शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

धर्मांधता की छांव में पांव पसार रहा कट्टरपंथ


धर्म हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाता है पर खुद को मुसलमान कहने वाले कुछ भटके हुए लोग इस्लाम के नाम पर लोगों का खून बहा रहे हैं। हाल में इनकी क्रूरता ‌का शिकार बांग्लादेश हुआ है। यहां एक कैफे में घुसकर हमलावरों ने कुरान की आयतें न पढ़ पाने वाले गैर मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा। वैसे तो यहां पहले से ही कुछ कट्टरपंथी संगठन और पार्टियां सक्रिय हैं पर शेख हसीना की सरकार में इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में थोड़ी कामयाबी मिली। मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने वालों को फांसी पर लटकाए जाने से भड़के कट्टरपंथियों ने
अब आतंकवाद को आयातित करना शुरू कर दिया है। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट भी दक्षिण एशिया में पांव पसारने की कोशिश में है, ऐसे में गरीब और धर्म के नाम पर उकसाए गए कुछ बांग्लादेशी युवा उनके बहकावे में आ रहे हैं। देश का पहला बड़ा आतंकी हमला इसी का परिणाम है। हसीना सरकार की बड़ी नाकामी यह है कि महीनों से हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की हत्याएं हो रही हैं पर उन्होंने शायद राजनीतिक हित साधने के लिए आंखें मूद रखी थीं। जब बड़ा हमला हुआ तो उनको देश के हमलावरों को धिक्कारते हुए कहना पड़ा कि आप कैसे मुसलमान हैं।

वैसे, हसीना की पार्टी धर्मनिरपेक्ष है इसीलिए 1953 में ही बांग्लादेशी आवामी लीग ने अपने नाम से मुस्लिम शब्द हटा दिया था पर आज इससे अल्पसंख्यकों की रक्षा होने वाली नहीं है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय कट्टरपंथियों के निशाने पर है। युवाओं के तेजी से कट्टरपंथ और हिंसा की राह पकड़ने की मूल वजह को हमें समझना होगा। दरअसल, युवाओं में भड़काई गई धर्मांधता उन्हें दूसरे धर्म के लोगों को दुश्मन मानने को मजबूर कर देती है। इस आग में घी डालने का काम करते हैं धार्मिक उपदेशकों के अस्पष्ट और एकतरफा भड़काऊ विचार। वैसे, रिलीजियस प्रीचर हर धर्म के होते हैं, जिनका काम धर्म की अच्छाइयों का प्रचार प्रसार करना होता है। पर ढाका हमले में आतंकियों के विवादास्पद भारतीय मुस्लिम धर्म प्रचारक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित होने की खबरें सामने आने के बाद इस पर बहस होनी चाहिए कि ऐसे लोगों की समाज में भूमिका क्या है और क्या होनी चाहिए। नाइक कई सालों से देश-विदेश में बड़ी-बड़ी सभाओं में मुस्लिम धर्म का गुणगान कर रहे हैं। इसमें किसी को भी समस्या नहीं होनी चाहिए पर इन सभाओं में उनके तीखे बोल युवाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं इस पर बहस की जा सकती है।

एक सभा में गैर मुस्लिम युवक ने मुस्लिम और आतंकवाद पर सवाल पूछा। आतंकवाद को सिरे से खारिज करने की बजाए नाइक बतलाने लगे कि मेरी नजर में सबसे बड़े आतंकी अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। इराक, अफगानिस्तान समेत दुनिया के तमाम मुल्कों में फैली हिंसा को वे महाभारत की लड़ाई से जोड़ते हैं। कहते हैं हिंदू मजहब में आपस में ही हिंसा होती आई है। कुरान से ज्यादा लड़ाई-झगड़ों का जिक्र महाभारत में है। वह उदाहरण देते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि लड़ोगे तो स्वर्ग में जाओगे। इसका मतलब अप्रत्यक्ष तौर पर वे मौजूदा आतंकवाद को गलत नहीं मानते। वह जिहाद की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि अपने हक की लड़ाई लड़ना जिहाद है और वह फलस्तीन समेत कई जगहों पर लड़ रहे मुसलमानों को असली जिहादी साबित कर देते हैं। इस पर सभा में मौजूद हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ तालियां बजाकर समर्थन जाहिर करती है। जबकि महाभारत की लड़ाई अधर्म और अन्याय के खिलाफ थी, ढाका में बेगुनाह लोगों ने कौन सा अन्याय किया था जिन्हें मारा गया। क्या गैर मजहब का होना अधर्म है। शायद कुछ ऐसी ही भड़काऊ एवं बिना सिर पैर की बातें युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। क्या वे सीधे यह नहीं बता सकते थे कि किसी भी बेगुनाह को मारना इस्लाम के खिलाफ है जैसा कि हजारों मौलवी अपने फतवे में कह चुके हैं। क्या इस तरह की तकरीर से बड़ी तादाद में उनके अनुयायी हथियार उठाना अपनी कौम के लिए नेक काम नहीं मानेंगे। बिल्कुल यह संभव है और बांग्लादेशी आतंकियों के नाइक से प्रेरित होने की खबरों से यह साबित भी हो जाता है। यू-ट्यूब पर उनके वीडियो हजारों, लाखों बार देखे जा रहे हैं।
कई हिंदुओं ने अपना तर्क देकर उनका विरोध भी किया है। नाइक इस्लाम को सर्वश्रेष्‍ठ बताने, नुकीले दांत धरती पर मौजूद ज्यादातर जानवरों का मांस खाने के लिए हैं जैसे विवादित मुद्दों पर अपनी दलील देते देखे और सुने जाते हैं। वह विरोधी सवालों को तुरंत हिंदू धर्म में से उदाहरण उठाकर उसे गलत साबित कर देते हैं। नफरत फैलाने वाली तकरीर के कारण ही नाइक पर यूके, कनाडा और मलयेशिया में प्रतिबंध है। अपने पीस टीवी चैनल के जरिए वह बांग्लादेश में काफी मशहूर हैं। यह चैनल भारत में प्रतिबंधित है।

भारतीय खुफिया एजेंसियों के सतर्क रहने और भारतीय मुसलमानों के आईएस के बहकावे में न आने से आतंकी संगठन का प्रवेश मुश्किल है, इसलिए उन्होंने बांग्लादेश को चुना है। ये संगठन कथित जिहाद में मरने पर युवाओं को जन्नत मिलने का खोखला दावा करता है। ऐसे गलत प्रोपगंडा को फैलने से रोकने के लिए समाज के पढ़े-लिखे, जानकार, संत और मौलवियों की भ‌ूमिका अहम है।
दरअसल यह सब हो रहा है क्योंकि सच्ची राह दिखाने वालों की कमी है। नाइक जैसे जानकार लोगों द्वारा युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन उन्हें मरने के लिए नहीं, जिंदा रहकर समाज के लिए कुछ करने को मिला है, जिससे आने वाली पीढ़ी उन्हें याद करे। धर्म कोई भी हो किसी बेगुनाह को मारना सबमें पाप है।

क्या कभी नहीं पकड़ा जाएगा मुंबई हमले का गुनहगार

मुंबई हमले के बाद देश में जितनी भी आतंकी वारदातें हुईं ज्यादातर में आतंकियों का हैंडलर पाकिस्तान में बैठा उनका आका हाफिज सईद था। सीमा पार से वह आए दिन घुसपैठ, हमले और कश्मीर में अलगाववादियों को मदद पहुंचा रहा है पर आज तक भारत उसे पकड़कर सजा नहीं दे सका।  2011 में अमेरिकी कमांडो ने रात के अंधेरे में अचानक पाकिस्तान के एबटाबाद में सर्जिकल स्ट्राइक कर अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का काम तमाम कर दिया था। इसके बाद भारत की ओर से भी ऐसी ही कार्रवाई की उम्मीद की गई पर आज भी मुंबई हमले का गुनहगार हाफिज सईद पाक में खुलेआम घूम रहा है। वह भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है पर हम कुछ नहीं कर पा रहे। वह लगातार भारत के लिए खतरा बना हुआ है।
कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद लोगों को भड़काने और अलगाववादियों तक आर्थिक मदद पहुंचाने में भी उसका हाथ है। खुफिया रिपोर्ट है कि अमेरिका से मिली मदद के 100 करोड़ रुपये पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई इन्हीं आतंकियों के जरिए कश्मीरी अलगाववादियों तक पहुंचा रही है। इनका मकसद है कि कश्मीर में कैसे भी अलगाव की आग भड़काए रखी जाए। बुरहान के इनकाउंटर पर बाकायदा हाफिज सईद और सलाहुद्दीन जैसे देश के दुश्मनों ने मिलकर नमाज-ए-जनाजा पढ़ा। पीओके में सईद ने अपने कैंप खोल रखे हैं। इन लोगों ने कश्मीर में युवाओं को उकसाया और जवानों पर पत्थर फेंकवाया। इन पत्थरबाजों के बीच में आतंकी भी भेजे गए जिन्होंने ग्रेनेड भी दागे। इससे साफ है कि हाफिज सईद की जिंदगी का मकसद ही भारत को अस्थिर करना है ऐसे में कश्मीर में अमन बहाली के लिए इस दहशतगर्द को सबक सिखाना जरूरी हो गया है। पर सवाल उठता है कैसे?
पाकिस्तान इसे सौंपने की बात तो दूर, कार्रवाई भी नहीं करेगा। मुंबई हमले मामले की कोर्ट में चल रही सुनवाई का हश्र हम देख ही रहे हैं। रेड कॉर्नर नोटिस का कोई मतलब नहीं क्योंकि हाफिज सईद पाकिस्तान छोड़कर कहीं बाहर जाने वाला नहीं है। खुफिया ऑपरेशन में उसे ढेर कर पाना मुश्किल है क्योंकि लाहौर के पास मुरीदके में जहां वह रहता है उसकी अपनी आतंकी जमात लश्कर-ए-ताइबा के गुर्गे सुरक्षा देते हैं। एक विकल्प सर्जिकल स्ट्राइक का है यानी खुफिया सूचना पर अचानक पूरी प्लानिंग के साथ धावा बोलकर इस दहशतगर्द का सफाया कर दिया जाए पर अमेरिका की तरह भारत इस ऑपरेशन को अंजाम नहीं दे सकता।
अफगानिस्तान में अमेरिकी बेस से एबटाबाद तक के क्षेत्र में पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम काफी कमजोर था। अमेरिकी कमांडो जिस ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर में आए थे वह राडार को पूरी तरह से चकमा दे सकता था। पास में पाक मिलिट्री एकेडमी थी, ऐसे में जब हेलीकॉप्टर की आवाज आने लगी और वह उतरा तो लोगों को लगा कि यह सेना का कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम है क्योंकि वहां अक्सर सेना के विमान उड़ते रहते थे। दूसरी तरफ भारत को ऐसे मिशन के लिए अपने नए लाइट कांबैट हेलीकॉप्‍टर या एमआई-17 पर भरोसा करना होगा पर स्टील्‍थ टेक्नोलॉजी में अभी ये उतने दमदार नहीं हैं। भारत के पास अमेरिका जैसा ड्रोन भी नहीं है। अफगानिस्तान की सीमा को पाकिस्तान संवेदनशील नहीं मानता पर भारत की तरफ उसने मजबूत हवाई रक्षा प्रणाली तैनात कर रखी है। भारत से जैसे ही कोई विमान या हेलीकॉप्टर पाक सीमा में दाखिल होगा, झट से पहचान लिया जाएगा। ऐसे में भारतीय जवानों की जान खतरे में पड़ सकती है।
अमरिकियों ने करीब 18 महीने तक लादेन की निगरानी की थी और लादेन की सुरक्षा पुख्ता न होने की सूचना पर कार्रवाई की गई। जबकि हाफिज सईद कभी अकेला नहीं रहता है और उसका ठिकाना भी बदलता रहता है। वैसे भी उसे खुली छूट है तो वह घूम-घूमकर जिहाद के लिए चंदे इकट्ठे करता रहता है। पाकिस्तानी हुकूमत भी उसे सुरक्षा देती है। ऐसे में उसकी सटीक लोकेशन मिल पाना बेहद मुश्किल है। हालांकि पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने अमेरिकी ऑपरेशन के बाद संकेत दिया था कि भारत चाहे तो वह भी ऐसे ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है पर हाफिज सईद के खिलाफ यह तरीका जोखिम भरा होगा। अक्षय कुमार की फिल्म बेबी में हाफिज सईद जैसे हमशक्ल को नाटकीय तरीके से भारत लाकर सलाखों के पीछे करने की कहानी दर्शकों को खूब पसंद आई थी पर रीयल लाइफ में यह काफी मुश्किल मिशन है।
हां, भारतीय कट्टरपंथी प्रचारक जाकिर नाईक इस काम में भारत सरकार की मदद कर सकते हैं। हाल में मदीना से प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि देशहित में फिदाईन हमला जायज है। नाईक चूंकि भारतीय हैं और सईद देश का दुश्मन तो क्यों न उनसे प्रेरित बांग्लादेश के दो दहशतगर्द की तरह जाकिर नाईक खुद ऐसा देशभक्त तैयार करें जो पाकिस्तान में जाकर हाफिज सईद को हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला सके। जाहिर है इस तरह का कदम सरकार उठाने से रही पर अगर नाईक यह मानते हैं कि बेगुनाहों का कत्ल करना गुनाह-ए-अजीम है तो उन्हें इस पर जरूर गौर करना चाहिए। वैसे भी जंग में तो सब जायज है और हाफिज सईद भारत को लगातार जंग की धमकी देता रहता है।
पाकिस्तान को भारत के बजाए अपने आंतरिक मामलों पर ज्यादा गौर करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर में जनमत का राग अलापने से पहले वह उस यूएन प्रस्ताव पर अमल करे जिसमें पीओके खाली करने की बात कही गई है। भारत के लिए भी अपनी शांति के लिए थोड़ी कूटनीतिक चाल तो बनती है।