गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

समर्थकों की वाहवाही से नुकसान किसका है



दुनिया में लोकतंत्र का प्रादुर्भाव जनता के कल्याण के लिए हुआ था, जहां नुमाइंदगी के तौर पर राजनीतिक पार्टियां साधन मात्र थीं। यानी एक पार्टी या विचारधारा के लोग अगर अच्छा काम नहीं करते हैं तो जनता को यह अधिकार होगा कि वे अगले चुनाव में उनकी जगह दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप दे। अब आज के परिदृश्य पर लौटते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने अगर सबसे ज्यादा समय तक शासन किया तो अच्छाइयों के साथ उनकी खामियां भी गिनाई जाती है। भाजपा या एनडीए, जनता पार्टी आदि की सरकार के भी कमजोर पहलू को विपक्षी पार्टियां हमेशा उजागर करने की कोशिश करती हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक प्रणाली की अपनी खूबी है यहां सबको जनता की कसौटी पर खरा उतरना होता है। पिछले ढाई साल से देश में पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है। नरेंद्र मोदी के साथ विवाद गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल से ही जुड़े हैं। आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं और अपने आप में संस्थान हैं। दुनिया में उनसे देश की पहचान है। उनका हर अच्छा फैसला अगर उन्हें लोकप्रिय बनाएगा तो वहीं हर गलत कदम आलोचना के दरवाजे खोल देगा और इसके लिए पूरी सरकार और भाजपा को धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। 22 दिसंबर को बनारस के दौरे पर पीएम मोदी के भाषण ने उनके एक अलग तरह के व्यक्तित्व को सामने रखा है, जिसका विश्लेषण करने की जरूरत है। यह सवाल भी प्रासंगिक हो गया है कि क्या समर्थकों की वाहवाही या सभा में गूंजती तालियां बेहतर सरकार का प्रमाणपत्र हैं और क्या इससे जनता का कोई हित पूरा होता है या नहीं।

पहले भी सत्तारूढ़ और विपक्षी नेता एक दूसरे का उपहास करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। पर आज का माहौल ऐसा हो गया है कि जनता को हंसाने या तालियां बज उठने को अच्छी सरकार या अच्छा नेता मानने की भूल की जा रही है। यह एक तरह से पैमाना बनता जा रहा है, जिसकी बात पर जनता ज्यादा हंसे या नारेबाजी करने लगे वह सबसे लोकप्रिय और अच्छा नेता है। तब तो कपिल शर्मा को देश का प्रधानमंत्री बना देना चाहिए क्योंकि वे हर घर के लोगों को और रोज हंसाते हैं। दरअसल, नेता को किसी तीन घंटे के सिनेमाई हीरो से अलग रखकर देखने की जरूरत है। जिस दिन हम किसी कलाकार की तरह नेताओं के फैन हो जाते हैं हम अपना संभावित विकास होने की उम्मीद धो देते हैं। क्योंकि तब नेता सेलिब्रिटी और हम उसके साथ फोटो खिंचाने वाले या ऑटोग्राफ लेने वाले एक प्रशंसक मात्र बनकर रह जाते हैं। इसे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे एकपक्षीय शासन का खतरा बढ़ जाता है। नोटबंदी से जनता की परेशानी, किसानों की आत्महत्या, हवा में घुलता प्रदूषण, सड़कों पर बढ़ती गाड़ियां, आए दिन होते रेल हादसे, साफ पीने के पानी का संकट, बेरोजगारी जैसे गंभीर और प्रासंगिक मुद्दे गौण हो जाते हैं। बैठकबाजों, चाय की दुकानों, गली, नुक्कड़ पर नेता के हंसाने वाले भाषणों को ही चटकारे मारकर सुना और सुनाया जाता है। ऐसे में कोई विरोध करता है तो उस पर द्रोही होने का ठप्पा चस्पा कर दिया जाता है। यह गंभीर स्थिति है और इससे नेताओं का तो फायदा है पर जनता का नुकसान है। नेताओं की फैन फॉलोइंग नहीं उनके विकास को फॉलो करने की जरूरत है, जिससे लोकतंत्र का सार्थक परिणाम निकलकर सामने आएगा। भाषायी कलाबाजी को देखने सुनने के बजाए विकास के मुद्दों पर लौटने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का माखौल उड़ाया, इसमें कोई नई बात नहीं यह तो सभी पार्टियां करती हैं। पर पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के उदाहरण ने उनके राजनीतिक कद को छोटा कर दिया है। संसद में हंगामे की उन्होंने जिस तरह से एक जेबकतरे से तुलना की वह लोगों से तालियां बजवाने की उनकी ओछी कोशिश ही कही जा सकती है। आखिर प्रधानमंत्री या भाजपा यह बताने का कष्ट करेगी कि जिस सदन में पक्ष और विपक्ष के सांसदों पर चर्चा कर जनता के हित में कानून बनाने की अहम जिम्मेदारी है वहां प्रधानमंत्री नोटबंदी के मुद्दे पर भागते क्यों रहे। कांग्रेस या विपक्ष का संसद न चलने देने का रवैया भी सही नहीं था पर अगर प्रधानमंत्री रैलियों में नोटबंदी की बात कर सकते हैं तो संसद में क्यों नहीं। क्या वे सिर्फ अपनी बात रखना चाहते हैं। ऐसे में सभा या पार्टी मीटिंग में ही बोलने का विकल्प बचता है जहां उनकी बात को सुनकर तालियां बजाने के बजाए विरोध के स्वर नहीं उठेंगे। तब लोकतंत्र कहां रहा यह तो एकपार्टी शासन हो गया। नोटबंदी के फैसले से नरेंद्र मोदी, भाजपा या सरकार को ही फायदा होने जा रहा है ऐसा भी नहीं है, यह देशहित में लिया गया एक बड़ा प्रभावी कदम है पर जनता को ये तो अधिकार है कि वह सरकार से सवाल करे कि उसे लाइन में इस तरह क्यों परेशान किया जा रहा है। जनता की नुमाइंदगी सांसद करते हैं तो संसद में बहस तो होनी चाहिए थी पर न तो विपक्ष ने और न ही सरकार की ओर से इस दिशा में पर्याप्त प्रयास किए गए। नुकसान जनता के पैसों का हुआ। आखिर में यह मुद्दा सरकार और विपक्ष के बीच वर्चस्व की लड़ाई बनकर रह गया है।

जनता को इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गांधी ने बोलना सीख लिया या नहीं। वे अच्छा बोल पाते हैं या उनके बोलने से भूंकप आएगा या नहीं पर जनता को यह जानने का अधिकार है कि प्राइवेट बैंकों के एटीएम खाली क्यों पड़े हैं। राजधानी दिल्ली में कई एटीएम से 2500 की बजाए 2000 रुपये ही क्यों निकल रहे हैं। अगर कालाधन रोकने की यह पहल है तो 2000 के नोट क्यों छापे गए। विरोध और सवाल पूछना तो लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन जनता की तालियां बटोरकर इसका जवाब देने से बचने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री ने इसका एलान किया था तो उन्हें समर्थकों ही नहीं विरोधियों के बीच भी इस पर चर्चा करनी चाहिए थी।

वैसे भी, राजनीतिक तौर पर मोदी के बार-बार राहुल गांधी पर निशाना साधने से भाजपा का ही नुकसान हुआ है। अभी तक कांग्रेस पार्टी में दूसरे पायदान पर खड़े राहुल गांधी, मोदी को चुनौती देने वाले कांग्रेस के पहले नंबर के नेता बनकर उभरे हैं। जबकि पहले उनकी छवि ऐसे नेता की बन गई थी जिसकी बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी। राहुल ने अगर सीधे पीएम मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे तो मोदी सरकार या उनकी पार्टी को पीएम मोदी की तुलना गंगा से करने की बजाए जांच कमेटी बिठा देनी चाहिए थी या कम से कम मोदी सभा में अपनी सफाई में दो शब्द तो बोल ही सकते थे। ऐसा ही कुछ नोटबंदी से ठीक पहले बीजेपी के खातों में पैसे जमा होने के आरोप पर भी पार्टी और सरकार ने किया।  इसका मतलब यह हुआ कि वे जवाब देना या आरोप पर गंभीर होना जरूरी ही नहीं समझते। आरोप लगाना तो विपक्ष का काम है पर जनता के सामने सरकार को अपनी बेदाग छवि को साबित भी तो करना चाहिए।

अब जनता को ही समझना है कि विकास की बात करनी है, सरकार से जवाब मांगना है या फिर प्रशंसक बनकर तालियां पीटनी है। हां, अगर भ्रष्टाचार दूर होता है, गरीबी मिटती है, रोजगार बढता है, शिक्षा का स्तर सुधरता है, कालेधन के कुबेर उजागर होते हैं तो हम सभी को तालियां जरूर पीटनी चाहिए।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैश छोड़ कैशलेस होने में वक्त लगेगा

500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद पूरा देश लाइन में खड़ा है और बैंकों की गडि्डयां छापे में कहीं दीवाल से तो कहीं टॉयलेट से बरामद हो रही हैं। मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ क्रांतिकारी फैसला बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है तो वहीं ढाई साल तक सुस्त रहा विपक्ष मुद्दे को अच्छी तरह भुना लेना चाहता है शायद यूपी में कुछ फायदा हो जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचारी कौन है? जनता में छिपे लोग या तंत्र में शामिल नौकरशाह जिनके कंधों पर जिम्मेदारी सौंप कर प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म करने और कालाधन जुटाने की उम्मीद लगाए हैं क्योंकि जैसा माना जा रहा है कि बड़ी मछलियां तो नोटबंदी से पकड़ में नहीं आएंगी। 

दरअसल इस कवायद से तो और भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। खुलेआम बैंकों से नई करेंसी निकलकर धन्नासेठों के पास मिल रही है। गौर करने वाली बात तो ये है कि नए नोट आने के बाद आयकर विभाग को जैसे पंख लग गए हैं। ताबड़तोड़ छापेमारी और सभी में बड़ा पर्दाफाश। चर्चा तो ये भी है कि नई नोट में कुछ ऐसा है जो कालेधन के कुबेरों की सटीक लोकेशन दे रहा है क्योंकि इन्होंने तो पहले से ही पुरानी नोटें भी जमा कर रखी थीं तो अब तक पकड़े क्यों नहीं गए? दूसरी तरफ वो जनता है जिसके दिए कर से ही देश तरक्की करता है। इसमें कई वर्ग ऐसे हैं जो बिना कर दिए कमाई कर रहे हैं। इसमें छोटे व्यापारियों की तादाद काफी ज्यादा है। छोटे गांवों से लेकर, कस्बों और शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर ये दुकान चलाते हैं पर इनकी कमाई छिपी रहती हैं। पंजीकरण कराने मात्र से ये करदाता नहीं बनते और इनका धंधा फलता-फूलता रहता है। दिल्ली की अवैध बस्तियों में हजारों दुकानें हैं और गिनी-चुनी हैं जो बाकायदे टैक्स देते हैं। हो सकता है इस कवायद से उनकी पहचान हो और वे कर के दायरे में आएं। दूसरी तरफ ढाई लाख से थोड़ा ज्यादा पाने वाले कर्मचारी को सेविंग के दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। अंसगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की भी बड़ी तादाद है जिनके साथ कंपनियां छल करती आ रही हैं। प्राइवेट टीचर हो या सुरक्षा गार्ड उनसे दस्तखत ज्यादा वेतन पर कराए जाते हैं और सैलरी के नाम पर उन्हें नगद 8-10 हजार पकड़ा दिए जाते हैं। कैशलेस होने से पहले खातों में अनिवार्य सैलरी का नियम भी लाना होगा। 

सरकार का फैसला सही है या विपक्ष के तर्क? सच मानिए तो जनता इन सवालों के चक्कर में भ्रमित हो गई है। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में असहिष्णुता के बाद विमुद्रीकरण या नोटबंदी दूसरा शब्द है जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी। सोते-जागते बस एक ही सवाल जुबान पर है- पैसे कौन से एटीम में हैं। परेशानी तो है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है और सरकार के फैसले को भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता। 
सरकार कह रही है कि नोटबंदी कैशलेस इकॉनामी की दिशा में बड़ा कदम है। सच बात है पर क्या इतने बड़े फैसले से पहले कैशलेस होने के लिए छोटे फैसले नहीं लिए जाने चाहिए थे। इससे जो परेशानी एक साथ आ गई वो बंट जाती। नोटबंदी के बाद परेशानी बढ़ी तो राहत के लिए ऑनलाइन चार्ज कम कर दिए गए या खत्म कर दिए गए। ट्रेन की टिकट बुक कराने पर अब ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं देना पड़ रहा और बीमा के भी पैसे नहीं कट रहे। अच्छा होता यह काम नोटबंदी के पहले होता तो लोग ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आने को प्रोत्साहित होते। इसमें वक्त लग सकता था पर इसके लिए स्कूल के बच्चों से लेकर पंचायत घरों तक जागरुकता अभियान चलाया जा सकता था। 
सच मायने में नोटबंदी और कैशलेस इकॉनामी के बीच लंबी खाई है। नोटबंदी के बाद भी तो नोट उतने ही छापने पड़े तो नोट कम कहां हुए। ऐसे में नोट का इस्तेमाल तो चलता रहेगा। अब सरकार चार्ज कम कर, पेट्रोल-डीजल पर ऑनलाइन छूट, ऑनलाइन शॉपिंग व सरकारी लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए आगे आई है। यानी जबरन कैशलेस इकॉनामी नहीं बनाई जा सकती है, अब जो काम पहले किया जाना चाहिए था वो बाद में करना पड़ रहा है। कैशलेस होने से पहले आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। गांवों में बिजली के साथ इंटरनेट पहुंचाने की चुनौती है। शहरों में मोबाइल नेटवर्क की हालत किसी से छिपी नहीं है। कैशलेस के लिए इंटरनेट जनसामान्य तक पहुंचे वैसा साधारण टैरिफ प्लान कंपनियों के लिए अनिवार्य होना चाहिए और हो सके तो कुछ सेवाएं जैसे बिल भुगतान, ट्रेन-बस टिकट जैसे एप पर नेट की सुविधा फ्री दी जाए। इसके लिए छोटे से गांव से लेकर शहर के गली मोहल्लों में सार्वजनिक स्थानों पर फ्री वाई फाई की सुविधा देना एक अच्छा कदम होगा। इसके बाद ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि लोग नोट छोड़कर नेट इस्तेमाल करेंगे। 
वास्तव में बदलाव कोई भी हो हमेशा अपने साथ कुछ समस्याएं लाता है। सभी सुविधाएं देने के बाद भी थोड़ी दिक्कत होगी क्योंकि एक ढर्रे पर चलने वाला व्यक्ति बदलाव के लिए खुद को जल्दी तैयार नहीं कर पाएगा, लेकिन फायदे बतलाकर उसे इस प्लेटफार्म पर अवश्य खींचा जा सकता है। जिस देश में आज भी कई गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। नेता, मंत्रियों के गांवों को छोड़ दें तो यूपी के गांवों में 24 घंटे बिजली अभी सपना है। बैंक न जाना पड़े इसलिए लोग जहां गुल्लक भरते हों उनसे ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे नोट की कमी से झट से स्मार्टफोन लेकर कैशलेस काम करना शुरू कर देंगे। शहरों के युवा तो पहले से ही टेक्नॉलाजी को स्वीकार कर काफी हद तक कैशलेस हो गए हैं। देश में बड़ी आबादी उनकी भी है जिनके पास फोन नहीं है, वे कैशलेस इकॉनामी का हिस्सा कैसे बनेंगे? इस पर विचार किए बिना ही अचानक नोटबंदी का फैसला थोड़ी जल्दबाजी ही लगता है।