अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। ओबामा के बाद सुपरपावर अमेरिका का कमांडर इन चीफ कौन होगा, यह जानने की उत्सुकता दुनिया भर के लोगों में है। विवादित बयानों से सुर्खियों में आए डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदवारी रिपब्लिकन पार्टी से पक्की हो गई है जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी से हिलेरी क्लिंटन सबसे आगे हैं। पांच राज्यों में क्लीन स्वीप और फिर इंडियाना में शानदार जीत के बाद ट्रंप को 1237 प्रतिनिधियों के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए अब महज 190 डेलीगेट की दरकार है। इधर, उनके दो बड़े प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज और जॉन कैसिच ने दावेदारी वापस ले ली है। इससे ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती खत्म हो गई है। एक तरफ अरबपति कारोबारी रिपब्लिकन ट्रंप को विवादों की लहर का फायदा मिलता दिख रहा है तो वहीं अनुभवी डेमोक्रेट पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी आगे चल रही हैं पर चुनावी फिजा उतनी दमदार नहीं है क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों को भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।राष्ट्रीय हित की बात तो हर नेता करता है ऐसे में यह समझना दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि अमेरिका फर्स्ट की बात करने वाले ट्रंप में खास क्या है जो वे अमेरिकियों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। शायद एक सबसे बड़ी बात जिससे वे सुर्खियों में आए वो था मुस्लिमों को अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी का उनका विवादित बयान। वैसे तो इस तरह का बयान लोकतांत्रिक नेता को शोभा नहीं देता पर इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया जिस दहशत में है उसी का परिणाम है कि बिना ज्यादा सोचे अमेरिकी ट्रंप के समर्थन में आ गए हैं और ध्रुवीकरण शुरू हो गया है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के सुपरपावर बनने पर बड़े युद्ध तो नहीं हुए लेकिन नई चुनौतियां जरूर खड़ी हुईं। महाविनाशक हथियार बने, लंबी दूरी की मिसाइलें आ गईं, साइबर वार छिड़ा और सबसे खतरनाक आतंकवाद और कट्टरपंथ ने जड़ें जमानी शुरू कर दी। अमेरिका को हिलाकर रख देने वाले 9/11 की घटना के बाद नीतियां बदलने से सुरक्षा मजबूत तो हुई पर कई गंभीर समस्याओं ने देश को जकड़ लिया। अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, रोजगार घटे, असमानता और मौतें बढ़ीं, ऐसे में सुरक्षा पर खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ा, इन सबके बीच अमेरिका को सुपरपावर बनाए रखते हुए सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर पाना चुनौतीपूर्ण हो गया। अब नए राष्ट्रपति इससे कैसे निपटते हैं, यह भविष्य की गर्भ में है लेकिन ट्रंप ने चुनावी प्रचार और डिबेट के दौरान अपनी नीतियों को जिस बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है उससे मतदाताओं में उनके प्रति भरोसा बढ़ा है। प्राइमरी चुनाव के नतीजे इसका प्रमाण हैं। मुद्दा कोई भी हो अवैध अप्रवासियों को रोकने का, मैक्सिको सीमा सील करने या इस्लामिक कट्टरपंथ के सफाए का। दरअसल अमेरिका के लोग सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते। ओबामा के कार्यकाल में देश में कोई बड़ा हमला तो नहीं हुआ पर दुनिया में अमेरिकियों के मारे जाने का सिलसिला भी नहीं थमा। अकेले इराक और अफगानिस्तान में ही 6,845 अमेरिकी मारे गए और नौ लाख घायल हो गए। अब जनता ऐसा राष्ट्रपति चाहती है जो जवानों की जान का सौदा किए बिना सुरक्षा दे और दुनिया में अमेरिका के दबदबे को कायम रख सके। ट्रंप यह भलीभांति समझते हैं इसीलिए वे बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि दुनिया भर में अमेरिकियों की सुरक्षा ट्रंप प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।
प्रधानमंत्री मोदी की तरह ट्रंप लिखा हुआ नहीं पढ़ते। इससे वे जनता से सीधे जुड़ पाते हैं क्योंकि वह सरल और जमीनी बातें कर रहे होते हैं। वे भाषण के दौरान विरोधियों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकते। या यूं कहें उन्हें जनता को लुभाने की कला आती है। वे कहते हैं कि अमेरिका ने दुनिया को नाजियों और जापानियों से बचाया। लेकिन आज अमेरिका का कद घट गया है। हमारी विदेश नीति लड़खड़ा गई है। इराक, मिस्र, लीबिया, सीरिया हर जगह हम नाकाम रहे। आज जरूरत है एक मजबूत नेता कि जो अमेरिका का गौरव और रुतबा लौटा सके। रियल एस्टेट कारोबारी ट्रंप कारोबार, आव्रजन, अर्थव्यवस्था, रोजगार और सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं।
ट्रंप अमेरिका की मौजूदा सैन्य ताकत को पहले से कमजोर बताते हैं। 1991 में अमेरिका के सक्रिय सशस्त्र बल की तादाद करीब 20 लाख थी जो घटकर 13 लाख रह गई है। नौसेना के एक्टिव शिप 316 बचे हैं। वायुसेना की ताकत तिहाई रह गई है। सैन्य बजट भी घटा है। उधर, आईएसआईएस, अल कायदा, तालिबान, बोको हराम जैसे आतंकी संगठन हैं जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की साजिश रच रहे हैं। ट्रंप में लोग ऐसा दमदार नेतृत्व देख रहे हैं जो बेझिझक सियासत किए बिना देशहित में फैसले ले सके।
हकीकत यह है कि आज अमेरिका का चीन से कारोबार घाटा बढ़ा है, सीमाएं खुलने से अवैध तरीके से घुसपैठ बढ़ी है। आज बेरोजगारी दर पांच फीसदी तक जा पहुंची है। ट्रंप का दावा है कि घर की माताओं, बुजुर्गों और किशोरों की बेरोजगारी को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 93 मिलियन (कुल आबादी 323 मिलियन) पहुंच जाएगा। उत्तर कोरिया जैसा छोटा सा देश अमेरिका को धमकी देता है। सऊदी अरब आंख दिखा रहा है। इसके लिए वे ओबामा की विदेश नीति को जिम्मेदार बताते हैं। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले देशों को उजागर न करने, मध्य पूर्व में अस्थिरता और ईसाइयों को आतंकियों से न बचाने के मुद्दे को उन्होंने जोरशोर से उछाला है। एक तरफ वे चीन और भारत पर नौकरियां छीनने का आरोप लगाते हैं तो वहीं रूस से शत्रुता भुलाकर शांतिपूर्ण संबंध की भी वकालत करते हैं। उनका मत साफ है कि अमेरिकियों को पहली प्राथमिकता मिलेगी।
ट्रंप जीतते हैं तो आतंकवाद के खिलाफ भारत को पूरा सहयोग मिल सकता है। पाकिस्तान के परमाणु जखीरे के कारण ट्रंप उसे दुनिया का संभवत: सबसे खतरनाक मुल्क भी करार दे चुके हैं। उनका संकेत साफ है कि जिन देशों से मदद के बदले में धोखा मिलता है, उन्हें धन रोका जाएगा। अमेरिका से पाक को अरबों डॉलर की मदद मिलती रही है। अब लड़ाकू विमान एफ-16 भी देने की बात चल रही है। ओबामा ने 2016-17 के लिए पाक को 860 मिलियन डॉलर की मदद देने का प्रस्ताव रखा है। ट्रंप जीते तो यह सब बंद होगा या फिर पाक को आतंकियों के प्रति नरमी छोड़नी होगी। यह रवैया भारत के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि विदेशी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार में करता रहा है। हालांकि आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। एच1बी वीजा पर ट्रंप अपना पुराना विरोधी रुख बदल रहे हैं। ट्रंप ग्रुप ने पुणे और मुंबई में दो रियल एस्टेट कंपनियों के साथ मिलकर अपार्टमेंट प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है। आने वाले समय में यह कारोबारी रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।
अब देखना यह है कि ट्रंप अगर व्हाइट हाउस पहुंचते हैं तो वह अपने वादों को कितना अमलीजामा पहना पाते हैं या फिर सब चुनावी जुमले ही साबित होंगे।