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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए ...

पाकिस्तान के हिंदू या सिख भारत में शरण मांगते हैं तो कहा जाता है कि इस्लामिक मुल्क में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जबकि हकीकत यह भी है कि उसी देश के सबसे बड़े और सबसे कम आबादी वाले सूबे बलूचिस्तान के मुसलमान पाक से आजादी मांग रहे हैं। बलूच राष्ट्रवादी अपनी सांस्कृतिक पहचान, संसाधनों पर बराबर हक और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन जवाब में उन्हें पाकिस्तानी हुकूमत और फौज का अत्याचार सहना पड़ रहा है। बलूच अंग्रेजों के बाद खुद को पाकिस्तान का गुलाम मानते हैं क्योंकि यहां सिर्फ पाक फौज का सिक्का चलता है जो कभी भी कहीं भी किसी को भी उठा लेती है और अपना हक मांगने वालों को मौत के घाट उतार देती है। हैरत की बात तो यह है कि कश्मीर, अफगानिस्तान में गृह युद्ध, परमाणु सुरक्षा, धार्मिक कट्टरपंथ को लेकर बार-बार पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आता है पर कभी भी बलूचिस्तान का मुद्दा खुलकर सामने नहीं आ पाता। बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाक फौज की क्रूरता कभी-कभार किसी स्थानीय नागरिक की बदौलत ही सामने आ पाती है। दोनों ही जगहों पर मीडिया को पूरी तरह से सेंसर किया गया है। पाक के अत्याचार से त्रस्त यहां की जनता भारत से दूसरे मुक्ति संग्राम की परिणति की उम्मीद लगाए बैठी है। 
प्रमुख राष्‍ट्रीय मीडिया में तो बलूचिस्तान की घटनाओं को स्पेस नाम मात्र का मिलता है। बलूचिस्तान के पत्रकार सच्चाई लिखते हैं तो इस्लामाबाद में बैठे संपादक खबरों को पाक फौज के चश्मे से एडिट कर देते हैं। पाक हुकूमत को चुनौती देने वाले तेजतर्रार पत्रकारों को धमकाया जाता है। मजबूरन ऐसे दर्जनों पत्रकारों को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे समेत दुनिया के कई देशों में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है। पाक फौज द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं पर बेबाक रिपोर्ट देने के चलते युवा बलूच पत्रकार मलिक सिराज अकबर को 2011 में भागकर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। अब वे वहीं से बलूचिस्तान की सच्चाई दुनिया को बता रहे हैं। पाक फौज ने आधुनिक विचारों वाले राष्ट्रवादियों की हर उस आवाज को शांत करना शुरू कर दिया जो अपना हक मांगते हैं। इनमें नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्वान, वकील और पत्रकार सीधे तौर पर निशाना बने। उन्हें अगवा कर मार दिया गया, या इतनी यातना दी गई कि वे टूट गए। बलूच अलगाववादियों ने भी समय-समय पर हिंसक जवाब दिया। ऐसे में अब बातचीत के जरिए बलूच समस्या के समाधान की उम्मीदें कम ही बची हैं। 2004 के बाद आजादी के आंदोलन में तेजी आई तो हजारों की संख्या में हत्याएं भी हुईं। 

बलूचों की तीन प्रमुख जनजातियां हैं- मैरी, बुगती और मेंगल, तीनों जनजातियों के नेता बड़ी फौज खड़ी कर सकते हैं पर इनमें एकता नहीं है। पाक फौज इनमें फूट डालने में सफल रही है। इसी कारण पाक फौज का तर्क रहता है कि बलूचिस्तान में सब सामान्य है, बुगती समुदाय के कुछ लोग सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और बलूचिस्तान लिबरेशन यूनिटी फ्रंट दो प्रमुख बलूच संगठन हैं जो सीधे तौर पर पाक फौज से लोहा ले रहे हैं। 
वास्तव में बलूचिस्तान समस्या के मूल में जातीय समुदाय में टकराव भी है। अंग्रेजों का विश्वासपात्र होने का पाक पंजाबियों को फायदा मिला। सेना एवं अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों में सबसे ज्यादा पंजाब के लोग भर्ती किए गए जबकि बलूचिस्तान को नाममात्र का प्रतिनिधित्‍व मिला। ऐसे में बलूचों का हक सेना मार रही है। पंजाबी पाक की कुल आबादी का करीब 45 फीसदी हैं। 


बलूचों की नाराजगी की इस सदी की सबसे बड़ी वजह ग्वादर पोर्ट का निर्माण है, जो 2002 में शुरू हुआ। चीन की मदद से पाक छोटे से मछली पकड़ने वाले लोगों के गांव ग्वादर को ट्रांसपोर्टेशन हब के तौर पर अंतरराष्ट्रीय पहचान देना चाहता है। भारत के लिहाज से ग्वादर का पाक के लिए सामरिक महत्व भी है। यह ऊर्जा की भारी मांग वाले भारत, चीन और पूर्वी एशिया के लिए महत्वपूर्ण गलियारा बन सकता है जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर निकलेगा। ग्वादर प्रोजेक्ट पूरी तरह से पाक सरकार के नियंत्रण में हैं। इससे स्थानीय बलूचों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। यही नहीं, बलूचों को कमजोर करने के लिए पाक सरकार ग्वादर के पास दूसरे प्रांतों के लोगों को बसा रही है। कर्मचारियों के लिए पूरा एक कस्बा बसाया जा रहा है। प्रस्तावित ईरान-पाक-भारत पाइपलाइन भी बलूचिस्तान से होकर आएगी, जिसका बलूच विरोध कर रहे हैं। अफगानिस्तान युद्ध से शरणार्थी बड़ी तादाद में बलूचिस्तान में घुस आए। ऐसे में अपने ही क्षेत्र में बलूच आबादी हासिए पर आ गई है। दोनों समुदायों में रंजिश ब्रिटिश शासन से ही है। तालिबान आतंकी भी यहां शरण ले चुके हैं। राजधानी क्वेटा तो अल कायदा और तालिबान का गढ़ बन चुकी है। 


2004 में बलूच विद्रोह फिर से शुरू हुआ और सेना द्वारा 2006 में जानेमाने बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या के बाद विरोध की चिंगारी तेजी से भभकी। अवैध तरीके से कई लोगों हिरासत में रखा या गायब कर दिया। आज आलम यह है कि बलूचिस्तान पाक का ऐसा प्रांत बन चुका है जहां सबसे ज्यादा लोग गायब हुए हैं। अमेरिका और एमनेस्टी समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर सवाल उठाए पर राजनीतिक दबाव और इच्छाशक्ति के बगैर इसका कोई फायदा बलूचों को नहीं हुआ। 


बलूच समुदाय सिर्फ दक्षिण पश्चिम पाकिस्तान ही नहीं पूर्वी ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में पाक बलूचों की आबादी तेजी से घटी है। पाक अक्सर अपनी करतूत को छिपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ने का सहारा लेता रहता है। हाल ही में एक पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी को बलूचिस्तान से गिरफ्तार कर उसने कहा कि ये रॉ के मिशन पर थे जबकि कुलभूषण जाधव अपने कारोबार के सिलसिले में ईरान से पाक आए थे। जानीमानी बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी भारत से किसी भी प्रकार के मदद के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहती हैं कि यह तो पाक की नापाक चाल है जिससे वह बड़े पैमाने पर अपहरण और कत्लेआम की घटनाओं से दुनिया का ध्यान हटा सके। कादरी ने कहा कि हम तो भारत से मांग करते हैं कि जिस तरह से आपने बांग्लादेश के लोगों को पाकिस्तान के जुल्मओ-सितम से आजाद कराया उसी तरह प्रभावशाली पड़ोसी मुल्क होने के नाते बलूचों की मदद के लिए आगे आएं। बलूचों को भारत से काफी उम्मीदें हैं पर अब तक भारत का रवैया उदासीन रहा है। 

वर्ष 1800 के आसपास इस इलाके में कबायलियों के बीच कमजोर आपसी संबंध का अंग्रेजों ने फायदा उठाया और फूट डालो राज करो की नीति अपनाई। इसके तहत बलूचिस्तान को सात क्षेत्रों में बांट दिया गया। अंग्रेज चाहते थे कि ऐसा कर वे उस इलाके पर कब्जा कर लें जिससे होकर अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सके। 1877 में अंग्रेजों ने बलूचिस्तान को ब्रिटिश भारत में मिला लिया। 1947 में भी क्षेत्र का कबायली कुनबा संगठित नहीं हो सका जिसका परिणाम यह हुआ कि पाक ने सूबे पर जबरन कब्जा कर लिया। 

प्रकृति ने इस क्षेत्र को सबसे ज्यादा समृद्ध बनाया लेकिन इसे जानबूझकर दक्षिण ‌एशिया का सबसे बदहाल क्षेत्र बनने के लिए छोड़ दिया गया। आज यह पाकिस्तान का सबसे गरीब और सबसे कम साक्षरता वाला प्रांत है। देश की जीडीपी में इसका योगदान भी 3.7 से नीचे आ गया है। बलूचिस्तान में मातृ और शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। अंग्रेजों के समय में यहां से कोयला निकाला जाता था। 1952 में यहां पहली बार प्राकृतिक गैस का भंडार खोजा गया। देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस का भंडार होने के बावजूद क्षेत्र की बदहाली सूबे के लोगों में पाक हुकूमत के प्रति नफरत की भावना बढ़ाती है। बलूचिस्तान के गैस क्षेत्र का फायदा यहां के नहीं बल्कि सिंध और पंजाब के लोगों को मिलता है। बलूचिस्तान कर्ज में डूबा है। स्वास्‍थ्य की हालत खस्ता है। लोगों को पीने के लिए साफ पानी भी मयस्सर नहीं है। रोजगार भी सीमित लोगों को दिया जाता है। देश विरोधी होने का ठप्पा लगाकर न जाने कितने लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। कुछ के घरवालों को तो आज भी अपनों का इंतजार है। 
बलूच अपने संसाधनों का मालिकाना हक मांग रहे हैं जबकि पाक सेना ब्रिटिश हुकूमत की भूमिका में है। उसका कहना है कि वह लोगों को सभ्य, आधुनिक और विकास की धारा से जोड़ने के लिए बलूचिस्तान में है जबकि सच मायने में पूरा सूबा पाकिस्तान की कॉलोनी बन चुका है। 


आज बलूच राष्ट्रवादियों को भारत से ढेरों उम्मीदें हैं। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों की तरह बलूचों को भी राजनीति में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा। पाक सरकार में पंजाबियों का दबदबा है। प्रांतीय शासन के अधिकार सीमित कर दिए गए। भारत ने बंगालियों को पाक के अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी तो बलूचिस्तान का नंबर कब आएगा, यह सवाल वहां की फिजा में उठ रहा है। पाक को भी यही डर सता रहा है। कश्मीर और इस्लामिक आतंकवादियों के बाद बलूचिस्तान पाक फौज के लिए तीसरा फ्रंट बन चुका है। अच्छा होता इस मामले को सेना के बजाए निर्वाचित सरकार सुलझाने का प्रयास करती पर इसकी उम्मीद फिलहाल नहीं की जा सकती। 

एक मशहूर शायर की ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं- 

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए 
मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए 
कौन आजाद हुआ