धर्म हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाता है पर खुद को मुसलमान कहने वाले कुछ भटके हुए लोग इस्लाम के नाम पर लोगों का खून बहा रहे हैं। हाल में इनकी क्रूरता का शिकार बांग्लादेश हुआ है। यहां एक कैफे में घुसकर हमलावरों ने कुरान की आयतें न पढ़ पाने वाले गैर मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा। वैसे तो यहां पहले से ही कुछ कट्टरपंथी संगठन और पार्टियां सक्रिय हैं पर शेख हसीना की सरकार में इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में थोड़ी कामयाबी मिली। मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने वालों को फांसी पर लटकाए जाने से भड़के कट्टरपंथियों ने
अब आतंकवाद को आयातित करना शुरू कर दिया है। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट भी दक्षिण एशिया में पांव पसारने की कोशिश में है, ऐसे में गरीब और धर्म के नाम पर उकसाए गए कुछ बांग्लादेशी युवा उनके बहकावे में आ रहे हैं। देश का पहला बड़ा आतंकी हमला इसी का परिणाम है। हसीना सरकार की बड़ी नाकामी यह है कि महीनों से हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की हत्याएं हो रही हैं पर उन्होंने शायद राजनीतिक हित साधने के लिए आंखें मूद रखी थीं। जब बड़ा हमला हुआ तो उनको देश के हमलावरों को धिक्कारते हुए कहना पड़ा कि आप कैसे मुसलमान हैं।
वैसे, हसीना की पार्टी धर्मनिरपेक्ष है इसीलिए 1953 में ही बांग्लादेशी आवामी लीग ने अपने नाम से मुस्लिम शब्द हटा दिया था पर आज इससे अल्पसंख्यकों की रक्षा होने वाली नहीं है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय कट्टरपंथियों के निशाने पर है। युवाओं के तेजी से कट्टरपंथ और हिंसा की राह पकड़ने की मूल वजह को हमें समझना होगा। दरअसल, युवाओं में भड़काई गई धर्मांधता उन्हें दूसरे धर्म के लोगों को दुश्मन मानने को मजबूर कर देती है। इस आग में घी डालने का काम करते हैं धार्मिक उपदेशकों के अस्पष्ट और एकतरफा भड़काऊ विचार। वैसे, रिलीजियस प्रीचर हर धर्म के होते हैं, जिनका काम धर्म की अच्छाइयों का प्रचार प्रसार करना होता है। पर ढाका हमले में आतंकियों के विवादास्पद भारतीय मुस्लिम धर्म प्रचारक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित होने की खबरें सामने आने के बाद इस पर बहस होनी चाहिए कि ऐसे लोगों की समाज में भूमिका क्या है और क्या होनी चाहिए। नाइक कई सालों से देश-विदेश में बड़ी-बड़ी सभाओं में मुस्लिम धर्म का गुणगान कर रहे हैं। इसमें किसी को भी समस्या नहीं होनी चाहिए पर इन सभाओं में उनके तीखे बोल युवाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं इस पर बहस की जा सकती है।
एक सभा में गैर मुस्लिम युवक ने मुस्लिम और आतंकवाद पर सवाल पूछा। आतंकवाद को सिरे से खारिज करने की बजाए नाइक बतलाने लगे कि मेरी नजर में सबसे बड़े आतंकी अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। इराक, अफगानिस्तान समेत दुनिया के तमाम मुल्कों में फैली हिंसा को वे महाभारत की लड़ाई से जोड़ते हैं। कहते हैं हिंदू मजहब में आपस में ही हिंसा होती आई है। कुरान से ज्यादा लड़ाई-झगड़ों का जिक्र महाभारत में है। वह उदाहरण देते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि लड़ोगे तो स्वर्ग में जाओगे। इसका मतलब अप्रत्यक्ष तौर पर वे मौजूदा आतंकवाद को गलत नहीं मानते। वह जिहाद की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि अपने हक की लड़ाई लड़ना जिहाद है और वह फलस्तीन समेत कई जगहों पर लड़ रहे मुसलमानों को असली जिहादी साबित कर देते हैं। इस पर सभा में मौजूद हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ तालियां बजाकर समर्थन जाहिर करती है। जबकि महाभारत की लड़ाई अधर्म और अन्याय के खिलाफ थी, ढाका में बेगुनाह लोगों ने कौन सा अन्याय किया था जिन्हें मारा गया। क्या गैर मजहब का होना अधर्म है। शायद कुछ ऐसी ही भड़काऊ एवं बिना सिर पैर की बातें युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। क्या वे सीधे यह नहीं बता सकते थे कि किसी भी बेगुनाह को मारना इस्लाम के खिलाफ है जैसा कि हजारों मौलवी अपने फतवे में कह चुके हैं। क्या इस तरह की तकरीर से बड़ी तादाद में उनके अनुयायी हथियार उठाना अपनी कौम के लिए नेक काम नहीं मानेंगे। बिल्कुल यह संभव है और बांग्लादेशी आतंकियों के नाइक से प्रेरित होने की खबरों से यह साबित भी हो जाता है। यू-ट्यूब पर उनके वीडियो हजारों, लाखों बार देखे जा रहे हैं।
कई हिंदुओं ने अपना तर्क देकर उनका विरोध भी किया है। नाइक इस्लाम को सर्वश्रेष्ठ बताने, नुकीले दांत धरती पर मौजूद ज्यादातर जानवरों का मांस खाने के लिए हैं जैसे विवादित मुद्दों पर अपनी दलील देते देखे और सुने जाते हैं। वह विरोधी सवालों को तुरंत हिंदू धर्म में से उदाहरण उठाकर उसे गलत साबित कर देते हैं। नफरत फैलाने वाली तकरीर के कारण ही नाइक पर यूके, कनाडा और मलयेशिया में प्रतिबंध है। अपने पीस टीवी चैनल के जरिए वह बांग्लादेश में काफी मशहूर हैं। यह चैनल भारत में प्रतिबंधित है।
भारतीय खुफिया एजेंसियों के सतर्क रहने और भारतीय मुसलमानों के आईएस के बहकावे में न आने से आतंकी संगठन का प्रवेश मुश्किल है, इसलिए उन्होंने बांग्लादेश को चुना है। ये संगठन कथित जिहाद में मरने पर युवाओं को जन्नत मिलने का खोखला दावा करता है। ऐसे गलत प्रोपगंडा को फैलने से रोकने के लिए समाज के पढ़े-लिखे, जानकार, संत और मौलवियों की भूमिका अहम है।
दरअसल यह सब हो रहा है क्योंकि सच्ची राह दिखाने वालों की कमी है। नाइक जैसे जानकार लोगों द्वारा युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन उन्हें मरने के लिए नहीं, जिंदा रहकर समाज के लिए कुछ करने को मिला है, जिससे आने वाली पीढ़ी उन्हें याद करे। धर्म कोई भी हो किसी बेगुनाह को मारना सबमें पाप है।