रविवार, 21 फ़रवरी 2016

जेएनयू प्रकरण में थोड़ी समझ सबको दिखानी चाहिए थी


देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारेबाजी की दुस्साहसपूर्ण घटना के बाद देशभर में हो रहे प्रदर्शन और दो खेमों में लोगों के बंटने के बाद यह विश्लेषण जरूरी है कि
वास्तव में मीडिया, राजनेताओं और समाज के आम लोगों ने इस मामले को किस तरह से लिया। और क्या वह तरीका सही था। दो दिनों में मैंने दिल्ली में करीब एक दर्जन लोगों से बात कर इस ज्वलंत मुद्दे
पर उनके विचार जानने की कोशिश की।
आपको जानकर हैरानी होगी कि कोई भी मामले को गहराई से न समझा और न ही उसकी इसमें रुचि है। वो तो बस भड़क गया, एक उकसावे पर। मैं भी। सभी एकसुर में जेएनयू को अलगाववादियों का अड्डा और उसे बंद करने की भी बातें करने लग गए।
फौरन बाद ही विवाद ने सियासी चोला पहन लिया। सड़कें लाल और भगवा झंडे से पट गईं। यहां तिरंगे की बात नहीं करूंगा क्योंकि यह सियासत से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। मेरा मानना है कि
आपकी विचारधारा कोई भी हो, आपको मुबारक। पर देश, देश का झंडा, एकता-अखंडता के नाम पर पहले राष्ट्र की भावना की आपसे अपेक्षा की जाती है। कुछ लोग इसे जबरदस्ती संघी विचारधारा को
थोपना कह रहे हैं। यहां एक सवाल उठता है कि पार्टी पॉलिटिक्स और छात्र राजनीति में कोई अंतर है भी कि नहीं। नेताओं की सियासत का अड्डा विश्वविद्यालयों को बनने क्यों दिया जा रहा है। नेताओं और
पार्टियों के हितों को साधने का जरिया पढ़ने वाले छात्र न बनें इस बात का किसी को ख्याल है या नहीं। क्योंकि राजनीतिक लोग 24 घंटे सातों दिन बस सियासत करते हैं और पढ़ाई करने वालों को तो
भविष्य बनाना है, अपना और परिवार की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना है। अब इस हंगामे के बाद नुकसान तो पढ़ने वालों का ही हो रहा है। जबकि चैनलों को दर्शक मिल रहे हैं। विश्लेषक अपना ज्ञान
बघार रहे हैं। अखबारों के पेज भर रहे हैं। पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही है। किसी का काम खराब हुआ तो वो सिर्फ और सिर्फ पढ़ने वाले हैं। हां जिन लोगों ने देशविरोधी जहर उगला उनके खिलाफ
कार्रवाई हो, यह पूरा देश चाहता है।
अब पीछे चलते हैं-
चैनलों पर दिखाए गए वीडियो को देख सभी में देशभक्ति की भावनाएं हावी हुई। होनी भी चाहिए, मैंने जब पहली बार सुना- भारत तेरे टुकड़े होंगे... यकीन मानिए तलवार और गोली की बात ही जेहन में कौंध गई। गुस्साए लोगों का ताप अपनी जगह जायज है। हां, देशभक्ति किसे कहते हैं इसमें भी सब की राय जुदा है। पर यहां तो एक वीडियो से लोगों को उकसाया गया। आप शायद अब भी न समझें होंगे
कि उकसाया कैसे गया। दरअसल नापाक हरकत की मंशा दो चार लोगों की थी, बाकी के लोग तो संघ और बीजेपी का विरोध करने के लिए जुटते चले गए जो विचारधारा में मतभेद की बात है। जोशीले
नारों के बीच ऐसा लगता है कि मास्टरमाइंड ने पांच- दस लोगों के सहयोग से कश्मीर और भारत विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए।
अब आपको एक पत्रकारिता की गूढ़ बात समझाता हूं। कश्मीर में जुमे की नमाज के बाद कुछ लोग अक्सर मस्जिद से आती भीड़ के आगे खड़े होकर पाकिस्तान या आजादी या फिर आईएसआईएस का
झंडा लहराते हैं और विरोधी नारे लगा देते हैं। विश्व मीडिया में गई तस्वीरों में लगता है मानों कश्मीर में बड़ा जुल्म हो रहा है और वहां बगावत की आंधी उमड़ रही है जबकि चंद लोग होते हैं जो यह विवाद
सुलगाए रखना चाहते हैं और इसमें आजादी जैसा कुछ नहीं सियासत साधने की मंशा रहती है। गरीबों, मजलूमों की फिक्र इन्हें नहीं होती। इसे कुछ भारतीय अखबारों और चैनलों ने समझा और इस
प्रोपगेंडा की कवरेज सीमित होती है या नहीं की जाती है। ऐसे में जेएनयू प्रकरण में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सावधानी क्यों नहीं बरती। हम तो पूछेंगे, तेज, सर्वश्रेष्ठ, आपसे आगे चलने वालों ने उत्तेजक
और देश विरोधी बातों को सार्वजनिक क्यों कर दिया।
मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाक में भारत विरोधी बातें करता है तो अखबार के लोग भारत के खिलाफ उगला जहर से काम चलाते हैं। इस खबर को अक्षरश: लिखा भी जा सकता है लेकिन
यही तो आतंकी या अराजक तत्व चाहते हैं कि वे कुछ ऐसा करें कि विवाद खड़ा हो और जबरन सुर्खियां बने। हमें इनके मंसूबे को तोड़ना होगा।
आज का दौर टीवी का है। भारत में सोचने समझने की क्षमता रखने वाले जिस किसी भी शख्स के कानों में ऐसी देशविरोधी नारों की गूंज सुनाई देगी, उसका खून खौलेगा ही। इस मामले में भी विवाद के
तेजी से बढ़ने की यह प्रमुख वजह रही। पर क्या आग को हवा देने से पहले मीडिया ने सधी हुई रिपोर्टिंग की। अगर कल को कन्हैया के सभी विवादित वीडियो गलत निकले जैसा कि वामपंथी छात्र और
जेएनयू के लोग दावा कर रहे हैं तो क्या मीडिया संस्‍थानों के खिलाफ कार्रवाई होगी। अगर वीडियो सच भी निकलता है तो इस तरह खुलेआम देशविरोधी वीडियो को चैनलों पर प्रसारित कर देना क्या एक
उचित फैसला था। क्या चैनल वालों को यह पता नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया भयावह होगी। पर कड़वी सच्चाई है कि टीवी चैनल यही तो चाहते हैं कि विवाद हो और ज्यादा से ज्यादा दर्शक उनका चैनल
देखें। मेरा ऐसा मानना है कि टीवी मीडिया से रिपोर्टिंग में थोड़ी सी चूक हुई। अब कई फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी कन्हैया की बनाई जा रही है। जैसे सुप्रीम कोर्ट ने उसे देशद्रोही ठहरा दिया हो। बाकी गद्दार
कौन हैं और कहां हैं। उनकी धरपकड़ चल रही है।
कुछ दिन पहले जेएनयू के जानेमाने प्रोफेसर और साहित्यकार मकरंद परांजपे को सुनने का मौका मिला। विषय गांधी, अंबेडकर और नेहरू था पर जेएनयू विवाद ही छाया रहा। डॉ. परांजपे ने साफ कहा
कि जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इसका कोई समर्थन नहीं करता और पर पूरे मामले में दोनों पक्षों ने अहिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। he said please do not use
political weapon to protest. there are multiple type of intolerence. politics is कामधेनु in our country. Listening is an act of अहिंसा but in
this case कोई भी किसी की नहीं सुन रहा। लोग बस भड़क रहे हैं। मीडिया ट्रायल हो रहा है जबकि असली दोषी अभी गिरफ्त से बाहर हैं। बापू और अंबेडकर में भी मतभेद थे और सार्वजनिक तौर
पर थे लेकिन वे साथ-साथ रहते और काम करते थे। चिल्लाना, नारेबाजी भी एक प्रकार की हिंसा ही है। जेएनयू विवाद के राजनीतिकरण ने विचारधारा को मायावी बना दिया है। he said we
should be active not reactive. first understand, feel and then if very necessary speak.उन्होंने मामले को हैंडल करने के लिए दोनों पक्षों को गलत ठहराया।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले लोगों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सच्चाई को सुनना और समझना चाहिए था और
सड़क पर उतरने वालों को कानून पर भरोसा रखना चाहिए।
इसी कार्यक्रम में सुविख्यात लेखक पद्मश्री एसएल भयरप्पा भी मौजूद थे। उन्होंने बड़ी ही कड़वी मगर सौ फीसदी सच बातें कहीं। इतिहास के पन्ने पलटते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने कुछ मुसलमानों को
भड़काया था कि हम चले गए तो हिंदू तुम पर राज करेंगे। इससे अच्छा है कि हमी शासन करें। उन्होंने मुसलमानों को इतना डरा दिया कि वे आजादी भूल अंग्रेजों को अपना हमदर्द मानने लगे और विद्रोह
कमजोर हुआ। आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वही रास्ता अपनाया। अंग्रेजों की तरह मुसलमानों को भड़काया कि हिंदू क्रूर हैं। ऐसे में देश को बांटकर राज करने की परंपरा अनवरत जारी रही। किसी ने
मुसलमानों को ये समझाने की कोशिश नहीं कि देश आपका है तो कोई आपसे जोर जबरदस्ती कैसे कर सकता है। यह पाकिस्तान नहीं भारत का लोकतंत्र है। नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानों को
अल्पसंख्यक दर्जा दिलाया पढ़ने, रोजगार पाने या किसी कल्याणकारी कार्य के लिए नहीं धार्मिक पहचान दिलाने के लिए, जो उनका वोट बैंक बना। ऐसी राजनीति बंद होनी चाहिए।
वास्तव में जेएनयू को नेताओं ने अपना अखाड़ा बना लिया और इस अखाड़े को महिमामंडित किया मीडिया ने। कहा तो यह भी जा रहा है कि जेएनयू के जरिए भाजपा शैक्षिक संस्थानों पर पकड़ मजबूत
करना चाहती है तो दूसरी तरफ वामपंथी दल विधानसभा चुनावों के लिए दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं सच क्या है पर इतना ता सबको समझना चाहिए कि
राजनीति जारी है।
बाकी चार लोगों के नारों से हिमालय पर पड़ी एक किलो बर्फ भी पिघलने वाली नहीं है टुकड़े ये क्या करेंगे देश के। नादान हैं या तो जीवन भर चक्की पीसेंगे या कहीं गोली खाकर टें हो जाएंगे। पर दोस्तों
थोड़ा सब्र कर लो। विरोध करो हिंसा नहीं।

बाकी अब तो उमर खालिद समेत देशद्रोह के 10 आरोपी भी कह रहे हैं कि वे देशविरोधी नहीं है। ये विश्वविद्यालयों की लड़ाई है। ऊपर वाला जाने जब सभी देश के हित में सोच रहे हैं तो टुकड़े होंगे इंशाल्लाह ----- के नारे कौन लगा रहा था। जांच का विषय है।

जय हिंद
#nationfirst