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शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भावनाओं को समझो

बचपन से ही मैंने अपने घर में भोजन से पहले एक रोटी, थोड़ा चावल, सब्जी, दाल व रायते का भी एक अंश थाली से बाहर निकालने की परंपरा देखी है। पिताजी के भोग लगाने के बाद झट से मेरी या छोटे भाई की ड्यूटी रहती थी कि लो, इसे गऊ माता को खिला के आओ। मैं कम ही तैयार होता क्यूंकि मुझे डर लगता था। दरअसल गाय-भैंस के नजदीक जाने पर अक्सर वे अपनी सिंगों को आपकी तरफ कर देती हैं। इतने में तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। यही नहीं, पिता जी का सख्त निर्देश था कि रोटी हाथ से खिलाई जाएगी, जमीन पर रखकर या हौदे में डालकर नहीं। मुझे डर था कि ‌खिलाते समय गाय मेरी उंगली न चबा ले। एक और महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना चाहूंगा। मेरे गांव में एक खास वर्ग के कुछ लोगों को गाय बेचने पर अघोषित पाबंदी थी। हमें डर होता था कि ज्यादा पैसे कमाने के लिए शायद वे जानवरों को कसाई को बेचते थे।

अब बात करते हैं चुनावी मौसम में बीफ विवाद की। जन्म देने वाली मां के अलावा हिंदू धर्म में धरती, गऊ और तुलसी को भी माता का दर्जा हासिल है। तो इस बात में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह तो आस्था की बात है और जहां आस्‍था होती है वहां पत्‍‌थर में भगवान दिखते हैं, काबा में अल्लाह और गिरजाघर में जीसस क्राइस्ट। ऐसे में 5000 साल से चली आ रही सनातन परंपरा को बेहतर तरीके से पेश करना जरूरी है, जिसका अभाव दिखता है। गोमांस के आरोप में नोएडा के एक गांव में एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या को किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद देशभर में गोमांस की अफवाह या भड़काऊ भाषणों ने ऐसा माहौल तैयार किया, जो भारत की शांतिपूर्ण समभाव वाली संस्कृति के बिल्कुल उलट है। एक तबका खुद को मॉडर्न ख्याल का बताते हुए खुलेआम गोमांस खाने की छूट चाहता है तो दूसरा समूह उनका है जो खुद को हिंदुओं के स्वघोषित लंबरदार और गऊ माता के पालनहार साबित करने में जुटे हैं। इन सबके बीच वो हिंदू नदारद हैं जो बरसों से मुसलमानों के घर ईद की सेवईंया खाते आ रहे हैं और वे मुस्लिम भी नहीं जो हिंदू के घर बड़े शानोशौकत से समारोह में शरीक होते हैं। तो कौन हैं ये लोग? हम क्यों भड़क जाते हैं इनकी बेतुकी बातों से? यह सवाल हिंदुओं ही नहीं मुसलमानों को भी अपने आप से करना चाहिए। अच्छा होता इस जघन्य अपराध के बाद हालात को संभालने का काम किया गया होता पर नहीं, बिसाहड़ा में राजनेताओं की बाढ़ ऐसे आई जैसे जितने ज्यादा नेता आएंगे उतनी जल्दी इकलाख वापस आ जाएगा।

 दरअसल, गोमांस खाने, न खाने का विवाद तो है ही नहीं। विवाद एक दूसरे पर अपनी बात को थोपने का है। कोई अपने घर में क्या खाता है उससे किसी को क्‍या लेना देना लेकिन अगर आप खुलेआम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए गोमांस खाने की छूट मांगेंगे तो माहौल तो बिगड़ेगा ही। तरह-तरह के तर्क रखे जा रहे हैं। ऋषि-मुनि भी मांस खाते थे, वगैरह-वगैरह। अब जरा अपने दिमाग पर जोर डालिए, ऋषियों के समय क्या दाल-चावल, शाही पनीर, आलू की भुजिया या फिर कोफ्ता का प्रचलन था। अगर नहीं तो खानाबदोश जीवन में लोगों के लिए मांस ही आहार का मुख्य साधन था। लेकिन जब तुलसीदास जैसे ज्ञानियों ने रचनाएं की तो उन्होंने उन घटनाओं को दूर रखा जो उस समय के समाज से मेल न खाती हो पर पहले से चली आ रही हो। इसीलिए वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी कुछ अंतर देखने को मिलता है। जैसे-जैसे शास्‍त्र लिखे गए, उनमें सनातन परंपरा का भी उद्धरण पंक्तिबद्ध किया गया। क्या उस दौर और आज के युग की समानता करना उचित है? अगर आपके बगल में कोई परिवार गाय की हर रोज पूजा करता है तो क्या उसे यह बर्दाश्त होगा कि कोई उसी गाय को मार के खा जाए। अब लोग दक्षिण भारत या फिर नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण दे रहे हैं। अरे भैया, जैसा देश वैसा भेष... यहां देश का मतलब वह इलाका है जहां हम रहते हैं।
दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों में गायों को काटा जा रहा है, भारत के हिंदू उन देशों में रोक की मांग करते तो स्वतंत्रता का सवाल बनता। अपने देश में जानवर का मांस ही खाना है तो करीब 30 करोड़ जानवरों की आबादी है एक को छोड़कर खाते रहिए। गोमांस के एक समर्थक ने कहीं लिखा कि गरीबों के लिए जरूरी पोषण का यह मुख्य स्रोत है। हमें ऐसे लोगों की समझ को बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। भाई साब, गाय को मार के खा जाएंगे कितने दिन चलेगा? उसी गाय को घर में पालिए, रोज दूध, दही खाएंगे तो पोषण नहीं मिलेगा क्या? आजकल तो पशुपालन के लिए सरकार लोन भी दे रही है।

खैर, मैं किसी को कुछ भी खाने से रोक नहीं रहा न तो रोक सकता हूं और जिसे रोका नहीं जा सकता उस पर पों पों करना कोरा बकवास है। मेरा जोर बस एक बात पर है कि अगर आस्‍था है तो भावनाएं हैं और भावनाएं हैं तो वो आहत भी हो सकती हैं। हमें इसका ख्याल रखना चाहिए। कुछ लोग डॉ. अंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि ऋगवेद में लिखा है कि उस समय लोग गाय का मांस खाते थे। यानी गाय को पूज्यनीय मानने से पहले ब्राह्मण भी गोमांस से परहेज नहीं करते थे। ठीक बात है, पर ये बताइए उस समय कबायली या खानाबदोश जीवन में मांस के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी था क्या? ये किसी ने न बताया न लिखा।
इकलाख को क्यूं और किसने मारा यह तो जांच में सामने आएगा पर लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है। बिहार चुनाव से ठीक पहले सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने या ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति तो नहीं है? इसकी भी जांच होनी चाहिए।

कश्मीर के इंजीनियर रशीद हों या केरल का कोई ब्राह्मण संपादक, अगर आप गाय का मांस खाना चाहते हैं तो बेझिझक खाएं पर इस एहतियात के साथ कि इसी देश में आपके ही मुहल्ले में कुछ लोगों को यह गंवारा नहीं है। स्लॉटर हाउस केवल मुस्लिम भाई के ही हैं ऐसा भी नहीं है। मुद्दा बस एक है भावनाओं को समझो। हमें एक बात और समझनी होगी कि ऐसे वाकये हमारी भाईचारे की पहचान को कलंकित करते हैं। नमस्ते लंदन के उस सीन को याद ‌कीजिए जब अक्षय कुमार कहते हैं कि हम उस देश से आते हैं जहां एक कैथोलिक सिख के लिए पीएम की कुर्सी छोड़ देती है और सिख एक मुस्लिम राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है। उस समय हमारा माथा फक्र से ऊंचा हो उठता है।

बेशक आप मेरी बातों की मुखालफत कर सकते हैं। कट्टर, संघी या फिर कुछ और कह सकते हैं अनुरोध बस इतना है कि फिर से ऐसा माहौल बनाइए कि बिसाहड़ा में किसी इशरार के घर कोई अनुराग सेवईं खाने को बेझिझक जाए और श्याम के घर पार्टी में शरीफ भी बेखौफ पहुंचे।