दे हैं, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को बस चुनाव के समय उछाला जाता है पर क्या उसके आधार पर काम करने के प्रयास नहीं होने चाहिए। अगर भाजपा सबका साथ सबका विकास के फलसफे पर काम करना चाहती है तो उसे वोट देने पर फैसला मुसलमान खुद क्यों न लेता। क्या मुसलमान नहीं चाहते कि हर पार्टी में उनके प्रतिनिधि हों। वे पार्टियों की राजनीतिक गोटी बनने के बजाए खुद मैदान में क्यों न उतरे। जो पार्टी उनके हितों की बात करे उसे वे क्यों न वोट दें। पर अब तक होता यह आ रहा है कि जो पार्टी भाजपा को हराने में दमदार दिखती है, उसे ही मुसलमानों का वोट दिलवाने की कोशिश की जाती है इसमें उनके मौलाना व उलमा का भी बड़ा रोल रहता है। उनके ही कौम के नेता पुराना खौफ याद दिलाकर पूरी की पूरी जमात को भाजपा के विरोध में खड़ा कर देते हैं। इस बार यूपी में मुसलमानों की वोट वैसे भी खराब गई। भाजपा ने दलित-पिछड़ा समीकरण बिठाया, मुसलमान सपा के साथ चले गए और बसपा पीछे रह गई और जीत भाजपा की हो गई। क्या मुसलमान बस नेताओं को हराने जिताने की एक कड़ी भर हैं। उनके विकास का कोई मतलब नहीं।

मुसलमान खुद यह फैसला क्यों नहीं करते कि वे तुष्टीकरण में बंधे नहीं रहेंगे। भाजपा ने कभी ऐसा नहीं कहा कि वह हिंदुओं की पार्टी है, हां विपक्ष ने जरूर ऐसा प्रचारित किया। जब देश के मुसलमानों को टोपी पहनने, दाढ़ी बढ़ाने या फिर नमाज पढ़ने को धार्मिकता से जोड़कर देखा जाता है तो फिर जय श्री राम का उद्घोष, माथे पर तिलक या कीर्तन करना सांप्रदायिक कैसे हो गया। क्या मुसलमानों को यह बात समझ में नहीं आती है कि आपका वोट पाने के लिए कुछ मिनट के लिए नेता टोपी पहनकर पाखंड करते हैं। ये आपका विकास कभी नहीं करेंगे क्योंकि उनकी नीयत में खोट है। इससे अच्छा वो है जो तुष्टीकरण नहीं करता, हिंदू है तो माथे पर तिलक लगाकर आपसे मिलने आता है और आपके विकास की बात करता है। बाकी यह भी समझना होगा कि अच्छे या खराब, कट्टरपंथी या उदारवादी, आधुनिक सोच रखने वाले या दकियानूसी सोच में गिरफ्तार लोग हर देश में हर पार्टी, हर समाज में होते हैं और हमें सबके साथ सामंजस्य बिठाकर चलना होता है। इसमें डरने या डराने जैसी कौन सी बात है।

अपने देश में तो सबसे बड़ी ताकत हमारा संविधान है जिसने सभी को अपने धर्म का पालन करने और समानता के अधिकार से परिपूर्ण किया है। तो फिर ये अलगाव किसने क्या। यूपी में बिना मुसलमानों के सहयोग और उनके प्रतिनिधित्व के भाजपा का विजयरथ पर सवार होना मुसलमानों के लिए बड़ा संकेत है अब सोचना उन्हें है कि वे वोट बनकर रहना चाहते हैं या विकास की दौड़ में खुद भागीदार बनना चाहते हैं। अपने देश की विविधता का अद्भुत उदाहरण इस बार यूपी में देखने को मिलेगा जब हज यात्रा का कामकाज और अल्पसंख्यक विकास मंत्रालय का जिम्मा किसी हिंदू के पास होगा। यही तो हमारे देश की खूबी है। जय हिंद

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

समर्थकों की वाहवाही से नुकसान किसका है



दुनिया में लोकतंत्र का प्रादुर्भाव जनता के कल्याण के लिए हुआ था, जहां नुमाइंदगी के तौर पर राजनीतिक पार्टियां साधन मात्र थीं। यानी एक पार्टी या विचारधारा के लोग अगर अच्छा काम नहीं करते हैं तो जनता को यह अधिकार होगा कि वे अगले चुनाव में उनकी जगह दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप दे। अब आज के परिदृश्य पर लौटते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने अगर सबसे ज्यादा समय तक शासन किया तो अच्छाइयों के साथ उनकी खामियां भी गिनाई जाती है। भाजपा या एनडीए, जनता पार्टी आदि की सरकार के भी कमजोर पहलू को विपक्षी पार्टियां हमेशा उजागर करने की कोशिश करती हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक प्रणाली की अपनी खूबी है यहां सबको जनता की कसौटी पर खरा उतरना होता है। पिछले ढाई साल से देश में पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है। नरेंद्र मोदी के साथ विवाद गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल से ही जुड़े हैं। आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं और अपने आप में संस्थान हैं। दुनिया में उनसे देश की पहचान है। उनका हर अच्छा फैसला अगर उन्हें लोकप्रिय बनाएगा तो वहीं हर गलत कदम आलोचना के दरवाजे खोल देगा और इसके लिए पूरी सरकार और भाजपा को धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। 22 दिसंबर को बनारस के दौरे पर पीएम मोदी के भाषण ने उनके एक अलग तरह के व्यक्तित्व को सामने रखा है, जिसका विश्लेषण करने की जरूरत है। यह सवाल भी प्रासंगिक हो गया है कि क्या समर्थकों की वाहवाही या सभा में गूंजती तालियां बेहतर सरकार का प्रमाणपत्र हैं और क्या इससे जनता का कोई हित पूरा होता है या नहीं।

पहले भी सत्तारूढ़ और विपक्षी नेता एक दूसरे का उपहास करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। पर आज का माहौल ऐसा हो गया है कि जनता को हंसाने या तालियां बज उठने को अच्छी सरकार या अच्छा नेता मानने की भूल की जा रही है। यह एक तरह से पैमाना बनता जा रहा है, जिसकी बात पर जनता ज्यादा हंसे या नारेबाजी करने लगे वह सबसे लोकप्रिय और अच्छा नेता है। तब तो कपिल शर्मा को देश का प्रधानमंत्री बना देना चाहिए क्योंकि वे हर घर के लोगों को और रोज हंसाते हैं। दरअसल, नेता को किसी तीन घंटे के सिनेमाई हीरो से अलग रखकर देखने की जरूरत है। जिस दिन हम किसी कलाकार की तरह नेताओं के फैन हो जाते हैं हम अपना संभावित विकास होने की उम्मीद धो देते हैं। क्योंकि तब नेता सेलिब्रिटी और हम उसके साथ फोटो खिंचाने वाले या ऑटोग्राफ लेने वाले एक प्रशंसक मात्र बनकर रह जाते हैं। इसे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे एकपक्षीय शासन का खतरा बढ़ जाता है। नोटबंदी से जनता की परेशानी, किसानों की आत्महत्या, हवा में घुलता प्रदूषण, सड़कों पर बढ़ती गाड़ियां, आए दिन होते रेल हादसे, साफ पीने के पानी का संकट, बेरोजगारी जैसे गंभीर और प्रासंगिक मुद्दे गौण हो जाते हैं। बैठकबाजों, चाय की दुकानों, गली, नुक्कड़ पर नेता के हंसाने वाले भाषणों को ही चटकारे मारकर सुना और सुनाया जाता है। ऐसे में कोई विरोध करता है तो उस पर द्रोही होने का ठप्पा चस्पा कर दिया जाता है। यह गंभीर स्थिति है और इससे नेताओं का तो फायदा है पर जनता का नुकसान है। नेताओं की फैन फॉलोइंग नहीं उनके विकास को फॉलो करने की जरूरत है, जिससे लोकतंत्र का सार्थक परिणाम निकलकर सामने आएगा। भाषायी कलाबाजी को देखने सुनने के बजाए विकास के मुद्दों पर लौटने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का माखौल उड़ाया, इसमें कोई नई बात नहीं यह तो सभी पार्टियां करती हैं। पर पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के उदाहरण ने उनके राजनीतिक कद को छोटा कर दिया है। संसद में हंगामे की उन्होंने जिस तरह से एक जेबकतरे से तुलना की वह लोगों से तालियां बजवाने की उनकी ओछी कोशिश ही कही जा सकती है। आखिर प्रधानमंत्री या भाजपा यह बताने का कष्ट करेगी कि जिस सदन में पक्ष और विपक्ष के सांसदों पर चर्चा कर जनता के हित में कानून बनाने की अहम जिम्मेदारी है वहां प्रधानमंत्री नोटबंदी के मुद्दे पर भागते क्यों रहे। कांग्रेस या विपक्ष का संसद न चलने देने का रवैया भी सही नहीं था पर अगर प्रधानमंत्री रैलियों में नोटबंदी की बात कर सकते हैं तो संसद में क्यों नहीं। क्या वे सिर्फ अपनी बात रखना चाहते हैं। ऐसे में सभा या पार्टी मीटिंग में ही बोलने का विकल्प बचता है जहां उनकी बात को सुनकर तालियां बजाने के बजाए विरोध के स्वर नहीं उठेंगे। तब लोकतंत्र कहां रहा यह तो एकपार्टी शासन हो गया। नोटबंदी के फैसले से नरेंद्र मोदी, भाजपा या सरकार को ही फायदा होने जा रहा है ऐसा भी नहीं है, यह देशहित में लिया गया एक बड़ा प्रभावी कदम है पर जनता को ये तो अधिकार है कि वह सरकार से सवाल करे कि उसे लाइन में इस तरह क्यों परेशान किया जा रहा है। जनता की नुमाइंदगी सांसद करते हैं तो संसद में बहस तो होनी चाहिए थी पर न तो विपक्ष ने और न ही सरकार की ओर से इस दिशा में पर्याप्त प्रयास किए गए। नुकसान जनता के पैसों का हुआ। आखिर में यह मुद्दा सरकार और विपक्ष के बीच वर्चस्व की लड़ाई बनकर रह गया है।

जनता को इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गांधी ने बोलना सीख लिया या नहीं। वे अच्छा बोल पाते हैं या उनके बोलने से भूंकप आएगा या नहीं पर जनता को यह जानने का अधिकार है कि प्राइवेट बैंकों के एटीएम खाली क्यों पड़े हैं। राजधानी दिल्ली में कई एटीएम से 2500 की बजाए 2000 रुपये ही क्यों निकल रहे हैं। अगर कालाधन रोकने की यह पहल है तो 2000 के नोट क्यों छापे गए। विरोध और सवाल पूछना तो लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन जनता की तालियां बटोरकर इसका जवाब देने से बचने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री ने इसका एलान किया था तो उन्हें समर्थकों ही नहीं विरोधियों के बीच भी इस पर चर्चा करनी चाहिए थी।

वैसे भी, राजनीतिक तौर पर मोदी के बार-बार राहुल गांधी पर निशाना साधने से भाजपा का ही नुकसान हुआ है। अभी तक कांग्रेस पार्टी में दूसरे पायदान पर खड़े राहुल गांधी, मोदी को चुनौती देने वाले कांग्रेस के पहले नंबर के नेता बनकर उभरे हैं। जबकि पहले उनकी छवि ऐसे नेता की बन गई थी जिसकी बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी। राहुल ने अगर सीधे पीएम मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे तो मोदी सरकार या उनकी पार्टी को पीएम मोदी की तुलना गंगा से करने की बजाए जांच कमेटी बिठा देनी चाहिए थी या कम से कम मोदी सभा में अपनी सफाई में दो शब्द तो बोल ही सकते थे। ऐसा ही कुछ नोटबंदी से ठीक पहले बीजेपी के खातों में पैसे जमा होने के आरोप पर भी पार्टी और सरकार ने किया।  इसका मतलब यह हुआ कि वे जवाब देना या आरोप पर गंभीर होना जरूरी ही नहीं समझते। आरोप लगाना तो विपक्ष का काम है पर जनता के सामने सरकार को अपनी बेदाग छवि को साबित भी तो करना चाहिए।

अब जनता को ही समझना है कि विकास की बात करनी है, सरकार से जवाब मांगना है या फिर प्रशंसक बनकर तालियां पीटनी है। हां, अगर भ्रष्टाचार दूर होता है, गरीबी मिटती है, रोजगार बढता है, शिक्षा का स्तर सुधरता है, कालेधन के कुबेर उजागर होते हैं तो हम सभी को तालियां जरूर पीटनी चाहिए।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैश छोड़ कैशलेस होने में वक्त लगेगा

500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद पूरा देश लाइन में खड़ा है और बैंकों की गडि्डयां छापे में कहीं दीवाल से तो कहीं टॉयलेट से बरामद हो रही हैं। मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ क्रांतिकारी फैसला बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है तो वहीं ढाई साल तक सुस्त रहा विपक्ष मुद्दे को अच्छी तरह भुना लेना चाहता है शायद यूपी में कुछ फायदा हो जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचारी कौन है? जनता में छिपे लोग या तंत्र में शामिल नौकरशाह जिनके कंधों पर जिम्मेदारी सौंप कर प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म करने और कालाधन जुटाने की उम्मीद लगाए हैं क्योंकि जैसा माना जा रहा है कि बड़ी मछलियां तो नोटबंदी से पकड़ में नहीं आएंगी। 

दरअसल इस कवायद से तो और भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। खुलेआम बैंकों से नई करेंसी निकलकर धन्नासेठों के पास मिल रही है। गौर करने वाली बात तो ये है कि नए नोट आने के बाद आयकर विभाग को जैसे पंख लग गए हैं। ताबड़तोड़ छापेमारी और सभी में बड़ा पर्दाफाश। चर्चा तो ये भी है कि नई नोट में कुछ ऐसा है जो कालेधन के कुबेरों की सटीक लोकेशन दे रहा है क्योंकि इन्होंने तो पहले से ही पुरानी नोटें भी जमा कर रखी थीं तो अब तक पकड़े क्यों नहीं गए? दूसरी तरफ वो जनता है जिसके दिए कर से ही देश तरक्की करता है। इसमें कई वर्ग ऐसे हैं जो बिना कर दिए कमाई कर रहे हैं। इसमें छोटे व्यापारियों की तादाद काफी ज्यादा है। छोटे गांवों से लेकर, कस्बों और शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर ये दुकान चलाते हैं पर इनकी कमाई छिपी रहती हैं। पंजीकरण कराने मात्र से ये करदाता नहीं बनते और इनका धंधा फलता-फूलता रहता है। दिल्ली की अवैध बस्तियों में हजारों दुकानें हैं और गिनी-चुनी हैं जो बाकायदे टैक्स देते हैं। हो सकता है इस कवायद से उनकी पहचान हो और वे कर के दायरे में आएं। दूसरी तरफ ढाई लाख से थोड़ा ज्यादा पाने वाले कर्मचारी को सेविंग के दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। अंसगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की भी बड़ी तादाद है जिनके साथ कंपनियां छल करती आ रही हैं। प्राइवेट टीचर हो या सुरक्षा गार्ड उनसे दस्तखत ज्यादा वेतन पर कराए जाते हैं और सैलरी के नाम पर उन्हें नगद 8-10 हजार पकड़ा दिए जाते हैं। कैशलेस होने से पहले खातों में अनिवार्य सैलरी का नियम भी लाना होगा। 

सरकार का फैसला सही है या विपक्ष के तर्क? सच मानिए तो जनता इन सवालों के चक्कर में भ्रमित हो गई है। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में असहिष्णुता के बाद विमुद्रीकरण या नोटबंदी दूसरा शब्द है जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी। सोते-जागते बस एक ही सवाल जुबान पर है- पैसे कौन से एटीम में हैं। परेशानी तो है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है और सरकार के फैसले को भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता। 
सरकार कह रही है कि नोटबंदी कैशलेस इकॉनामी की दिशा में बड़ा कदम है। सच बात है पर क्या इतने बड़े फैसले से पहले कैशलेस होने के लिए छोटे फैसले नहीं लिए जाने चाहिए थे। इससे जो परेशानी एक साथ आ गई वो बंट जाती। नोटबंदी के बाद परेशानी बढ़ी तो राहत के लिए ऑनलाइन चार्ज कम कर दिए गए या खत्म कर दिए गए। ट्रेन की टिकट बुक कराने पर अब ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं देना पड़ रहा और बीमा के भी पैसे नहीं कट रहे। अच्छा होता यह काम नोटबंदी के पहले होता तो लोग ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आने को प्रोत्साहित होते। इसमें वक्त लग सकता था पर इसके लिए स्कूल के बच्चों से लेकर पंचायत घरों तक जागरुकता अभियान चलाया जा सकता था। 
सच मायने में नोटबंदी और कैशलेस इकॉनामी के बीच लंबी खाई है। नोटबंदी के बाद भी तो नोट उतने ही छापने पड़े तो नोट कम कहां हुए। ऐसे में नोट का इस्तेमाल तो चलता रहेगा। अब सरकार चार्ज कम कर, पेट्रोल-डीजल पर ऑनलाइन छूट, ऑनलाइन शॉपिंग व सरकारी लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए आगे आई है। यानी जबरन कैशलेस इकॉनामी नहीं बनाई जा सकती है, अब जो काम पहले किया जाना चाहिए था वो बाद में करना पड़ रहा है। कैशलेस होने से पहले आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। गांवों में बिजली के साथ इंटरनेट पहुंचाने की चुनौती है। शहरों में मोबाइल नेटवर्क की हालत किसी से छिपी नहीं है। कैशलेस के लिए इंटरनेट जनसामान्य तक पहुंचे वैसा साधारण टैरिफ प्लान कंपनियों के लिए अनिवार्य होना चाहिए और हो सके तो कुछ सेवाएं जैसे बिल भुगतान, ट्रेन-बस टिकट जैसे एप पर नेट की सुविधा फ्री दी जाए। इसके लिए छोटे से गांव से लेकर शहर के गली मोहल्लों में सार्वजनिक स्थानों पर फ्री वाई फाई की सुविधा देना एक अच्छा कदम होगा। इसके बाद ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि लोग नोट छोड़कर नेट इस्तेमाल करेंगे। 
वास्तव में बदलाव कोई भी हो हमेशा अपने साथ कुछ समस्याएं लाता है। सभी सुविधाएं देने के बाद भी थोड़ी दिक्कत होगी क्योंकि एक ढर्रे पर चलने वाला व्यक्ति बदलाव के लिए खुद को जल्दी तैयार नहीं कर पाएगा, लेकिन फायदे बतलाकर उसे इस प्लेटफार्म पर अवश्य खींचा जा सकता है। जिस देश में आज भी कई गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। नेता, मंत्रियों के गांवों को छोड़ दें तो यूपी के गांवों में 24 घंटे बिजली अभी सपना है। बैंक न जाना पड़े इसलिए लोग जहां गुल्लक भरते हों उनसे ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे नोट की कमी से झट से स्मार्टफोन लेकर कैशलेस काम करना शुरू कर देंगे। शहरों के युवा तो पहले से ही टेक्नॉलाजी को स्वीकार कर काफी हद तक कैशलेस हो गए हैं। देश में बड़ी आबादी उनकी भी है जिनके पास फोन नहीं है, वे कैशलेस इकॉनामी का हिस्सा कैसे बनेंगे? इस पर विचार किए बिना ही अचानक नोटबंदी का फैसला थोड़ी जल्दबाजी ही लगता है। 

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

तो क्या सेक्युलर बनने के लिए राम को भूलना होगा

प्रधानमंत्री मोदी को लेकर नया विवाद दशहरे के दिन लखनऊ में रामलीला के मंच से जयश्रीराम के उद्घोष से जुड़ा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल कह रहे हैं कि इससे साबित हो गया है कि मोदी और भाजपा सांप्रदायिक हैं। मोदी कभी टोपी क्यों नहीं पहनते। देश के प्रधानमंत्री को ऐसा बरताव करना चाहिए जिससे अल्पसंख्यकों को उनसे जुड़ाव महसूस हो। विपक्ष का तर्क है कि मोदी का राम का नाम लेना दरअसल यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर खेला गया ध्रुवीकरण का दांव है। पर सवाल यह उठता है कि क्या दशहरे पर रावण के संहारकर्ता प्रभु राम के दर्शन को उमड़े भक्तों के समक्ष पीएम को अल्ला हू अकबर कहना चाहिए तो विपक्ष को लगता कि देखो पीएम सेक्युलर व्यक्ति हैं। ये दलील जितनी खोखली लगती है उससे ज्यादा हास्यास्पद भी है। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें सपा के एक बड़े नेता यानी चाचाजी भगवान राम से अपना माल्यार्पण करवा रहे हैं तो क्या मोदी को भी ऐसा ही कुछ करवाना चाहिए था तो विपक्ष समझता कि मोदी सेक्युलर हैं। वैसे मोदी कुछ भी कहते, लखनऊ नहीं शिमला या मेघालय भी चले जाते फिर भी विपक्ष ऐसे ही दगे कारतूसों जैसे मुद्दों की ओर लपकता, क्या यही विपक्ष की भूमिका बची है।
सनातन धर्म के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम विष्णु के अवतार हैं। वे कण कण में हैं, जन जन में हैं। उनका स्मरण मन को शांति और व्यक्ति को धर्म और सच्चाई की ओर ले जाता है और जब मौका विजयादशमी का हो तो राम नाम की महिमा और भी बढ़ जाती है तो फिर इतना हंगामा क्यों। क्या कांग्रेस, सपा समेत विपक्ष मोदी के एक उद्घोष से सहम गया है। लोग उन्हें कट्टर हिंदूवादी बता रहे हैं। संविधान में देश के हर एक शख्स को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है तो क्या पीएम को सेक्युलर दिखने के लिए राम नाम भूल जाना चाहिए। अगर सेक्युलर की कोई नई परिभाषा बनाई गई हो तो फिर संसद मैं बैठने वाले नेताओं, सरकारी अधिकारियों और हर उस व्यक्ति का जो जनता से जुड़ा हो, ड्रेस कोड होना चाहिए। चाहे सबको काला कपड़ा पहना दो, सफेद, धानी, हरा, पीला कोई भी जिस रंग को विपक्ष सेक्युलर मानता हो क्योंकि भगवा और खाकी तो शामिल नहीं करना चाहेंगे। सख्त गाइडलाइन जारी की जाए कि कोई हिंदू माथे पर तिलक लगाकर या पीला कपड़ा लपेटकर नहीं आएगा। कोई मुस्लिम दाढ़ी बढ़ाकर या टोपी पहनकर नहीं आएगा। इसी तरह सिख और ईसाइयों के लिए भी निर्देश का पालन करना अनिवार्य हो क्योंकि नेताओं को जनता के सामने सेक्युलर दिखना है। अगर ऐसा होता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए कम से कम धर्म के नाम पर बाजीगरी तो बंद होगी और धर्म के ठेकेदार भी कुछ कम हो जाएंगे।

दरअसल विवाद की मूल में नेताओं का जनता के समक्ष किया जाने वाला पाखंड है। कोई खुद को समाजवादी, कांग्रेसी या कोई और नैतिकता व धर्मनिरपेक्षता को आदर्श मानने वाली पार्टी का बताके कुछ मिनट के लिए सिर पर टोपी रख ले तो उसे महान सेक्युलर होने की उपाधि दे दी जाती है। जबकि वास्तव में यह वोट पाने के लिए नेताओं द्वारा किया जाने वाला ढोंग होता है। और ये एक बार कोई एक नेता नहीं हर साल हर त्योहार पर होता है पर लोग उन्हें अपना तारणहार समझने की भूल कर बैठते हैं। इसी तरह जनता उनसे काम का हिसाब मांगने नहीं जुटती अगर ऐसा होने लगे तो जनता ढकोसला बंद करके काम करने लगेंगे। ये तो वही बात हुई जैसे कांग्रेस के एक बड़े नेता दिल्ली से जाकर यूपी में दलित के घर रोटी खाते हैं और तस्वीर दूसरे दिन अखबारों के पहले पन्ने पर होती है बाद में पता चलता है कि बर्तन तो कोई और लेकर आया था, खाना भी शायद कहीं और पका था बस घर दलित का था। सच्चाई क्या है राम जाने या वो जाने जिसे विपक्ष कहे।
इसी तरह समाजवादी पार्टी के बड़े नेता गरीबों के साथ टाट पर बैठकर भोजन करते दिखते हैं। गुणगान ऐसे किया गया जैसे वे गरीबों से बहुत ही गहराई से जुड़े हैं जबकि तस्वीरें देखिए जो प्रकाशित हुईं, टाट पर बैठे साहब और दाहिनी तरफ बच्चे को गोद में ली भोजन करती गरीब महिला के बीच छुआछूत को दर्शाने वाली दूरी आसानी से समझ में आती है। गंभीर सवाल यह है कि क्या जनता इस तरह के पाखंड से छली नहीं जा रही। क्या सच्चाई जनता के सामने नहीं होनी चाहिए। सेक्युलर दिखाने के लिए ढोंग क्यों।
कोई कह रहा है कि लखनऊ ही क्यों। इस सवाल का जवाब या तो यूपी चुनाव हो सकता है या फिर बीजेपी के लोग जानें पर ऐसा नहीं लगता कि सरकार भी चाहती है विपक्ष ऐसी ही बेसिर पैर की बातों को उछाले और चैनलों, अखबारों में इसी पर बहस होती रहे। इससे तो सत्ता पक्ष का ही फायदा हो रहा है। दो साल बताने में गुजर गए कि हम करने जा रहे हैं अभी तो आएं है समय तो दीजिए। आखिरी के दो साल ये बताएंगे कि शुरूआत कर दी है असर देखने के लिए अगली बार फिर जिताइए। क्या गजब का समीकरण है सत्ता और विपक्ष का।

वास्तविकता यह है कि देश में बहुसंख्यक हिंदू करीब 80 फीसदी हैं और जम्मू से लेकर केरल तक राम का नाम रखने वाले लोग आपको मिल जाएंगे। संसद में ही दो दर्जन से ज्यादा सांसदों के नाम राम पर हैं। वो चाहे राम विलास पासवान हो या सीताराम येचुरी। सुबह हमारी राम राम से होती है। ये नेता नहीं समझेंगे कि हमारे गांव में कोई मुसलमान सुबह जब हिंदू से मिलता है तो राम राम कहता है और हिंदू जब बुजुर्ग मियांदीन से मिलता है तो सलाम चच्चा कहता है।  ये लोग राम के नाम पर खाई पैदा कर रहे हैं।

अगर ऐसे ही नेता मानसिक दिवालियापन का शिकार होते रहे तो देश अजीब सी मुसीबत में फंस जाएगा। क्योंकि जब सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना और सरकार से सबूत की मांग की जा सकती है तो कल को कोई यह भी कह सकता है कि हम कैसे मानें कि आप सेक्युलर हैं सबूत दीजिए। इस परिस्थित से बचने के लिए नेताओं को धर्म, जाति के खांचे से राजनीति को बाहर निकालकर विकास के गलियारे में पहुंचाना होगा। जहां किसी से उसका धर्म, जाति, जयघोष नहीं उसका काम पूछा जाए।
जयश्रीराम के उद्घोष पर भड़के नेता क्या यह बताने का कष्ट करेंगे कि हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और इतिहास कहता है कि सेक्युलर भी पर क्या हमें अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए राम को भूलना होगा। अगर ऐसा है तो फिर धर्मनिरपेक्षता कहां बची। जय श्री राम। 

सर्जिकल स्ट्राइक: फर्ज निभाइए, गुणगान इतिहास करेगा

पीओके में हमारी फौज ने सर्जिकल स्ट्राइक क्या की बीजेपी के लिए जैसे देश की सभी समस्याएं दूर हो गईं।भारतीय जवानों ने बड़ी बहादुरी से अपने फर्ज को निभाया पर नेता ऐसे बातें करने लगे जैसे वे खुद कंधे पर बंदूक रखकर आतंकियों का सफाया करके आए हों। देश की सुरक्षा जवान करते हैं, दुश्मनों से लोहा भी वही लेते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक में सरकार की भूमिका सख्त फैसले लेने की दृढ़ इच्छाशक्ति के तौर पर सामने आई पर इसका श्रेय लेने की जो छटपटाहट पूरी सरकार में देखी गई वह बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने सेना की बहादुरी के रुतबे को भी घटाने का काम किया है जो बिना कहे पूरे देश में महसूस की जा रही थी। इसके बाद सियासी पार्टिंया अपने अपने तरीके से एक सर्जिकल स्ट्राइक की बार बार सर्जरी कर रही हैं। इससे जवानों के मनोबल पर भी असर पड़ता है। सवाल यह है कि देश की सुरक्षा को लेकर की गई किसी भी कार्रवाई का श्रेय लिया जाना क्या जायज है। क्या इस बात का गाल पीटना सही है कि देखो हमने कर दिखाया जबकि दूसरी सरकारें नहीं कर सकीं। उस पर केजरीवाल, राहुल गांधी, ओम पुरी, सलमान खान और दूसरे लोग ऐसा बोल गए जो पाकिस्तान में उन्हें भले ही हीरो बना दे पर देश में उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जो कल खतरा बनने वाले हैं, उन्हें उनकी जगह पर जाकर मारने की ऐसी कार्रवाई अमेरिका, इस्राइल समेत कई देश कई बार कर चुके हैं पर शायद ही अपने मुंह इतना गुणगान किए हों। सरकार और सेना की ओर से एक दिन बाद ही खुलेआम घोषणा करना अपने आप में एक चौंकाने वाला कदम था। पर इसके पीछे एक सटीक कूटनीति काम आई। सर्जिकल स्ट्राइक ऐसे समय की गई जब पठानकोट के बाद उड़ी हमले से दुनिया का ध्यान पाक प्रायोजित आतंकवाद पर केंद्रित हुआ था। यूएन में नवाज शरीफ हिजबुल कमांडर बुरहान वानी को शहीद बताकर बुरे फंसे। बची कसर सुषमा स्वराज ने पाक को बेनकाब कर निकाल दी। इस तरह से पाक अपनी ही जाल में फंस चुका था। ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला नहले पे दहला वाला कदम साबित हुआ। पाक को समझ में ही नहीं आया कि वह हां बोले या ना क्योंकि उसे पता था कि वह जो भी बोलेगा, फंसेगा। यह उस समय पैदा हुए पाक विरोधी माहौल का ही असर था कि दुनिया के किसी भी देश ने खुलकर सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध नहीं किया।

दिल्ली में ढाई साल पहले आई नई सरकार ने इस स्ट्राइक से पाक और आतंकियों को दो टूक संदेश दिया कि अब और आतंकवाद को सहन नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ कूटनीतिक तौर पर भी पाक भारत के चक्रव्यूह में घिर गया। आतंकवाद को आश्रय देने का उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया। आठ देशों के संगठन सार्क के सदस्य अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान ने तो खुलकर भारत का समर्थन किया। इतना ही नहीं, अमेरिका ने भी पाक को ही आतंक पर नकेल कसने की नसीहत दे डाली। रूस, सिंगापुर, यूरोपीय संघ समेत दुनिया के प्रमुख देशों ने भारत की कार्रवाई को जायज ठहराया। इससे पाक अलग-थलग पड़ गया।

उधर, भारत में सर्जिकल स्ट्राइक ट्रेंड करने लगा। चैनलों पर जंग छिड़ गई और अखबारों में पन्ने भरने लगे। सीमा पर गांव खाली हो गए, लोगों ने तंबुओं में शरण ली। पर सेना सीमा पर डटी रही। अच्छा होता कि डीजीएमओ की घोषणा के बाद स्वागत, जश्न सब कुछ होता पर श्रेय लेने की होड़ न मचती। वैसे भी कहावत में अपने मुंह अपनी बड़ाई से बचने की बात आती है। पर शायद सियासी लोग आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर समीकरण बैठाने में इतने मशगूल थे कि इसका ख्याल ही नहीं आया।

परदे पर शहीद जवान के पिता का किरदार बखूबी निभाने वाले ओम पुरी कह देते हैं कि सेना में किसी ने जबरी तो नहीं भेजा था। सलमान कहते हैं कि पाक कलाकार आतंकी नहीं होते जबकि ऐसी बात तो कही नहीं जा रही थी कि पाक कलाकार आतंकी होते हैं। सवाल सिर्फ इस बात का था कि जब लंदन, पेरिस में धमाके होने पर पाक कलाकार सोशल मीडिया पर आंसू बहाते हैं और हमले की निंदा करते हैं तो भला जिस देश में उनका गुजारा हो रहा है वहां दहशतगर्दी के खिलाफ वे क्यों कुछ नहीं बोलते। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें देश से बाहर भेजने की बात कही जा रही थी पर जब पाक कलाकारों ने चुप्पी साध ली तो जनभावना उनके खिलाफ हो गई, जिसका फायदा उठाकर हिंदूवादी संगठन मैदान में आ गए। कला संस्कृति शांतिकाल में दोनों देशों के लोगों को जोड़ने प्यार मोहब्बत बढ़ाने का एक जरिया हो सकता है पर उस देश के साथ नहीं जो भारत पर लगातार बुरी नजरें गड़ाए हुए हैं। उसका शांति का प्रेम महज एक छलावा है और वहां के नागरिक अपने देश से अलग कैसे हो सकते हैं।

कांग्रेस पार्टी कह रही है कि हमने पहले भी कई बार सर्जिकल स्ट्राइक की थी, पर श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। जो भी हो दुनिया में हमें पाक को अलग-थलग करने में कामयाबी मिलती दिख रही है पर देश में हम अजीब सा रायता फैलता देख रहे हैं। पाक को मुंहतोड़ जवाब देना है तो जंग से नहीं कूटनीति ही काम आएगी और इसके लिए देश को एकजुट होकर निस्वार्थ भाव से संगठित रहना होगा।

सियासतदानों को कम से कम जवान को राजनीति से दूर रखकर ही बात करनी चाहिए तभी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को दमदार तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। अन्यथा पर हम खुद ही अपना काम बिगाड़ लेंगे।सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने से बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है।

गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों को तो जैसे सरकारों और नेताओं ने मान ही लिया है कि इसे कभी भी सौ प्रतिशत पूरा नहीं किया जा सकता है तो फिर मुद्दे की तलाश में भटकते रहते हैं। भविष्य में भी ऐसे मौके आएंगे पर उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां देश और देश की सुरक्षा की बात हो वहां कोई पार्टी, नेता या सरकार अपना गुणगान करने से बचें। इसके लिए इतिहासकार हैं ना, जो उनकी भूमिका को जरूर महत्व देंगे।

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

पाक में भारत और भारत में पाक बिक रहा है


लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने बलूचिस्तान के लोगों की चर्चा क्या की पाकिस्तान बौखला गया। हो भी क्यों न, भारत ने पहली बार दुनिया के किसी देश में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर वहां की हुकूमत के खिलाफ खुलेआम अपनी बात रखी है। अब तक भारत ऐसे मामलों में तटस्थ रहा था। तो क्या मोदी सरकार ने पाक को लेकर नीति बदली है? क्या सरकार कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की हरकत का मुहंतोड़ जवाब देने के लिए बलूचिस्तान मसले को उछालना चाहती है? क्या वाकई 1971 की घटना दोहराई जाएगी? आखिर भारत सरकार के इस बदले रुख के निहितार्थ क्या है?

कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा था कि हम दुश्मन को तीन तरीके से काउंटर कर सकते हैं। पहला तरीका डिफेंसिव मोड का है। इसमें हम चारों तरफ सुरक्षा कड़ी करते हैं और जो भी दहशतगर्द आता है हम उसे वहीं ढेर कर देते हें। दूसरा मोड डिफेंसिव अफेंस का है यानी हम उस जड़ तक पहुंचते हैं जहां से समस्या पैदा हो रही है और हम उसका इलाज करते हैं। और तीसरा मोड ऑफेंसिव मोड का है जिसमें हम बाहर जाकर कार्रवाई करते हैं। परमाणु ताकत ऑफेंसिव मोड में एक बड़ी चुनौती है पर डिफेंसिव अफेंस में कतई नहीं। फिलहाल भारत डिफेंसिव मोड में पाक से निपट रहा है अगर हम डिफेंसिव अफेंस में आते हैं तो पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने के लिए हम आर्थिक, सामाजिक, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे अलग-थलग करने के अलावा उसके आतंकवाद प्रेम को उजागर करने के साथ ही आंतरिक अस्थिरता जैसे तमाम पहलुओं पर काम करेंगे। पाक की अफगान नीति को भी काउंटर करेंगे। वास्तव में मौजूदा डिफेंसिव मोड में भारत पर पाक की ओर से 100 साजिशें हो रही हैं और हम 90 नाकाम करने में सफल रहे हैं पर 10 फिर भी हमें नुकसान पहुंचा रही हैं। हम यह भी समझते हैं कि सभी पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है। पाकिस्तान को जब यह पता चलेगा कि भारत डिफेंसिव मोड छोड़कर डिफेंसिव अफेंस मोड में आ गया है तो वह बचने की कोशिश करेगा। पूरी दुनिया को पता है भारत की तुलना में पाकिस्तान में हमले करना या उसे निशाना बनाना कहीं ज्यादा आसान है। डोभाल ने सख्त लहजे में साफ कहा कि ऐसी स्थिति में अगर पाक एक मुंबई हमला करवाता है तो वह बलूचिस्तान से हाथ धो बैठेगा। इसमें कोई परमाणु ताकत शामिल नहीं होगी और न ही सैन्य शक्ति को इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ेगी। इस कार्यक्रम का वीडियो पाक मीडिया में अक्सर दिखाया जाता है। तो क्या बलूचिस्तान का समर्थन डोभाल मोड की देन है?

ऐसे में क्या यह समझा जाए कि भारत ने पाकिस्तान को लेकर डिफेंसिव अफेंस मोड अपना लिया है और अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। इधर, कश्मीर में भी सेना ने सख्त रुख बरकरार रखा है। पैलेट गन यानी छर्रे से घायल लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही हैं। कुछ लोग इसे बेहद शर्मनाक करार दे रहे हैं। उनका सवाल है कि कश्मीर में समस्या है तो उसका निपटारा करने के लिए अपने ही नागरिकों के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार क्यों। इससे तो आग और भड़केगी।

दरअसल हमें यह समझना होगा कि सैनिक जानबूझकर अपने ही देश के नागरिकों पर पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं कर रहे। वे यह समझते हैं कि सख्ती से अलगाववादियों का ही फायदा होगा। पर भड़काए गए युवाओं की पत्थरबाजी और ग्रेनेड हमलों के कारण मजबूरन उन्हें ऐसा करना पड़ता है। सीआरपीएफ ने भी कोर्ट में कहा है कि जानमाल का नुकसान न हो इसीलिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर इस पर रोक लगाई गई तो मुश्किल हालात में सैनिक गोली चलाने को मजबूर हो जाएंगे और ज्यादा लोगों की जान जाएगी। तो सवाल उठता है कि इस समस्या का समाधान क्या है। लोकतंत्र में बड़ी से बड़ी समस्या का राजनीतिक समाधान है। अगर कश्मीर से निकले आईएएस, इंजीनियर, प्रोफेसर, सिविल सोसाइटी के लोग, स्थानीय सरपंच और नेता घर-घर जाकर बात करें। जिन्होंने अपनों को खोया है उनके घाव पर मरहम रखें और यह समझाएं कि हिंसा समस्या का समाधान नहीं है। अगर ऐसा होता तो अपनी ही जमीन से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडितों ने हथियार उठा लिए होते पर उन्हें विश्वास है कि आज नहीं तो कल घाटी की हवा बदलेगी। जिस झड़प में 66 कश्मीरी मारे गए हैं उसमें सेना के पांच हजार से ज्यादा जवान घायल भी हुए हैं। कश्मीर को पाक दहशतगर्दों  के आतंक से बचाने के लिए हजारों जवानों  ने सर्वोच्च बलिदान दिया है।

सेना का काम ही शांति कायम रखना है और अगर इसमें कोई रुकावट पैदा करेगा तो उससे सख्ती से ही निपटा जाएगा। आम कश्मीरी को यह समझाना होगा कि अलगाववादी उनके हमदर्द नहीं हैं वे तो उस मौकापरस्त की तरह हैं जो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए दूसरे के घर में आग लगाकर खुद को बचाता है। इनके बच्चे विदेश में अच्छी तालीम हासिल करते हैं जबकि आम कश्मीरी युवा इनके बहकावे में मजहब और तहरीक के नाम पर हथियार उठा लेते हैं। पाकिस्तान की शह पर अलगाववादी लोगों को मरने-मारने के लिए उकसा रहे हैं। तहरीक के नाम पर देश में ही बैठकर ये चंद फिरकापरस्त लोग भारत विरोधी साजिश में जुटे हैं और यह काम कई वर्षों से चल रहा है पर सरकार और खुफिया एजेंसियों ने इस पर तत्परता नहीं दिखाई। आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि खुलेआम कश्मीरी युवा सड़कों पर उतरकर सेना के जवानों को चुनौती दे रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार भी सवालों के घेरे में है। यह ठीक है कि घाटी में केंद्र सरकार के निर्देश पर कार्रवाई हो रही है पर राज्य सरकार को अपने स्तर पर मामला शांत कराने की पहल तो करनी चाहिए। आखिर वे सीधे तौर पर वहां के लोगों से जुड़े हैं। सैन्य कार्रवाई तो आखिरी विकल्प होना चाहिए। केंद्र के मंत्री भी जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे रख पाकिस्तान के ही इर्द-गिर्द बात कर रहे हैं। पाक हमारे लिए चुनौती है वह कश्मीर को लेकर नई-नई चाल चल रहा है पर हम उसी को लेकर सिर्फ सियासत करेंगे तो देश को पीछे ही धकेलेंगे। पाकिस्तान में तो ऐसा ही हो रहा है, बेरोजगारी, भुखमरी, बिजली की कर्मी, पानी और स्वास्थ्य की समस्या से पीछा छुड़ाने के लिए पूरी हुकूमत कश्मीर की माला जप रही है और वहां के कट्टरपंथियों का खून उबाल मारने लगता है। मोदी सरकार एक तरफ तो दोस्ती के हाथ बढ़ा रही है तो दूसरी तरफ बयान बहादुर लोग एक पर 10 गोलियां मारने की बात करते हैं। जनता में भी गुस्सा बढ़ता है पर इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। पाकिस्तान पर भरोसा खुद को ठगने जैसा है और यह हम बंटवारे के बाद से ही देखते आए हैं। ऐसे में भारत सरकार को पाक को लेकर एक सख्त नीति कायम रखनी होगी।

भारत के समर्थन से बलूचों को फायदा यह होगा कि इस मसले की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देने लगेगी। बाकी 1971 की घटना को दोहराना आसान नहीं है। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है और वहां कट्टरपंथियों, आईएसआई और आतंकियों की चलती है तो उससे संयम की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बेहतर यह होगा कि मोदी सरकार कश्मीर में राजनीतिक समाधान की ओर बढ़े और बलूचों के लिए कूटनीतिक तरीके से ही समर्थन जारी रखे। हमारा पूरा फोकस कश्मीर में जवानों और नागरिकों की मौत का सिलसिला रोकने पर होना चाहिए। हमें कश्मीर का समाधान बलूचिस्तान में नहीं ढूंढना चाहिए वरना पाकिस्तान को भी कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का मौका मिल जाएगा। 

कभी कभी तो लगता है कि दोनों अोर सियासत चल रही है। पाकिस्तान में भारत और भारत में पाक बिक रहा है। खरीदने वाली जनता है जो हकीकत से काेसों दूर बस उकसावे पर फैसले कर लेती है।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

धर्मांधता की छांव में पांव पसार रहा कट्टरपंथ


धर्म हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाता है पर खुद को मुसलमान कहने वाले कुछ भटके हुए लोग इस्लाम के नाम पर लोगों का खून बहा रहे हैं। हाल में इनकी क्रूरता ‌का शिकार बांग्लादेश हुआ है। यहां एक कैफे में घुसकर हमलावरों ने कुरान की आयतें न पढ़ पाने वाले गैर मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा। वैसे तो यहां पहले से ही कुछ कट्टरपंथी संगठन और पार्टियां सक्रिय हैं पर शेख हसीना की सरकार में इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में थोड़ी कामयाबी मिली। मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने वालों को फांसी पर लटकाए जाने से भड़के कट्टरपंथियों ने
अब आतंकवाद को आयातित करना शुरू कर दिया है। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट भी दक्षिण एशिया में पांव पसारने की कोशिश में है, ऐसे में गरीब और धर्म के नाम पर उकसाए गए कुछ बांग्लादेशी युवा उनके बहकावे में आ रहे हैं। देश का पहला बड़ा आतंकी हमला इसी का परिणाम है। हसीना सरकार की बड़ी नाकामी यह है कि महीनों से हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की हत्याएं हो रही हैं पर उन्होंने शायद राजनीतिक हित साधने के लिए आंखें मूद रखी थीं। जब बड़ा हमला हुआ तो उनको देश के हमलावरों को धिक्कारते हुए कहना पड़ा कि आप कैसे मुसलमान हैं।

वैसे, हसीना की पार्टी धर्मनिरपेक्ष है इसीलिए 1953 में ही बांग्लादेशी आवामी लीग ने अपने नाम से मुस्लिम शब्द हटा दिया था पर आज इससे अल्पसंख्यकों की रक्षा होने वाली नहीं है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय कट्टरपंथियों के निशाने पर है। युवाओं के तेजी से कट्टरपंथ और हिंसा की राह पकड़ने की मूल वजह को हमें समझना होगा। दरअसल, युवाओं में भड़काई गई धर्मांधता उन्हें दूसरे धर्म के लोगों को दुश्मन मानने को मजबूर कर देती है। इस आग में घी डालने का काम करते हैं धार्मिक उपदेशकों के अस्पष्ट और एकतरफा भड़काऊ विचार। वैसे, रिलीजियस प्रीचर हर धर्म के होते हैं, जिनका काम धर्म की अच्छाइयों का प्रचार प्रसार करना होता है। पर ढाका हमले में आतंकियों के विवादास्पद भारतीय मुस्लिम धर्म प्रचारक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित होने की खबरें सामने आने के बाद इस पर बहस होनी चाहिए कि ऐसे लोगों की समाज में भूमिका क्या है और क्या होनी चाहिए। नाइक कई सालों से देश-विदेश में बड़ी-बड़ी सभाओं में मुस्लिम धर्म का गुणगान कर रहे हैं। इसमें किसी को भी समस्या नहीं होनी चाहिए पर इन सभाओं में उनके तीखे बोल युवाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं इस पर बहस की जा सकती है।

एक सभा में गैर मुस्लिम युवक ने मुस्लिम और आतंकवाद पर सवाल पूछा। आतंकवाद को सिरे से खारिज करने की बजाए नाइक बतलाने लगे कि मेरी नजर में सबसे बड़े आतंकी अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। इराक, अफगानिस्तान समेत दुनिया के तमाम मुल्कों में फैली हिंसा को वे महाभारत की लड़ाई से जोड़ते हैं। कहते हैं हिंदू मजहब में आपस में ही हिंसा होती आई है। कुरान से ज्यादा लड़ाई-झगड़ों का जिक्र महाभारत में है। वह उदाहरण देते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि लड़ोगे तो स्वर्ग में जाओगे। इसका मतलब अप्रत्यक्ष तौर पर वे मौजूदा आतंकवाद को गलत नहीं मानते। वह जिहाद की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि अपने हक की लड़ाई लड़ना जिहाद है और वह फलस्तीन समेत कई जगहों पर लड़ रहे मुसलमानों को असली जिहादी साबित कर देते हैं। इस पर सभा में मौजूद हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ तालियां बजाकर समर्थन जाहिर करती है। जबकि महाभारत की लड़ाई अधर्म और अन्याय के खिलाफ थी, ढाका में बेगुनाह लोगों ने कौन सा अन्याय किया था जिन्हें मारा गया। क्या गैर मजहब का होना अधर्म है। शायद कुछ ऐसी ही भड़काऊ एवं बिना सिर पैर की बातें युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। क्या वे सीधे यह नहीं बता सकते थे कि किसी भी बेगुनाह को मारना इस्लाम के खिलाफ है जैसा कि हजारों मौलवी अपने फतवे में कह चुके हैं। क्या इस तरह की तकरीर से बड़ी तादाद में उनके अनुयायी हथियार उठाना अपनी कौम के लिए नेक काम नहीं मानेंगे। बिल्कुल यह संभव है और बांग्लादेशी आतंकियों के नाइक से प्रेरित होने की खबरों से यह साबित भी हो जाता है। यू-ट्यूब पर उनके वीडियो हजारों, लाखों बार देखे जा रहे हैं।
कई हिंदुओं ने अपना तर्क देकर उनका विरोध भी किया है। नाइक इस्लाम को सर्वश्रेष्‍ठ बताने, नुकीले दांत धरती पर मौजूद ज्यादातर जानवरों का मांस खाने के लिए हैं जैसे विवादित मुद्दों पर अपनी दलील देते देखे और सुने जाते हैं। वह विरोधी सवालों को तुरंत हिंदू धर्म में से उदाहरण उठाकर उसे गलत साबित कर देते हैं। नफरत फैलाने वाली तकरीर के कारण ही नाइक पर यूके, कनाडा और मलयेशिया में प्रतिबंध है। अपने पीस टीवी चैनल के जरिए वह बांग्लादेश में काफी मशहूर हैं। यह चैनल भारत में प्रतिबंधित है।

भारतीय खुफिया एजेंसियों के सतर्क रहने और भारतीय मुसलमानों के आईएस के बहकावे में न आने से आतंकी संगठन का प्रवेश मुश्किल है, इसलिए उन्होंने बांग्लादेश को चुना है। ये संगठन कथित जिहाद में मरने पर युवाओं को जन्नत मिलने का खोखला दावा करता है। ऐसे गलत प्रोपगंडा को फैलने से रोकने के लिए समाज के पढ़े-लिखे, जानकार, संत और मौलवियों की भ‌ूमिका अहम है।
दरअसल यह सब हो रहा है क्योंकि सच्ची राह दिखाने वालों की कमी है। नाइक जैसे जानकार लोगों द्वारा युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन उन्हें मरने के लिए नहीं, जिंदा रहकर समाज के लिए कुछ करने को मिला है, जिससे आने वाली पीढ़ी उन्हें याद करे। धर्म कोई भी हो किसी बेगुनाह को मारना सबमें पाप है।

क्या कभी नहीं पकड़ा जाएगा मुंबई हमले का गुनहगार

मुंबई हमले के बाद देश में जितनी भी आतंकी वारदातें हुईं ज्यादातर में आतंकियों का हैंडलर पाकिस्तान में बैठा उनका आका हाफिज सईद था। सीमा पार से वह आए दिन घुसपैठ, हमले और कश्मीर में अलगाववादियों को मदद पहुंचा रहा है पर आज तक भारत उसे पकड़कर सजा नहीं दे सका।  2011 में अमेरिकी कमांडो ने रात के अंधेरे में अचानक पाकिस्तान के एबटाबाद में सर्जिकल स्ट्राइक कर अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का काम तमाम कर दिया था। इसके बाद भारत की ओर से भी ऐसी ही कार्रवाई की उम्मीद की गई पर आज भी मुंबई हमले का गुनहगार हाफिज सईद पाक में खुलेआम घूम रहा है। वह भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है पर हम कुछ नहीं कर पा रहे। वह लगातार भारत के लिए खतरा बना हुआ है।
कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद लोगों को भड़काने और अलगाववादियों तक आर्थिक मदद पहुंचाने में भी उसका हाथ है। खुफिया रिपोर्ट है कि अमेरिका से मिली मदद के 100 करोड़ रुपये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई इन्हीं आतंकियों के जरिए कश्मीरी अलगाववादियों तक पहुंचा रही है। इनका मकसद है कि कश्मीर में कैसे भी अलगाव की आग भड़काए रखी जाए। बुरहान के इनकाउंटर पर बाकायदा हाफिज सईद और सलाहुद्दीन जैसे देश के दुश्मनों ने मिलकर नमाज-ए-जनाजा पढ़ा। पीओके में सईद ने अपने कैंप खोल रखे हैं। इन लोगों ने कश्मीर में युवाओं को उकसाया और जवानों पर पत्थर फेंकवाया। इन पत्थरबाजों के बीच में आतंकी भी भेजे गए जिन्होंने ग्रेनेड भी दागे। इससे साफ है कि हाफिज सईद की जिंदगी का मकसद ही भारत को अस्थिर करना है ऐसे में कश्मीर में अमन बहाली के लिए इस दहशतगर्द को सबक सिखाना जरूरी हो गया है। पर सवाल उठता है कैसे?
पाकिस्तान इसे सौंपने की बात तो दूर, कार्रवाई भी नहीं करेगा। मुंबई हमले मामले की कोर्ट में चल रही सुनवाई का हश्र हम देख ही रहे हैं। रेड कॉर्नर नोटिस का कोई मतलब नहीं क्योंकि हाफिज सईद पाकिस्तान छोड़कर कहीं बाहर जाने वाला नहीं है। खुफिया ऑपरेशन में उसे ढेर कर पाना मुश्किल है क्योंकि लाहौर के पास मुरीदके में जहां वह रहता है उसकी अपनी आतंकी जमात लश्कर-ए-ताइबा के गुर्गे सुरक्षा देते हैं। एक विकल्प सर्जिकल स्ट्राइक का है यानी खुफिया सूचना पर अचानक पूरी प्लानिंग के साथ धावा बोलकर इस दहशतगर्द का सफाया कर दिया जाए पर अमेरिका की तरह भारत इस ऑपरेशन को अंजाम नहीं दे सकता।
अफगानिस्तान में अमेरिकी बेस से एबटाबाद तक के क्षेत्र में पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम काफी कमजोर था। अमेरिकी कमांडो जिस ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर में आए थे वह राडार को पूरी तरह से चकमा दे सकता था। पास में पाक मिलिट्री एकेडमी थी, ऐसे में जब हेलीकॉप्टर की आवाज आने लगी और वह उतरा तो लोगों को लगा कि यह सेना का कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम है क्योंकि वहां अक्सर सेना के विमान उड़ते रहते थे। दूसरी तरफ भारत को ऐसे मिशन के लिए अपने नए लाइट कांबैट हेलीकॉप्‍टर या एमआई-17 पर भरोसा करना होगा पर स्टील्‍थ टेक्नोलॉजी में अभी ये उतने दमदार नहीं हैं। भारत के पास अमेरिका जैसा ड्रोन भी नहीं है। अफगानिस्तान की सीमा को पाकिस्तान संवेदनशील नहीं मानता पर भारत की तरफ उसने मजबूत हवाई रक्षा प्रणाली तैनात कर रखी है। भारत से जैसे ही कोई विमान या हेलीकॉप्टर पाक सीमा में दाखिल होगा, झट से पहचान लिया जाएगा। ऐसे में भारतीय जवानों की जान खतरे में पड़ सकती है।
अमरिकियों ने करीब 18 महीने तक लादेन की निगरानी की थी और लादेन की सुरक्षा पुख्ता न होने की सूचना पर कार्रवाई की गई। जबकि हाफिज सईद कभी अकेला नहीं रहता है और उसका ठिकाना भी बदलता रहता है। वैसे भी उसे खुली छूट है तो वह घूम-घूमकर जिहाद के लिए चंदे इकट्ठे करता रहता है। पाकिस्तानी हुकूमत भी उसे सुरक्षा देती है। ऐसे में उसकी सटीक लोकेशन मिल पाना बेहद मुश्किल है। हालांकि पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने अमेरिकी ऑपरेशन के बाद संकेत दिया था कि भारत चाहे तो वह भी ऐसे ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है पर हाफिज सईद के खिलाफ यह तरीका जोखिम भरा होगा। अक्षय कुमार की फिल्म बेबी में हाफिज सईद जैसे हमशक्ल को नाटकीय तरीके से भारत लाकर सलाखों के पीछे करने की कहानी दर्शकों को खूब पसंद आई थी पर रीयल लाइफ में यह काफी मुश्किल मिशन है।
हां, भारतीय कट्टरपंथी प्रचारक जाकिर नाईक इस काम में भारत सरकार की मदद कर सकते हैं। हाल में मदीना से प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि देशहित में फिदाईन हमला जायज है। नाईक चूंकि भारतीय हैं और सईद देश का दुश्मन तो क्यों न उनसे प्रेरित बांग्लादेश के दो दहशतगर्द की तरह जाकिर नाईक खुद ऐसा देशभक्त तैयार करें जो पाकिस्तान में जाकर हाफिज सईद को हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला सके। जाहिर है इस तरह का कदम सरकार उठाने से रही पर अगर नाईक यह मानते हैं कि बेगुनाहों का कत्ल करना गुनाह-ए-अजीम है तो उन्हें इस पर जरूर गौर करना चाहिए। वैसे भी जंग में तो सब जायज है और हाफिज सईद भारत को लगातार जंग की धमकी देता रहता है।
पाकिस्तान को भारत के बजाए अपने आंतरिक मामलों पर ज्यादा गौर करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर में जनमत का राग अलापने से पहले वह उस यूएन प्रस्ताव पर अमल करे जिसमें पीओके खाली करने की बात कही गई है। भारत के लिए भी अपनी शांति के लिए थोड़ी कूटनीतिक चाल तो बनती है।

बुधवार, 11 मई 2016

अपने किले में हथियार डालना समझदारी तो नहीं

पहले जब राजा-महाराजा युद्ध के लिए निकलते थे तो अपने एक सबसे खास सिपहसालार की टुकड़ी को किले की सुरक्षा के लिए छोड़ जाते थे। अपनी सरजमीं की सुरक्षा को अभेद्य सुनिश्चित करना उनका मकसद होता था। आज जंग कम चुनाव ज्यादा होते हैं और किले की जगह चुनावी गढ़ ने ले ली है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं लेकिन बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री की एक के बाद एक बलिया और बनारस की रैली ने इसके संकेत भी दे दिए। पार्टियों के रणनीतिकारों ने युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया है।
बसपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात कही है। सपा की मौजूदा सरकार है तो उसका किसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी बिहार में उसे दरकिनार कर दिया गया था तो वह पुराने दोस्तों को करारा जवाब देना चाहेगी। रही बात कांग्रेस और भाजपा की। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का जबरदस्त फायदा उठाने वाली भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरने की रूपरेखा तैयार कर रही है। दिल्ली और बिहार में उसे भले ही मुंह की खानी पड़ी हो मगर मोदी-शाह की टीम इसे भुलाकर यूपी की सत्ता पर सवार होने का ख्वाब देख रही है। इसमें सबसे बुरी हालत में कांग्रेस है। लगातार दो बार केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद अब न तो पार्टी में कोई हिंदीभाषी दमदार नेता दिखता है और न ही पार्टी नेतृत्व अपनी साख बचा पा रहा है। टूजी, कोल, कॉमनवेल्थ जैसे घोटोलों के बदनुमा दाग पार्टी अभी धो भी नहीं पाई थी कि अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले ने उसकी किरकिरी करानी शुरू कर दी। ऐसे में देश की सियासत के लिहाज से महत्वपूर्ण सपा का हो चुका यूपी का किला क्या कांग्रेस 2017 में भेद पाएगी, यह बड़ा सवाल है।

आजादी के बाद कांग्रेस ने अविभाजित यूपी को वीर बहादुर सिंह, श्रीपति मिश्र, विश्वनाथ प्रताप सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, सुचेता कृपलानी, चंद्रभानु गुप्ता, संपूर्णानंद और गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री दिए हैं। पर आखिरी बार पार्टी के नारायण दत्त तिवारी 1988-89 में मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद सपा, बसपा और भाजपा को सूबे की सत्ता मिलती रही है।

इलाहाबाद जिले के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता से हाल ही में मुलाकात हुई। 4-5 साल पहले तक वह राजनीति में सक्रिय थे पर अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। उन्होंने कई कांग्रेसी सांसदों और विधायकों का वोट बैंक बढ़ाकर सत्ता का स्वाद चखाया है। खुद कभी पद का लोभ नहीं किया। आज भी कांग्रेस पार्टी के लिए उनके दिल में काफी सम्मान है। यूपी में कांग्रेस, के सवाल पर कहते हैं, देखिए जी परिवार का मुखिया सबसे अहम होता है। परिवार का तानाबाना, फैसला, पड़ोसियों से संबंध, समाज में मान-सम्मान, समर्थन सब कुछ उसी के नेतृत्व में मिलता है। ऐसे में उसका अक्लमंद, मृदुभाषी, ज्ञानी, थोड़ा चतुर, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबसे महत्वपूर्ण जमीन से जुड़ा होना काफी अहम हो जाता है। अब कांग्रेस को देखिए। मुखिया कौन है। क्या वह सबको साथ लेकर चलने वाला है। क्या वह जमीनी नेता लगता है। वह कहते हैं जब तक राजीव गांधी जैसा सरल, मृदुभाषी और जमीनी नेता कांग्रेस के पास था स्थिति मजबूत थी। अब गांधी परिवार की छांव से पार्टी को निकलने की जरूरत है। जितनी जल्दी पार्टी नया नेतृत्व खोजेगी, उतनी जल्दी उसका कद और सम्मान बढ़ेगा। बाकी सोनिया जी को बहुत कुछ नुकसान उनकी खराब हिंदी की वजह से हो जाता है। काफी लोग तो उनकी हिंदी को समझ नहीं पाते या फिर मजाक बनाकर गंभीरता से नहीं लेते। राहुल गांधी में राजीव का अक्स तो दिखता है पर उनके चारों तरफ घिरे लोगों ने कभी खुद पर भरोसा करने नहीं दिया। हर चीज उन्हें लिखकर, समझाकर करने को दी। अब स्थिति यह है कि एक ही तरह की बात वह हर जगह करते दिख जाते हैं। इससे लोगों में संदेश गलत जाता है। वहीं मोदी हैं जो समय, जगह और लोगों के हिसाब से बोलते हैं और लोगों को अपना मुरीद बना लेते हैं।

कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी यूपी में राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर सकती है। आलाकमान और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के बीच इस पर चर्चा भी हुई है। खुद को साबित करने के लिए राहुल गांधी को एक दिन का संसदीय दौरा छोड़कर जनता के बीच वास्तव में आना होगा। अभी वह सिर्फ महीने-दो महीने में एक दिन अपने क्षेत्र में गाड़ी से उतरते गरीब के यहां रोटी खाते, या फिर हाथ हिलाते देखे जाते हैं। उन्हें खुद को जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध करना होगा। इससे उन्हें जनता को समझने का मौका मिलेगा और जनता भी उन्हें अच्छे से जानेगी। अभी तो वह सेलिब्रिटी ही हैं।
यूपी कांग्रेस का गढ़ रहा है। उसके समर्पित कार्यकर्ता आज भी हैं पर सूबे में पतली हालत के चलते किसी दूसरी पार्टियों से जुड़ गए हैं। कांग्रेस नेतृत्व को एक लहर पैदा करनी होगी। आओ चलें, अपने घर आई है कांग्रेस, जैसा एक अभियान शुरू करना होगा। पिछले 25-28 साल में क्या नफा नुकसान हुआ जनता को समझाना होगा। सर्वर्णों और अल्पसंख्यक वोटरों में कांग्रेस के लिए सम्मान आज भी है बस उन्हें उम्मीद दिखनी बंद हो गई है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी बेबस नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंदर किसी प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रप नेता के अभाव में कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर है। यह गंभीर स्थिति है। भले ही भाजपा केशव प्रसाद मौर्य जैसे कम चर्चित व्यक्ति के नेतृत्व में चुनाव हार जाए पर वह बड़ा एवं जोखिम भरा फैसला लेने में पीछे नहीं हटी। हालांकि इसके जातिगत और कई अन्य समीकरण भी हैं पर कांग्रेस को इससे सीख लेना चाहिए। वैसे बिहार में पिछड़ों, अतिपिछड़ों की एकजुटता के कारण बुरी हार का सामना करने के बाद भाजपा द्वारा अगला प्रदेश अध्यक्ष ऐसे ही किसी शख्स को बनाए जाने की संभावना थी। यूपी में कांग्रेस को भी मिलेंगे कई केशव, बस तलाशना पड़ेगा। दिल्ली से उड़कर यूपी के गांव और कस्बे में आना होगा।

जी हुजूरी करने वाले कुछ कांग्रेसी नेता मानते हैं कि राहुल या प्रियंका अगर सरकार चलाने का अनुभव लेना चाहते हैं तो उन्हें यूपी में आजमाना चाहिए। अरे भैया, सीधे मुख्यमंत्री का अनुभव क्यों देना चाहते हो। बाकी नीचे का काम आता है, आता होता तो पार्टी की इतनी बुरी गति नहीं होती। लोकसभा में राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया था पर कोई कमाल नहीं दिखा सके तो अब आगे फिर मौका क्यों दिया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि पहले वो 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो जाते हैं तब वो एक अरब से अधिक की आबादी की समस्या को सुलझा पाने के लायक होंगे। कितनी हास्यास्पद स्थिति है, अरे वे सबसे पहले 20 लोगों की समस्याओं को तो अकेले सुनें, समझें और हल करके रिपोर्ट लें। कई नेता तो मजाकिया अंदाज में राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का अभिषेक बच्चन मानते हैं। लोग कहते हैं कि अभिषेक, अमिताभ का बेटा होते हुए और ढेरों अवसर मिलने के बाद भी सफलता की उन बुलंदियों तक नहीं पहुँच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जाती है।

सूबे के जातीय समीकरण में सामान्य वर्ग की संख्या 20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 54.05, अनुसूचित जाति 24.94 व अनुसूचित जनजाति 0.06 प्रतिशत है। सपा का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव समाज में है। कांग्रेस मजबूत हुई तो आजम खान जैसे लोगों से नाराज मुस्लिम टूटकर कांग्रेस में आ सकते हैं क्योंकि भाजपा को अब भी मुसलमान कम स्वीकार रहा है। यहां मुस्लिम 15-18 प्रतिशत हैं और यादव नौ प्रतिशत। वैसे भी मुस्लिम समुदाय में सपा का वोट बैंक घटकर आधे से भी कम रह गया है। जबकि यादव समाज के तीन चौथाई वोट उसे अब भी मिलते हैं। उत्तर प्रदेश के 19 प्रतिशत दलित समाज के वोट पर मायावती का एकाधिकार है। दलित वोटर के लिए तो जैसे मायावती के सात खून माफ हैं और ये वोट कहीं खिसकने वाले नहीं हैं। कांग्रेस के पतन के बाद कुछ प्रतिशत ब्राह्मण पद और प्रतिष्ठा की लालसा में बसपा के साथ गए हैं। हालांकि ये आते-जाते रहे हैं।

शर्मनाक तो यह है कि सपा और बसपा सरकारों में एक के बाद एक सत्ता का स्वाद लेने की होड़ लगी है। एक की सरकार में कानून व्यवस्था बदतर हो जाती है तो दूसरे के कार्यकाल में सब कुछ एकतरफा सा दिखने लगता है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां विकल्प देने में नाकाम रही हैं। वोटर भी क्या करे एंटी-इनकंबेंसी यानी मौजूदा सरकार  के खिलाफ दूसरे नंबर वाली पार्टी को मजबूरी में मौका दे देता है।

खबर है कि कांग्रेस बिहार जैसा यूपी में जदयू और एनसीपी से गठजोड़ कर विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह मान लिया जाएगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में अब वो दमखम नहीं रहा कि वह देश की सत्ता को संभाल सके। जब यूपी अकेले नहीं संभलेगी तो देश क्या संभलेगा। यूपी में एनसीपी और जदयू को तो फायदा पक्का मिलेगा, हो सकता है कांग्रेस की कुछ सीटें भी बढ़ जाएं पर जो निराशा कार्यकर्ताओं और खुद पार्टी के भीतर पनपेगी वो पार्टी को पतन की ओर ही धकेलेगी। अब वक्त आ गया है प्रशांत किशोर भी पार्टी को ऐसी सुझाव रूपी संजीवनी दें कि वह गांधी परिवार से अलग भी कुछ सोचना शुरू करे और पहले खुद में और फिर जनता में दोबारा भरोसा कायम करे। नया नेतृत्व ढूंढ़े तो शायद काम बन सकता है।

ये यूपी नहीं दिल्ली की सत्ता संभालने वालों का किला है, जो इसे संभाल पाएगा वही सुल्तान कहलाएगा।

गुरुवार, 5 मई 2016

अमेरिका में ट्रंप की चुनावी फिजा

अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। ओबामा के बाद सुपरपावर अमेरिका का कमांडर इन चीफ कौन होगा, यह जानने की उत्सुकता दुनिया भर के लोगों में है। विवादित बयानों से सुर्खियों में आए डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदवारी रिपब्लिकन पार्टी से पक्की हो गई है जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी से हिलेरी क्लिंटन सबसे आगे हैं। पांच राज्यों में क्लीन स्वीप और फिर इंडियाना में शानदार जीत के बाद ट्रंप को 1237 प्रतिनिधियों के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए अब महज 190 डेलीगेट की दरकार है। इधर, उनके दो बड़े प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज और जॉन कैसिच ने दावेदारी वापस ले ली है। इससे ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती खत्म हो गई है। एक तरफ अरबपति कारोबारी रिपब्लिकन ट्रंप को विवादों की लहर का फायदा मिलता दिख रहा है तो वहीं अनुभवी डेमोक्रेट पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी आगे चल रही हैं पर चुनावी फिजा उतनी दमदार नहीं है क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों को भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।

 राष्ट्रीय हित की बात तो हर नेता करता है ऐसे में यह समझना दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि अमेरिका फर्स्ट की बात करने वाले ट्रंप में खास क्या है जो वे अमेरिकियों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। शायद एक सबसे बड़ी बात जिससे वे सुर्खियों में आए वो था मुस्लिमों को अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी का उनका विवादित बयान। वैसे तो इस तरह का बयान लोकतांत्रिक नेता को शोभा नहीं देता पर इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया जिस दहशत में है उसी का परिणाम है कि बिना ज्यादा सोचे अमेरिकी ट्रंप के समर्थन में आ गए हैं और ध्रुवीकरण शुरू हो गया है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के सुपरपावर बनने पर बड़े युद्ध तो नहीं हुए लेकिन नई चुनौतियां जरूर खड़ी हुईं। महाविनाशक हथियार बने, लंबी दूरी की मिसाइलें आ गईं, साइबर वार ‌छिड़ा और सबसे खतरनाक आतंकवाद और कट्टरपंथ ने जड़ें जमानी शुरू कर दी। अमेरिका को हिलाकर रख देने वाले 9/11 की घटना के बाद नीतियां बदलने से सुरक्षा मजबूत तो हुई पर कई गंभीर समस्याओं ने देश को जकड़ लिया। अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, रोजगार घटे, असमानता और मौतें बढ़ीं, ऐसे में सुरक्षा पर खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ा, इन सबके बीच अमेरिका को सुपरपावर बनाए रखते हुए सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर पाना चुनौतीपूर्ण हो गया। अब नए राष्ट्रपति इससे कैसे निपटते हैं, यह भविष्य की गर्भ में है लेकिन ट्रंप ने चुनावी प्रचार और डिबेट के दौरान अपनी नीतियों को जिस बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है उससे मतदाताओं में उनके प्रति भरोसा बढ़ा है। प्राइमरी चुनाव के नतीजे इसका प्रमाण हैं। मुद्दा कोई भी हो अवैध अप्रवासियों को रोकने का, मैक्सिको सीमा सील करने या इस्लामिक कट्टरपंथ के सफाए का। दरअसल अमेरिका के लोग सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते। ओबामा के कार्यकाल में देश में कोई बड़ा हमला तो नहीं हुआ पर दुनिया में अमेरिकियों के मारे जाने का सिलसिला भी नहीं थमा। अकेले इराक और अफगानिस्तान में ही 6,845 अमेरिकी मारे गए और नौ लाख घायल हो गए। अब जनता ऐसा राष्ट्रपति चाहती है जो जवानों की जान का सौदा किए बिना सुरक्षा दे और दुनिया में अमेरिका के दबदबे को कायम रख सके। ट्रंप यह भलीभांति समझते हैं इसीलिए वे बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि दुनिया भर में अमेरिकियों की सुरक्षा ट्रंप प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

प्रधानमंत्री मोदी की तरह ट्रंप लिखा हुआ नहीं पढ़ते। इससे वे जनता से सीधे जुड़ पाते हैं क्योंकि वह सरल और जमीनी बातें कर रहे होते हैं। वे भाषण के दौरान विरोधियों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकते। या यूं कहें उन्हें जनता को लुभाने की कला आती है। वे कहते हैं कि अमेरिका ने दुनिया को नाजियों और जापानियों से बचाया। लेकिन आज अमेरिका का कद घट गया है। हमारी विदेश नीति लड़खड़ा गई है। इराक, मिस्र, लीबिया, सीरिया हर जगह हम नाकाम रहे। आज जरूरत है एक मजबूत नेता कि जो अमेरिका का गौरव और रुतबा लौटा सके। रियल एस्टेट कारोबारी ट्रंप कारोबार, आव्रजन, अर्थव्यवस्था, रोजगार और सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं।

ट्रंप अमेरिका की मौजूदा सैन्य ताकत को पहले से कमजोर बताते हैं। 1991 में अमेरिका के सक्रिय सशस्त्र बल की तादाद करीब 20 लाख थी जो घटकर 13 लाख रह गई है। नौसेना के एक्टिव शिप 316 बचे हैं। वायुसेना की ताकत तिहाई रह गई है। सैन्य बजट भी घटा है। उधर, आईएसआईएस, अल कायदा, तालिबान, बोको हराम जैसे आतंकी संगठन हैं जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की साजिश रच रहे हैं। ट्रंप में लोग ऐसा दमदार नेतृत्व देख रहे हैं जो बेझिझक सियासत किए बिना देशहित में फैसले ले सके।

हकीकत यह है कि आज अमेरिका का चीन से कारोबार घाटा बढ़ा है, सीमाएं खुलने से अवैध तरीके से घुसपैठ बढ़ी है। आज बेरोजगारी दर पांच फीसदी तक जा पहुंची है। ट्रंप का दावा है कि घर की माताओं, बुजुर्गों और किशोरों की बेरोजगारी को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 93 मिलियन (कुल आबादी 323 मिलियन) पहुंच जाएगा। उत्तर कोरिया जैसा छोटा सा देश अमेरिका को धमकी देता है। सऊदी अरब आंख दिखा रहा है। इसके लिए वे ओबामा की विदेश नीति को जिम्मेदार बताते हैं। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले देशों को उजागर न करने, मध्य पूर्व में अस्थिरता और ईसाइयों को आतंकियों से न बचाने के मुद्दे को उन्होंने जोरशोर से उछाला है। एक तरफ वे चीन और भारत पर नौकरियां छीनने का आरोप लगाते हैं तो वहीं रूस से शत्रुता भुलाकर शांतिपूर्ण संबंध की भी वकालत करते हैं। उनका मत साफ है कि अमेरिकियों को पहली प्राथमिकता मिलेगी।

ट्रंप जीतते हैं तो आतंकवाद के खिलाफ भारत को पूरा सहयोग मिल सकता है। पाकिस्तान के परमाणु जखीरे के कारण ट्रंप उसे दुनिया का संभवत: सबसे खतरनाक मुल्क भी करार दे चुके हैं। उनका संकेत साफ है कि जिन देशों से मदद के बदले में धोखा मिलता है, उन्हें धन रोका जाएगा। अमेरिका से पाक को अरबों डॉलर की मदद मिलती रही है। अब लड़ाकू विमान एफ-16 भी देने की बात चल रही है। ओबामा ने 2016-17 के लिए पाक को 860 मिलियन डॉलर की मदद देने का प्रस्ताव रखा है। ट्रंप जीते तो यह सब बंद होगा या फिर पाक को आतंकियों के प्रति नरमी छोड़नी होगी। यह रवैया भारत के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि विदेशी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार में करता रहा है। हालांकि आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। एच1बी वीजा पर ट्रंप अपना पुराना विरोधी रुख बदल रहे हैं। ट्रंप ग्रुप ने पुणे और मुंबई में दो रियल एस्टेट कंपनियों के साथ मिलकर अपार्टमेंट प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है। आने वाले समय में यह कारोबारी रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।

अब देखना यह है कि ट्रंप अगर व्हाइट हाउस पहुंचते हैं तो वह अपने वादों को कितना अमलीजामा पहना पाते हैं या फिर सब चुनावी जुमले ही साबित होंगे। 

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए ...

पाकिस्तान के हिंदू या सिख भारत में शरण मांगते हैं तो कहा जाता है कि इस्लामिक मुल्क में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जबकि हकीकत यह भी है कि उसी देश के सबसे बड़े और सबसे कम आबादी वाले सूबे बलूचिस्तान के मुसलमान पाक से आजादी मांग रहे हैं। बलूच राष्ट्रवादी अपनी सांस्कृतिक पहचान, संसाधनों पर बराबर हक और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन जवाब में उन्हें पाकिस्तानी हुकूमत और फौज का अत्याचार सहना पड़ रहा है। बलूच अंग्रेजों के बाद खुद को पाकिस्तान का गुलाम मानते हैं क्योंकि यहां सिर्फ पाक फौज का सिक्का चलता है जो कभी भी कहीं भी किसी को भी उठा लेती है और अपना हक मांगने वालों को मौत के घाट उतार देती है। हैरत की बात तो यह है कि कश्मीर, अफगानिस्तान में गृह युद्ध, परमाणु सुरक्षा, धार्मिक कट्टरपंथ को लेकर बार-बार पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आता है पर कभी भी बलूचिस्तान का मुद्दा खुलकर सामने नहीं आ पाता। बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाक फौज की क्रूरता कभी-कभार किसी स्थानीय नागरिक की बदौलत ही सामने आ पाती है। दोनों ही जगहों पर मीडिया को पूरी तरह से सेंसर किया गया है। पाक के अत्याचार से त्रस्त यहां की जनता भारत से दूसरे मुक्ति संग्राम की परिणति की उम्मीद लगाए बैठी है। 
प्रमुख राष्‍ट्रीय मीडिया में तो बलूचिस्तान की घटनाओं को स्पेस नाम मात्र का मिलता है। बलूचिस्तान के पत्रकार सच्चाई लिखते हैं तो इस्लामाबाद में बैठे संपादक खबरों को पाक फौज के चश्मे से एडिट कर देते हैं। पाक हुकूमत को चुनौती देने वाले तेजतर्रार पत्रकारों को धमकाया जाता है। मजबूरन ऐसे दर्जनों पत्रकारों को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे समेत दुनिया के कई देशों में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है। पाक फौज द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं पर बेबाक रिपोर्ट देने के चलते युवा बलूच पत्रकार मलिक सिराज अकबर को 2011 में भागकर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। अब वे वहीं से बलूचिस्तान की सच्चाई दुनिया को बता रहे हैं। पाक फौज ने आधुनिक विचारों वाले राष्ट्रवादियों की हर उस आवाज को शांत करना शुरू कर दिया जो अपना हक मांगते हैं। इनमें नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्वान, वकील और पत्रकार सीधे तौर पर निशाना बने। उन्हें अगवा कर मार दिया गया, या इतनी यातना दी गई कि वे टूट गए। बलूच अलगाववादियों ने भी समय-समय पर हिंसक जवाब दिया। ऐसे में अब बातचीत के जरिए बलूच समस्या के समाधान की उम्मीदें कम ही बची हैं। 2004 के बाद आजादी के आंदोलन में तेजी आई तो हजारों की संख्या में हत्याएं भी हुईं। 

बलूचों की तीन प्रमुख जनजातियां हैं- मैरी, बुगती और मेंगल, तीनों जनजातियों के नेता बड़ी फौज खड़ी कर सकते हैं पर इनमें एकता नहीं है। पाक फौज इनमें फूट डालने में सफल रही है। इसी कारण पाक फौज का तर्क रहता है कि बलूचिस्तान में सब सामान्य है, बुगती समुदाय के कुछ लोग सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और बलूचिस्तान लिबरेशन यूनिटी फ्रंट दो प्रमुख बलूच संगठन हैं जो सीधे तौर पर पाक फौज से लोहा ले रहे हैं। 
वास्तव में बलूचिस्तान समस्या के मूल में जातीय समुदाय में टकराव भी है। अंग्रेजों का विश्वासपात्र होने का पाक पंजाबियों को फायदा मिला। सेना एवं अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों में सबसे ज्यादा पंजाब के लोग भर्ती किए गए जबकि बलूचिस्तान को नाममात्र का प्रतिनिधित्‍व मिला। ऐसे में बलूचों का हक सेना मार रही है। पंजाबी पाक की कुल आबादी का करीब 45 फीसदी हैं। 


बलूचों की नाराजगी की इस सदी की सबसे बड़ी वजह ग्वादर पोर्ट का निर्माण है, जो 2002 में शुरू हुआ। चीन की मदद से पाक छोटे से मछली पकड़ने वाले लोगों के गांव ग्वादर को ट्रांसपोर्टेशन हब के तौर पर अंतरराष्ट्रीय पहचान देना चाहता है। भारत के लिहाज से ग्वादर का पाक के लिए सामरिक महत्व भी है। यह ऊर्जा की भारी मांग वाले भारत, चीन और पूर्वी एशिया के लिए महत्वपूर्ण गलियारा बन सकता है जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर निकलेगा। ग्वादर प्रोजेक्ट पूरी तरह से पाक सरकार के नियंत्रण में हैं। इससे स्थानीय बलूचों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। यही नहीं, बलूचों को कमजोर करने के लिए पाक सरकार ग्वादर के पास दूसरे प्रांतों के लोगों को बसा रही है। कर्मचारियों के लिए पूरा एक कस्बा बसाया जा रहा है। प्रस्तावित ईरान-पाक-भारत पाइपलाइन भी बलूचिस्तान से होकर आएगी, जिसका बलूच विरोध कर रहे हैं। अफगानिस्तान युद्ध से शरणार्थी बड़ी तादाद में बलूचिस्तान में घुस आए। ऐसे में अपने ही क्षेत्र में बलूच आबादी हासिए पर आ गई है। दोनों समुदायों में रंजिश ब्रिटिश शासन से ही है। तालिबान आतंकी भी यहां शरण ले चुके हैं। राजधानी क्वेटा तो अल कायदा और तालिबान का गढ़ बन चुकी है। 


2004 में बलूच विद्रोह फिर से शुरू हुआ और सेना द्वारा 2006 में जानेमाने बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या के बाद विरोध की चिंगारी तेजी से भभकी। अवैध तरीके से कई लोगों हिरासत में रखा या गायब कर दिया। आज आलम यह है कि बलूचिस्तान पाक का ऐसा प्रांत बन चुका है जहां सबसे ज्यादा लोग गायब हुए हैं। अमेरिका और एमनेस्टी समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर सवाल उठाए पर राजनीतिक दबाव और इच्छाशक्ति के बगैर इसका कोई फायदा बलूचों को नहीं हुआ। 


बलूच समुदाय सिर्फ दक्षिण पश्चिम पाकिस्तान ही नहीं पूर्वी ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में पाक बलूचों की आबादी तेजी से घटी है। पाक अक्सर अपनी करतूत को छिपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ने का सहारा लेता रहता है। हाल ही में एक पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी को बलूचिस्तान से गिरफ्तार कर उसने कहा कि ये रॉ के मिशन पर थे जबकि कुलभूषण जाधव अपने कारोबार के सिलसिले में ईरान से पाक आए थे। जानीमानी बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी भारत से किसी भी प्रकार के मदद के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहती हैं कि यह तो पाक की नापाक चाल है जिससे वह बड़े पैमाने पर अपहरण और कत्लेआम की घटनाओं से दुनिया का ध्यान हटा सके। कादरी ने कहा कि हम तो भारत से मांग करते हैं कि जिस तरह से आपने बांग्लादेश के लोगों को पाकिस्तान के जुल्मओ-सितम से आजाद कराया उसी तरह प्रभावशाली पड़ोसी मुल्क होने के नाते बलूचों की मदद के लिए आगे आएं। बलूचों को भारत से काफी उम्मीदें हैं पर अब तक भारत का रवैया उदासीन रहा है। 

वर्ष 1800 के आसपास इस इलाके में कबायलियों के बीच कमजोर आपसी संबंध का अंग्रेजों ने फायदा उठाया और फूट डालो राज करो की नीति अपनाई। इसके तहत बलूचिस्तान को सात क्षेत्रों में बांट दिया गया। अंग्रेज चाहते थे कि ऐसा कर वे उस इलाके पर कब्जा कर लें जिससे होकर अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सके। 1877 में अंग्रेजों ने बलूचिस्तान को ब्रिटिश भारत में मिला लिया। 1947 में भी क्षेत्र का कबायली कुनबा संगठित नहीं हो सका जिसका परिणाम यह हुआ कि पाक ने सूबे पर जबरन कब्जा कर लिया। 

प्रकृति ने इस क्षेत्र को सबसे ज्यादा समृद्ध बनाया लेकिन इसे जानबूझकर दक्षिण ‌एशिया का सबसे बदहाल क्षेत्र बनने के लिए छोड़ दिया गया। आज यह पाकिस्तान का सबसे गरीब और सबसे कम साक्षरता वाला प्रांत है। देश की जीडीपी में इसका योगदान भी 3.7 से नीचे आ गया है। बलूचिस्तान में मातृ और शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। अंग्रेजों के समय में यहां से कोयला निकाला जाता था। 1952 में यहां पहली बार प्राकृतिक गैस का भंडार खोजा गया। देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस का भंडार होने के बावजूद क्षेत्र की बदहाली सूबे के लोगों में पाक हुकूमत के प्रति नफरत की भावना बढ़ाती है। बलूचिस्तान के गैस क्षेत्र का फायदा यहां के नहीं बल्कि सिंध और पंजाब के लोगों को मिलता है। बलूचिस्तान कर्ज में डूबा है। स्वास्‍थ्य की हालत खस्ता है। लोगों को पीने के लिए साफ पानी भी मयस्सर नहीं है। रोजगार भी सीमित लोगों को दिया जाता है। देश विरोधी होने का ठप्पा लगाकर न जाने कितने लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। कुछ के घरवालों को तो आज भी अपनों का इंतजार है। 
बलूच अपने संसाधनों का मालिकाना हक मांग रहे हैं जबकि पाक सेना ब्रिटिश हुकूमत की भूमिका में है। उसका कहना है कि वह लोगों को सभ्य, आधुनिक और विकास की धारा से जोड़ने के लिए बलूचिस्तान में है जबकि सच मायने में पूरा सूबा पाकिस्तान की कॉलोनी बन चुका है। 


आज बलूच राष्ट्रवादियों को भारत से ढेरों उम्मीदें हैं। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों की तरह बलूचों को भी राजनीति में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा। पाक सरकार में पंजाबियों का दबदबा है। प्रांतीय शासन के अधिकार सीमित कर दिए गए। भारत ने बंगालियों को पाक के अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी तो बलूचिस्तान का नंबर कब आएगा, यह सवाल वहां की फिजा में उठ रहा है। पाक को भी यही डर सता रहा है। कश्मीर और इस्लामिक आतंकवादियों के बाद बलूचिस्तान पाक फौज के लिए तीसरा फ्रंट बन चुका है। अच्छा होता इस मामले को सेना के बजाए निर्वाचित सरकार सुलझाने का प्रयास करती पर इसकी उम्मीद फिलहाल नहीं की जा सकती। 

एक मशहूर शायर की ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं- 

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए 
मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए 
कौन आजाद हुआ 

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

जेएनयू प्रकरण में थोड़ी समझ सबको दिखानी चाहिए थी


देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारेबाजी की दुस्साहसपूर्ण घटना के बाद देशभर में हो रहे प्रदर्शन और दो खेमों में लोगों के बंटने के बाद यह विश्लेषण जरूरी है कि
वास्तव में मीडिया, राजनेताओं और समाज के आम लोगों ने इस मामले को किस तरह से लिया। और क्या वह तरीका सही था। दो दिनों में मैंने दिल्ली में करीब एक दर्जन लोगों से बात कर इस ज्वलंत मुद्दे
पर उनके विचार जानने की कोशिश की।
आपको जानकर हैरानी होगी कि कोई भी मामले को गहराई से न समझा और न ही उसकी इसमें रुचि है। वो तो बस भड़क गया, एक उकसावे पर। मैं भी। सभी एकसुर में जेएनयू को अलगाववादियों का अड्डा और उसे बंद करने की भी बातें करने लग गए।
फौरन बाद ही विवाद ने सियासी चोला पहन लिया। सड़कें लाल और भगवा झंडे से पट गईं। यहां तिरंगे की बात नहीं करूंगा क्योंकि यह सियासत से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। मेरा मानना है कि
आपकी विचारधारा कोई भी हो, आपको मुबारक। पर देश, देश का झंडा, एकता-अखंडता के नाम पर पहले राष्ट्र की भावना की आपसे अपेक्षा की जाती है। कुछ लोग इसे जबरदस्ती संघी विचारधारा को
थोपना कह रहे हैं। यहां एक सवाल उठता है कि पार्टी पॉलिटिक्स और छात्र राजनीति में कोई अंतर है भी कि नहीं। नेताओं की सियासत का अड्डा विश्वविद्यालयों को बनने क्यों दिया जा रहा है। नेताओं और
पार्टियों के हितों को साधने का जरिया पढ़ने वाले छात्र न बनें इस बात का किसी को ख्याल है या नहीं। क्योंकि राजनीतिक लोग 24 घंटे सातों दिन बस सियासत करते हैं और पढ़ाई करने वालों को तो
भविष्य बनाना है, अपना और परिवार की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना है। अब इस हंगामे के बाद नुकसान तो पढ़ने वालों का ही हो रहा है। जबकि चैनलों को दर्शक मिल रहे हैं। विश्लेषक अपना ज्ञान
बघार रहे हैं। अखबारों के पेज भर रहे हैं। पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही है। किसी का काम खराब हुआ तो वो सिर्फ और सिर्फ पढ़ने वाले हैं। हां जिन लोगों ने देशविरोधी जहर उगला उनके खिलाफ
कार्रवाई हो, यह पूरा देश चाहता है।
अब पीछे चलते हैं-
चैनलों पर दिखाए गए वीडियो को देख सभी में देशभक्ति की भावनाएं हावी हुई। होनी भी चाहिए, मैंने जब पहली बार सुना- भारत तेरे टुकड़े होंगे... यकीन मानिए तलवार और गोली की बात ही जेहन में कौंध गई। गुस्साए लोगों का ताप अपनी जगह जायज है। हां, देशभक्ति किसे कहते हैं इसमें भी सब की राय जुदा है। पर यहां तो एक वीडियो से लोगों को उकसाया गया। आप शायद अब भी न समझें होंगे
कि उकसाया कैसे गया। दरअसल नापाक हरकत की मंशा दो चार लोगों की थी, बाकी के लोग तो संघ और बीजेपी का विरोध करने के लिए जुटते चले गए जो विचारधारा में मतभेद की बात है। जोशीले
नारों के बीच ऐसा लगता है कि मास्टरमाइंड ने पांच- दस लोगों के सहयोग से कश्मीर और भारत विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए।
अब आपको एक पत्रकारिता की गूढ़ बात समझाता हूं। कश्मीर में जुमे की नमाज के बाद कुछ लोग अक्सर मस्जिद से आती भीड़ के आगे खड़े होकर पाकिस्तान या आजादी या फिर आईएसआईएस का
झंडा लहराते हैं और विरोधी नारे लगा देते हैं। विश्व मीडिया में गई तस्वीरों में लगता है मानों कश्मीर में बड़ा जुल्म हो रहा है और वहां बगावत की आंधी उमड़ रही है जबकि चंद लोग होते हैं जो यह विवाद
सुलगाए रखना चाहते हैं और इसमें आजादी जैसा कुछ नहीं सियासत साधने की मंशा रहती है। गरीबों, मजलूमों की फिक्र इन्हें नहीं होती। इसे कुछ भारतीय अखबारों और चैनलों ने समझा और इस
प्रोपगेंडा की कवरेज सीमित होती है या नहीं की जाती है। ऐसे में जेएनयू प्रकरण में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सावधानी क्यों नहीं बरती। हम तो पूछेंगे, तेज, सर्वश्रेष्ठ, आपसे आगे चलने वालों ने उत्तेजक
और देश विरोधी बातों को सार्वजनिक क्यों कर दिया।
मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाक में भारत विरोधी बातें करता है तो अखबार के लोग भारत के खिलाफ उगला जहर से काम चलाते हैं। इस खबर को अक्षरश: लिखा भी जा सकता है लेकिन
यही तो आतंकी या अराजक तत्व चाहते हैं कि वे कुछ ऐसा करें कि विवाद खड़ा हो और जबरन सुर्खियां बने। हमें इनके मंसूबे को तोड़ना होगा।
आज का दौर टीवी का है। भारत में सोचने समझने की क्षमता रखने वाले जिस किसी भी शख्स के कानों में ऐसी देशविरोधी नारों की गूंज सुनाई देगी, उसका खून खौलेगा ही। इस मामले में भी विवाद के
तेजी से बढ़ने की यह प्रमुख वजह रही। पर क्या आग को हवा देने से पहले मीडिया ने सधी हुई रिपोर्टिंग की। अगर कल को कन्हैया के सभी विवादित वीडियो गलत निकले जैसा कि वामपंथी छात्र और
जेएनयू के लोग दावा कर रहे हैं तो क्या मीडिया संस्‍थानों के खिलाफ कार्रवाई होगी। अगर वीडियो सच भी निकलता है तो इस तरह खुलेआम देशविरोधी वीडियो को चैनलों पर प्रसारित कर देना क्या एक
उचित फैसला था। क्या चैनल वालों को यह पता नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया भयावह होगी। पर कड़वी सच्चाई है कि टीवी चैनल यही तो चाहते हैं कि विवाद हो और ज्यादा से ज्यादा दर्शक उनका चैनल
देखें। मेरा ऐसा मानना है कि टीवी मीडिया से रिपोर्टिंग में थोड़ी सी चूक हुई। अब कई फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी कन्हैया की बनाई जा रही है। जैसे सुप्रीम कोर्ट ने उसे देशद्रोही ठहरा दिया हो। बाकी गद्दार
कौन हैं और कहां हैं। उनकी धरपकड़ चल रही है।
कुछ दिन पहले जेएनयू के जानेमाने प्रोफेसर और साहित्यकार मकरंद परांजपे को सुनने का मौका मिला। विषय गांधी, अंबेडकर और नेहरू था पर जेएनयू विवाद ही छाया रहा। डॉ. परांजपे ने साफ कहा
कि जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इसका कोई समर्थन नहीं करता और पर पूरे मामले में दोनों पक्षों ने अहिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। he said please do not use
political weapon to protest. there are multiple type of intolerence. politics is कामधेनु in our country. Listening is an act of अहिंसा but in
this case कोई भी किसी की नहीं सुन रहा। लोग बस भड़क रहे हैं। मीडिया ट्रायल हो रहा है जबकि असली दोषी अभी गिरफ्त से बाहर हैं। बापू और अंबेडकर में भी मतभेद थे और सार्वजनिक तौर
पर थे लेकिन वे साथ-साथ रहते और काम करते थे। चिल्लाना, नारेबाजी भी एक प्रकार की हिंसा ही है। जेएनयू विवाद के राजनीतिकरण ने विचारधारा को मायावी बना दिया है। he said we
should be active not reactive. first understand, feel and then if very necessary speak.उन्होंने मामले को हैंडल करने के लिए दोनों पक्षों को गलत ठहराया।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले लोगों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सच्चाई को सुनना और समझना चाहिए था और
सड़क पर उतरने वालों को कानून पर भरोसा रखना चाहिए।
इसी कार्यक्रम में सुविख्यात लेखक पद्मश्री एसएल भयरप्पा भी मौजूद थे। उन्होंने बड़ी ही कड़वी मगर सौ फीसदी सच बातें कहीं। इतिहास के पन्ने पलटते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने कुछ मुसलमानों को
भड़काया था कि हम चले गए तो हिंदू तुम पर राज करेंगे। इससे अच्छा है कि हमी शासन करें। उन्होंने मुसलमानों को इतना डरा दिया कि वे आजादी भूल अंग्रेजों को अपना हमदर्द मानने लगे और विद्रोह
कमजोर हुआ। आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वही रास्ता अपनाया। अंग्रेजों की तरह मुसलमानों को भड़काया कि हिंदू क्रूर हैं। ऐसे में देश को बांटकर राज करने की परंपरा अनवरत जारी रही। किसी ने
मुसलमानों को ये समझाने की कोशिश नहीं कि देश आपका है तो कोई आपसे जोर जबरदस्ती कैसे कर सकता है। यह पाकिस्तान नहीं भारत का लोकतंत्र है। नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानों को
अल्पसंख्यक दर्जा दिलाया पढ़ने, रोजगार पाने या किसी कल्याणकारी कार्य के लिए नहीं धार्मिक पहचान दिलाने के लिए, जो उनका वोट बैंक बना। ऐसी राजनीति बंद होनी चाहिए।
वास्तव में जेएनयू को नेताओं ने अपना अखाड़ा बना लिया और इस अखाड़े को महिमामंडित किया मीडिया ने। कहा तो यह भी जा रहा है कि जेएनयू के जरिए भाजपा शैक्षिक संस्थानों पर पकड़ मजबूत
करना चाहती है तो दूसरी तरफ वामपंथी दल विधानसभा चुनावों के लिए दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं सच क्या है पर इतना ता सबको समझना चाहिए कि
राजनीति जारी है।
बाकी चार लोगों के नारों से हिमालय पर पड़ी एक किलो बर्फ भी पिघलने वाली नहीं है टुकड़े ये क्या करेंगे देश के। नादान हैं या तो जीवन भर चक्की पीसेंगे या कहीं गोली खाकर टें हो जाएंगे। पर दोस्तों
थोड़ा सब्र कर लो। विरोध करो हिंसा नहीं।

बाकी अब तो उमर खालिद समेत देशद्रोह के 10 आरोपी भी कह रहे हैं कि वे देशविरोधी नहीं है। ये विश्वविद्यालयों की लड़ाई है। ऊपर वाला जाने जब सभी देश के हित में सोच रहे हैं तो टुकड़े होंगे इंशाल्लाह ----- के नारे कौन लगा रहा था। जांच का विषय है।

जय हिंद
#nationfirst

रविवार, 3 जनवरी 2016

नवाज से ये कैसी दोस्ती

पहले अचानक थाईलैंड में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं। कुछ ही दिन बात सुषमा स्वराज पाकिस्तान जाती हैं और फिर काबुल में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर कर मोदी पूरी दुनिया को अचंभित कर देते हैं। विपक्ष में रहते पाकिस्तान से लव लेटर का आरोप लगाकर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते ही क्या हो गया है, जनता जानना चाहती है? रूस से अफगानिस्तान और वहां से दो घंटे के लिए मोदी के विमान का पाकिस्तान की सरजमी पर उतरने की असामान्य घटना हर भारतीयों के लिए चौंकाने वाली बात है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस समय पीठ में छुरा घोंपने जैसी घटना की आशंका भी जताई गई थी, जो सच निकली। कुछ ही दिन बाद पठानकोट में पाकिस्तानी दहशतगर्द एयरबेस पर हमला कर देते हैं। आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हो पाते पर हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं। 44 घंटे बाद अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास को भी निशाना बनाने की नाकाम कोशिश होती है। इस दौरान पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटता है। विरोधी पार्टियां मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे पर सवाल उठाती हैं। कुछ तो इसे यात्रा के बदले में उपहार बताकर आलोचना करती हैं। पर इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का रुख पाकिस्तान को लेकर सरकार के बदले नजरिए की ओर स्पष्‍ट संकेत दे रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और नवाज के बीच बढ़ी अचंभित कर देने वाली नजदीकी के निहितार्थ क्या हैं?
बड़ा सवाल यह है कि पठानकोट में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने एयरबेस पर हमले का दुस्साहस किया लेकिन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे तौर पर आलोचना से दूरी क्यों बनाई? उन्होंने मानवता के दुश्मनों की बात कह जवानों के जज्बे को सलाम किया। क्या मोदी और नवाज के बीच किसी दूसरी रणनीति पर चलने की रजामंदी हुई है? क्या दोनों नेता अब समझ चुके हैं कि ऐसे हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चा‌ह‌िए? लेकिन इस डील में ताे नुकसान हमारा है। उन जवानों के परिवारों को प्रधानमंत्री क्या सांत्वना देंगे जिनके आंसू थम नहीं रहे।
7 घरों के चिराग बुझ गए, देशवासी गुस्‍से में हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने फौरन अपने कथित दोस्त नवाज शरीफ को फोन कर विरोध जताना भी जरूरी नहीं समझा जबकि नातिन की शादी में नवाज के न्योते को पीएम ने बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लिया था। इसे भारत की विदेश नीति का बड़ा दिन भी बताया गया था क्योंकि इससे पहले तीन भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए थे। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों ने मोदी के इस रुख को वार्ता के लिहाज से अहम कदम करार दिया था। इसके बाद पठानकोट में हमला हो जाता है तो क्या इसे पाकिस्तान की वास्तविक सरकार यानी सेना और आईएसआई की बौखलाहट समझा जाए, जो नहीं चाहती कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व पर हावी रहने के लिए पाक फौज का भारत की ओर से खतरे का हौवा खड़ा करना जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी तय तारीख पर किसी भारतीय पीएम का पाक दौरे का कार्यक्रम बनता है सीमा पर गोले बरसते हैं और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मोदी का अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन का तोहफा देने लाहौर जाना सियासत की पिच पर मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। इससे न सिर्फ भारत की शांतिपूर्ण भावना दुनिया में एकबार फिर उभर कर सामने आई बल्कि इसने पाकिस्तान की सियासत में भी अचानक गर्माहट ला दी। पाकिस्तान में भी मोदी के चाहने वाले बढ़े। माना जा रहा है कि मोदी नवाज शरीफ को राजनीतिक तौर पर सशक्त देखना चाहते हैं। पाक फौज और आईएसआई के सामने नवाज के कद को बढ़ाने के लिए ही उन्होंने दुनिया के सामने कई बार पाक समकक्ष को काफी तवज्जो दी है। तो क्या जवानाें की जान की कीमत पर यह बदली हुई मोदी नीति है? पाकिस्तान में सियासतदानों का कद सेना से हमेशा छोटा ही रहा है। ऐसे में जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठता है उसे पहले सेना और फिर वहां के कट्टरपंथियों के आगे
झुकना पड़ता है। वह चाहकर भी भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में सोच नहीं पाता। बंटवारे के बाद से घटनाएं ही कुछ ऐसी हुईं कि सेना ने खुद को सियासी जमात से ऊपर कर लिया जिसे आजतक कोई भी वजीर-ए-आजम टस से मस नहीं कर सका।  नवाज शरीफ का एयरपोर्ट पर खड़े रहकर मोदी के आने का बेसब्री से इंतजार कर अगवानी करने का आखिर माजरा क्या है, यह सवाल भारत में न सही पाकिस्तान में दबी जुबान जरूर उठ रहा है।
हालांकि भारतीय नेतृत्व के ऐसे कदमों से जवानों का मनोबल जरूर कमजोर हुआ होगा। सीमा पर पाकिस्तान की गोलीबारी और घुसपैठ का जवाब देने के लिए डटे जवान अपनी जान न्योछावर करने में जरा भी नहीं हिचकते जबकि सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने को उत्सुक दिखाई दे रही है। तो क्या अब आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ चलने में कोई हर्ज नहीं है? जवानों की मौत पर सबसे गहरा दुख तो पत्नी, बच्चों और परिवार को होता है। देश उनके दुख में साथ जरूर खड़ा होता है पर राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी नई रणनीति में जवानों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा देश इस्राइल है जहां दो जवानों की मौत पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले शुरू हो जाते हैं। पूरी सरकार आक्रामक हो जाती है, ऐसे में जवानों को भी अपनी जान कीमती होने का अहसास होता होगा। पर शायद अपने देश में आम आदमी की छोड़िए, जवानों की भी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार और बिग हार

बिहार में
करारी हार पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। टीम शाह-मोदी नतीजों से कितना मायूस हुई है यह समझने के लिए जरा चुनाव नतीजे वाले दिन तमाम टीवी चैनलों पर पधारे भाजपा के प्रवक्ताओं के चेहरों को याद करिए। एंकर पूरे फार्म में थे उस दिन दनादन कंटीले और चुटीले शब्दों के बाण चलाए जा रहे थे। कौन कहता है असहिष्णुता बढ़ रही है? बेचारे प्रवक्ता तो सभी बाणों को मुस्कुराते हुए झेल रहे थे। कितने सहिष्णु दिख रहे थे, भाई वाह। पर दिल की टीस बनावटी मुस्कान से साफ झलक रही थी। संबित पात्रा जैसे मंझे हुए प्रवक्ता ने भी राहुल गांधी के तीखे हमले पर बस इतना कहा- आज उन बातों का जवाब देने का वक्त नहीं है। और तो और दिन भर सोशल मीडिया पर गजब की दलबदलू प्रवृत्ति देखी गई। खुद को कट्टर समर्थक बताने वाले भी पीएम के पुराने भाषण से कोई चर्चित बयान निकाल कर उसका माखौल उड़ाते नजर आ रहे थे। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया- अजी ये तो होना ही था, ये टीम इंडिया है टीम इंडिया। जो किसी भी मैच को रोमांचक ही नहीं बनाती बल्कि पहले हार जाए तो आगे जीतने की राह खुल जाती है। पर शायद महापुरुष यह भूल गए कि भाजपा को धूल चटाने वाला बिहार पहला प्रांत नहीं, दिल्ली ने तो इससे भी बुरे दिन दिखाए थे। अब तमाम राजनीतिक पंडित विश्लेषण कर रहे हैं कि आखिर भाजपा की हार के कारण क्या रहे।
दरअसल, जनता नेताओं में अपना पालनहार खोजती है। विकास करो या बेच खाओ पर सज्जनता झलकनी चाहिए। एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने घर-घर जाकर आम जनता से सीधे जुड़कर संवाद कायम किया और अपनी विकास पुरुष की छवि को बनाए रखा। वहीं भाजपा के नेताओं ने सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर डाल दी। अब पीएम साब विदेश से लौटे तब सीधा बिहार भागे। भाजपा की बड़ी भूल बिहार में सीएम प्रोजेक्ट न करना रही। हालांकि कुछ तर्क दिल्ली और बिहार भाजपा को लेकर यह भी है कि हो सकता है रणनीतिकारों ने किसी पर भरोसा ही न जताया हो। उन्हें लगा हो पीएम साब चुनाव जितवा दें बाद में किसी को भी सरकार चलाने को दे दिया जाएगा। बस यहीं चूक हो गई।
बिहार पिछड़ा भले है पर वहां के लोग राजनीतिक तौर पर दूसरे प्रांतों यहां तक कि यूपी से भी ज्यादा सशक्त सोच रखते हैं। जरा आसपास नजर दौड़ाइए, यूपी के गांवों में अखबार कितने घरों में आते हैं पर बिहार के गांवों में अखबारों के पाठक सबसे ज्यादा हैं। एक तरफ देश का प्रधानमंत्री बिहारियों से अनाम नेतृत्व के लिए वोट मांग रहा था तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार के दस साल के विकास की छवि मतदाताओं की आंख में बनी हुई थी।
मोदी ने इस बार सकारात्मक रूप से केवल विकास की बात की होती तो जनता को वादों में सच्चाई नजर भी आती पर वे तो उल्टे-सीधे जुमलों, बोरिंग संवादों और विपक्ष के कुछ हल्के नेताओं के बयानों के जवाब को ही चुनाव पेज की लीड बनाते गए। ग्रामीण जनता भी रंगीन पन्नों की तरह उड़नखटोले से उड़कर भारी तामझाम के साथ पहुंचे प्रधानमंत्री को देखने यूं ही चली जाती। भाजपावालों को लगता मोदी लहर पर यहां तो तूफान से पहले का सन्नाटा छाया हुआ था जिसे भांपने में बड़ी गलती हुई।
संघ प्रमुख, भाजपा अध्यक्ष से लेकर गिरि, साध्वी, योगी जैसे बड़े चेहरों ने टीवी पर अपने बयानों से ऐसा माहौल बनाया कि लगने लगा जैसे इनकी बात न मानने वाले सारे देशद्रोही मान लिए जाएंगे। असहिष्णुता जैसी कोई दूसरी बात थोड़े ही है। यह सब इनके मुंह से निकली जहरीली भाषा का ही दुष्परिणाम है। अब इनके लोग ही इन्हें सीख लेने की नसीहत देते फिर रहे हैं। पार्टी को बड़ी ही सहजता के साथ कथित घमंडी चोले को समझने और उतार फेंकने की जरूरत है। राष्ट्रवादी होना देशभक्ति की बात है पर हम ही ठीक बाकी सब गलत, ये भावना कम से कम नेताओं के पेशे से मेल नहीं खाती है।
एक बड़ी बात प्रचार के तरीके में भी रही जब बिहार में कोई नेतृत्व था ही नहीं तो किसी भी नेता ने खुद को जिम्मेदारी के खांचे में बांधा भी नहीं। सभी मोदी लहर में विधानसभा पहुंचने के दिवास्वप्न देखने लगे। दूसरी तरफ लालू के पास खोने को कुछ नहीं था, तो उन्होंने जीरो से शुरू किया जबकि नीतीश ने मोदी के ही पुराने रणनीतिकार की मदद से जबरदस्त माहौल बनाया। ये वही हैं जिनकी शानदार प्रचार प्रस्तुति ने लोकसभा चुनाव में जनता को मोदी का दीवाना बना दिया था। यकीन न हो तो नीतीश के प्रचार के लिए बनाया गया कोई एक एड सुन लीजिए यूट्यूब पर... शानदार जबरदस्त जिंदाबाद।
मोहन भागवत के आरक्षण के विवादित बयान से पहले जदयू-राजद के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था पर इसी बयान ने उन्हें बैठे बिठाए बीजेपी पर हावी कर दिया। बाद में पीएम ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। लालू ने यही मुद्दा उठा लिया और जनता को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वह आरक्षण ही नहीं पिछड़े और दलितों के अधिकारों पर कैंची चलने नहीं देंगे। एक तरह से मतदाता के इसी डर का फायदा उठा लिया महागठबंधन ने। शाह यह जातिगत समीकरण हल नहीं सके। ऊपर से स्थानीय नेताओं पर कम भरोसा और टिकट बंटवारे की रणनीति भी भाजपा की विफल ही रही।  वैसे बिहार चुनाव के परिणाम से नीतीश की कुर्सी भले बच गई पर फायदा तो लालू और सोनिया को ही हुआ। लालू ने अपना जनाधार फिर से मजबूत कर लिया और लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से वेंटिलेटर पर चल रही कांग्रेस को बिहार से संजीवनी मिल गई। अब यूपी में कांग्रेस से उम्मीदें बढ़ गई हैं। लालू भी राष्ट्रीय पटल पर सक्रियता बढ़ाएंगे।
अब क्या, यूपी समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा की रणनीति क्या होगी। जो भी हो, पर नेता अपना घमंड उतार फेंके और जमीनी हकीकत को समझते हुए समीकरण बनाएं तभी बात बनेगी अन्यथा बड़े-बड़े सूरमा हवा हो जाएंगे। चलिए अच्छा है अब पार्टी में ओवरहालिंग हो जाएगी। शत्रु और सिंह का क्या होगा, चैनलों में बड़ा कौतूहल है।
खैर, बहुत हो गया चुनाव। अब एक महत्वपूर्ण बात और आज की बात खत्म। लोकतंत्र में किसी एक पार्टी या नेता का राज्य के परिदृश्य से उभरकर देश और फिर सभी राज्यों को आसमान की तरह अपने आगोश में बटोरते जाना उनके समर्थकों के लिए भले ही ठीक हो पर आम जनमानस और लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं। अहम आ जाता है फिर जाता है जनता से ही। नमस्ते.... कुछ असहिष्णुता झलक आई हो तो माफी। 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बस इतना चाहते हैं सरकार...

कि आप बोलें, कुछ तो मुंह खोलें
आप हैं जो नहीं बोल रहे
बाकी सब बहुत बोल रहे

सब कह रहे, सब सुन रहे हम
देश को क्या हो गया है
माहौल खराब हो गया है

कोई कह रहा
संघ, शिवसेना वगैरह
हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर बढ़ रही आगे
किसी ने सम्मान लौटाया, तो किसी ने सवाल उठाया

पर हम डिगे नहीं
हमें यकीन है खुद पर देश पर और
सवा अरब भारतीयों की देशभक्ति, भाईचारे पर

फिर भी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था
इसीलिए आपसे करबद्ध निवेदन है
बस, बहुत हो गया
चुनाव तो जीते-हारे जाते हैं
देश की एकता पर चोट दुस्साहस है
उनका, जो गलत मंशा पाले हैं
इसीलिए हम कह रहे हैं अपना खास हो
या हो सहयोगी
कुछ कार्रवाई तो करिए
लगे, हां सरकार हमारे वैसा नहीं होने देंगे
जैसा कह कुछ लोग डरा और डर रहे हैं

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
हम सब इस देश के हैं और
यह देश हमारा है
अब तो दिखा दो हुजूर
... बस इतना ही चाहते हैं सरकार

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भावनाओं को समझो

बचपन से ही मैंने अपने घर में भोजन से पहले एक रोटी, थोड़ा चावल, सब्जी, दाल व रायते का भी एक अंश थाली से बाहर निकालने की परंपरा देखी है। पिताजी के भोग लगाने के बाद झट से मेरी या छोटे भाई की ड्यूटी रहती थी कि लो, इसे गऊ माता को खिला के आओ। मैं कम ही तैयार होता क्यूंकि मुझे डर लगता था। दरअसल गाय-भैंस के नजदीक जाने पर अक्सर वे अपनी सिंगों को आपकी तरफ कर देती हैं। इतने में तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। यही नहीं, पिता जी का सख्त निर्देश था कि रोटी हाथ से खिलाई जाएगी, जमीन पर रखकर या हौदे में डालकर नहीं। मुझे डर था कि ‌खिलाते समय गाय मेरी उंगली न चबा ले। एक और महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना चाहूंगा। मेरे गांव में एक खास वर्ग के कुछ लोगों को गाय बेचने पर अघोषित पाबंदी थी। हमें डर होता था कि ज्यादा पैसे कमाने के लिए शायद वे जानवरों को कसाई को बेचते थे।

अब बात करते हैं चुनावी मौसम में बीफ विवाद की। जन्म देने वाली मां के अलावा हिंदू धर्म में धरती, गऊ और तुलसी को भी माता का दर्जा हासिल है। तो इस बात में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह तो आस्था की बात है और जहां आस्‍था होती है वहां पत्‍‌थर में भगवान दिखते हैं, काबा में अल्लाह और गिरजाघर में जीसस क्राइस्ट। ऐसे में 5000 साल से चली आ रही सनातन परंपरा को बेहतर तरीके से पेश करना जरूरी है, जिसका अभाव दिखता है। गोमांस के आरोप में नोएडा के एक गांव में एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या को किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद देशभर में गोमांस की अफवाह या भड़काऊ भाषणों ने ऐसा माहौल तैयार किया, जो भारत की शांतिपूर्ण समभाव वाली संस्कृति के बिल्कुल उलट है। एक तबका खुद को मॉडर्न ख्याल का बताते हुए खुलेआम गोमांस खाने की छूट चाहता है तो दूसरा समूह उनका है जो खुद को हिंदुओं के स्वघोषित लंबरदार और गऊ माता के पालनहार साबित करने में जुटे हैं। इन सबके बीच वो हिंदू नदारद हैं जो बरसों से मुसलमानों के घर ईद की सेवईंया खाते आ रहे हैं और वे मुस्लिम भी नहीं जो हिंदू के घर बड़े शानोशौकत से समारोह में शरीक होते हैं। तो कौन हैं ये लोग? हम क्यों भड़क जाते हैं इनकी बेतुकी बातों से? यह सवाल हिंदुओं ही नहीं मुसलमानों को भी अपने आप से करना चाहिए। अच्छा होता इस जघन्य अपराध के बाद हालात को संभालने का काम किया गया होता पर नहीं, बिसाहड़ा में राजनेताओं की बाढ़ ऐसे आई जैसे जितने ज्यादा नेता आएंगे उतनी जल्दी इकलाख वापस आ जाएगा।

 दरअसल, गोमांस खाने, न खाने का विवाद तो है ही नहीं। विवाद एक दूसरे पर अपनी बात को थोपने का है। कोई अपने घर में क्या खाता है उससे किसी को क्‍या लेना देना लेकिन अगर आप खुलेआम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए गोमांस खाने की छूट मांगेंगे तो माहौल तो बिगड़ेगा ही। तरह-तरह के तर्क रखे जा रहे हैं। ऋषि-मुनि भी मांस खाते थे, वगैरह-वगैरह। अब जरा अपने दिमाग पर जोर डालिए, ऋषियों के समय क्या दाल-चावल, शाही पनीर, आलू की भुजिया या फिर कोफ्ता का प्रचलन था। अगर नहीं तो खानाबदोश जीवन में लोगों के लिए मांस ही आहार का मुख्य साधन था। लेकिन जब तुलसीदास जैसे ज्ञानियों ने रचनाएं की तो उन्होंने उन घटनाओं को दूर रखा जो उस समय के समाज से मेल न खाती हो पर पहले से चली आ रही हो। इसीलिए वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी कुछ अंतर देखने को मिलता है। जैसे-जैसे शास्‍त्र लिखे गए, उनमें सनातन परंपरा का भी उद्धरण पंक्तिबद्ध किया गया। क्या उस दौर और आज के युग की समानता करना उचित है? अगर आपके बगल में कोई परिवार गाय की हर रोज पूजा करता है तो क्या उसे यह बर्दाश्त होगा कि कोई उसी गाय को मार के खा जाए। अब लोग दक्षिण भारत या फिर नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण दे रहे हैं। अरे भैया, जैसा देश वैसा भेष... यहां देश का मतलब वह इलाका है जहां हम रहते हैं।
दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों में गायों को काटा जा रहा है, भारत के हिंदू उन देशों में रोक की मांग करते तो स्वतंत्रता का सवाल बनता। अपने देश में जानवर का मांस ही खाना है तो करीब 30 करोड़ जानवरों की आबादी है एक को छोड़कर खाते रहिए। गोमांस के एक समर्थक ने कहीं लिखा कि गरीबों के लिए जरूरी पोषण का यह मुख्य स्रोत है। हमें ऐसे लोगों की समझ को बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। भाई साब, गाय को मार के खा जाएंगे कितने दिन चलेगा? उसी गाय को घर में पालिए, रोज दूध, दही खाएंगे तो पोषण नहीं मिलेगा क्या? आजकल तो पशुपालन के लिए सरकार लोन भी दे रही है।

खैर, मैं किसी को कुछ भी खाने से रोक नहीं रहा न तो रोक सकता हूं और जिसे रोका नहीं जा सकता उस पर पों पों करना कोरा बकवास है। मेरा जोर बस एक बात पर है कि अगर आस्‍था है तो भावनाएं हैं और भावनाएं हैं तो वो आहत भी हो सकती हैं। हमें इसका ख्याल रखना चाहिए। कुछ लोग डॉ. अंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि ऋगवेद में लिखा है कि उस समय लोग गाय का मांस खाते थे। यानी गाय को पूज्यनीय मानने से पहले ब्राह्मण भी गोमांस से परहेज नहीं करते थे। ठीक बात है, पर ये बताइए उस समय कबायली या खानाबदोश जीवन में मांस के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी था क्या? ये किसी ने न बताया न लिखा।
इकलाख को क्यूं और किसने मारा यह तो जांच में सामने आएगा पर लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है। बिहार चुनाव से ठीक पहले सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने या ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति तो नहीं है? इसकी भी जांच होनी चाहिए।

कश्मीर के इंजीनियर रशीद हों या केरल का कोई ब्राह्मण संपादक, अगर आप गाय का मांस खाना चाहते हैं तो बेझिझक खाएं पर इस एहतियात के साथ कि इसी देश में आपके ही मुहल्ले में कुछ लोगों को यह गंवारा नहीं है। स्लॉटर हाउस केवल मुस्लिम भाई के ही हैं ऐसा भी नहीं है। मुद्दा बस एक है भावनाओं को समझो। हमें एक बात और समझनी होगी कि ऐसे वाकये हमारी भाईचारे की पहचान को कलंकित करते हैं। नमस्ते लंदन के उस सीन को याद ‌कीजिए जब अक्षय कुमार कहते हैं कि हम उस देश से आते हैं जहां एक कैथोलिक सिख के लिए पीएम की कुर्सी छोड़ देती है और सिख एक मुस्लिम राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है। उस समय हमारा माथा फक्र से ऊंचा हो उठता है।

बेशक आप मेरी बातों की मुखालफत कर सकते हैं। कट्टर, संघी या फिर कुछ और कह सकते हैं अनुरोध बस इतना है कि फिर से ऐसा माहौल बनाइए कि बिसाहड़ा में किसी इशरार के घर कोई अनुराग सेवईं खाने को बेझिझक जाए और श्याम के घर पार्टी में शरीफ भी बेखौफ पहुंचे।