रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैश छोड़ कैशलेस होने में वक्त लगेगा

500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद पूरा देश लाइन में खड़ा है और बैंकों की गडि्डयां छापे में कहीं दीवाल से तो कहीं टॉयलेट से बरामद हो रही हैं। मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ क्रांतिकारी फैसला बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है तो वहीं ढाई साल तक सुस्त रहा विपक्ष मुद्दे को अच्छी तरह भुना लेना चाहता है शायद यूपी में कुछ फायदा हो जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचारी कौन है? जनता में छिपे लोग या तंत्र में शामिल नौकरशाह जिनके कंधों पर जिम्मेदारी सौंप कर प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म करने और कालाधन जुटाने की उम्मीद लगाए हैं क्योंकि जैसा माना जा रहा है कि बड़ी मछलियां तो नोटबंदी से पकड़ में नहीं आएंगी। 

दरअसल इस कवायद से तो और भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। खुलेआम बैंकों से नई करेंसी निकलकर धन्नासेठों के पास मिल रही है। गौर करने वाली बात तो ये है कि नए नोट आने के बाद आयकर विभाग को जैसे पंख लग गए हैं। ताबड़तोड़ छापेमारी और सभी में बड़ा पर्दाफाश। चर्चा तो ये भी है कि नई नोट में कुछ ऐसा है जो कालेधन के कुबेरों की सटीक लोकेशन दे रहा है क्योंकि इन्होंने तो पहले से ही पुरानी नोटें भी जमा कर रखी थीं तो अब तक पकड़े क्यों नहीं गए? दूसरी तरफ वो जनता है जिसके दिए कर से ही देश तरक्की करता है। इसमें कई वर्ग ऐसे हैं जो बिना कर दिए कमाई कर रहे हैं। इसमें छोटे व्यापारियों की तादाद काफी ज्यादा है। छोटे गांवों से लेकर, कस्बों और शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर ये दुकान चलाते हैं पर इनकी कमाई छिपी रहती हैं। पंजीकरण कराने मात्र से ये करदाता नहीं बनते और इनका धंधा फलता-फूलता रहता है। दिल्ली की अवैध बस्तियों में हजारों दुकानें हैं और गिनी-चुनी हैं जो बाकायदे टैक्स देते हैं। हो सकता है इस कवायद से उनकी पहचान हो और वे कर के दायरे में आएं। दूसरी तरफ ढाई लाख से थोड़ा ज्यादा पाने वाले कर्मचारी को सेविंग के दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। अंसगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की भी बड़ी तादाद है जिनके साथ कंपनियां छल करती आ रही हैं। प्राइवेट टीचर हो या सुरक्षा गार्ड उनसे दस्तखत ज्यादा वेतन पर कराए जाते हैं और सैलरी के नाम पर उन्हें नगद 8-10 हजार पकड़ा दिए जाते हैं। कैशलेस होने से पहले खातों में अनिवार्य सैलरी का नियम भी लाना होगा। 

सरकार का फैसला सही है या विपक्ष के तर्क? सच मानिए तो जनता इन सवालों के चक्कर में भ्रमित हो गई है। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में असहिष्णुता के बाद विमुद्रीकरण या नोटबंदी दूसरा शब्द है जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी। सोते-जागते बस एक ही सवाल जुबान पर है- पैसे कौन से एटीम में हैं। परेशानी तो है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है और सरकार के फैसले को भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता। 
सरकार कह रही है कि नोटबंदी कैशलेस इकॉनामी की दिशा में बड़ा कदम है। सच बात है पर क्या इतने बड़े फैसले से पहले कैशलेस होने के लिए छोटे फैसले नहीं लिए जाने चाहिए थे। इससे जो परेशानी एक साथ आ गई वो बंट जाती। नोटबंदी के बाद परेशानी बढ़ी तो राहत के लिए ऑनलाइन चार्ज कम कर दिए गए या खत्म कर दिए गए। ट्रेन की टिकट बुक कराने पर अब ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं देना पड़ रहा और बीमा के भी पैसे नहीं कट रहे। अच्छा होता यह काम नोटबंदी के पहले होता तो लोग ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आने को प्रोत्साहित होते। इसमें वक्त लग सकता था पर इसके लिए स्कूल के बच्चों से लेकर पंचायत घरों तक जागरुकता अभियान चलाया जा सकता था। 
सच मायने में नोटबंदी और कैशलेस इकॉनामी के बीच लंबी खाई है। नोटबंदी के बाद भी तो नोट उतने ही छापने पड़े तो नोट कम कहां हुए। ऐसे में नोट का इस्तेमाल तो चलता रहेगा। अब सरकार चार्ज कम कर, पेट्रोल-डीजल पर ऑनलाइन छूट, ऑनलाइन शॉपिंग व सरकारी लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए आगे आई है। यानी जबरन कैशलेस इकॉनामी नहीं बनाई जा सकती है, अब जो काम पहले किया जाना चाहिए था वो बाद में करना पड़ रहा है। कैशलेस होने से पहले आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। गांवों में बिजली के साथ इंटरनेट पहुंचाने की चुनौती है। शहरों में मोबाइल नेटवर्क की हालत किसी से छिपी नहीं है। कैशलेस के लिए इंटरनेट जनसामान्य तक पहुंचे वैसा साधारण टैरिफ प्लान कंपनियों के लिए अनिवार्य होना चाहिए और हो सके तो कुछ सेवाएं जैसे बिल भुगतान, ट्रेन-बस टिकट जैसे एप पर नेट की सुविधा फ्री दी जाए। इसके लिए छोटे से गांव से लेकर शहर के गली मोहल्लों में सार्वजनिक स्थानों पर फ्री वाई फाई की सुविधा देना एक अच्छा कदम होगा। इसके बाद ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि लोग नोट छोड़कर नेट इस्तेमाल करेंगे। 
वास्तव में बदलाव कोई भी हो हमेशा अपने साथ कुछ समस्याएं लाता है। सभी सुविधाएं देने के बाद भी थोड़ी दिक्कत होगी क्योंकि एक ढर्रे पर चलने वाला व्यक्ति बदलाव के लिए खुद को जल्दी तैयार नहीं कर पाएगा, लेकिन फायदे बतलाकर उसे इस प्लेटफार्म पर अवश्य खींचा जा सकता है। जिस देश में आज भी कई गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। नेता, मंत्रियों के गांवों को छोड़ दें तो यूपी के गांवों में 24 घंटे बिजली अभी सपना है। बैंक न जाना पड़े इसलिए लोग जहां गुल्लक भरते हों उनसे ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे नोट की कमी से झट से स्मार्टफोन लेकर कैशलेस काम करना शुरू कर देंगे। शहरों के युवा तो पहले से ही टेक्नॉलाजी को स्वीकार कर काफी हद तक कैशलेस हो गए हैं। देश में बड़ी आबादी उनकी भी है जिनके पास फोन नहीं है, वे कैशलेस इकॉनामी का हिस्सा कैसे बनेंगे? इस पर विचार किए बिना ही अचानक नोटबंदी का फैसला थोड़ी जल्दबाजी ही लगता है। 

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