पहले जब राजा-महाराजा युद्ध के लिए निकलते थे तो अपने एक सबसे खास सिपहसालार की टुकड़ी को किले की सुरक्षा के लिए छोड़ जाते थे। अपनी सरजमीं की सुरक्षा को अभेद्य सुनिश्चित करना उनका मकसद होता था। आज जंग कम चुनाव ज्यादा होते हैं और किले की जगह चुनावी गढ़ ने ले ली है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं लेकिन बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री की एक के बाद एक बलिया और बनारस की रैली ने इसके संकेत भी दे दिए। पार्टियों के रणनीतिकारों ने युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया है।बसपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात कही है। सपा की मौजूदा सरकार है तो उसका किसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी बिहार में उसे दरकिनार कर दिया गया था तो वह पुराने दोस्तों को करारा जवाब देना चाहेगी। रही बात कांग्रेस और भाजपा की। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का जबरदस्त फायदा उठाने वाली भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरने की रूपरेखा तैयार कर रही है। दिल्ली और बिहार में उसे भले ही मुंह की खानी पड़ी हो मगर मोदी-शाह की टीम इसे भुलाकर यूपी की सत्ता पर सवार होने का ख्वाब देख रही है। इसमें सबसे बुरी हालत में कांग्रेस है। लगातार दो बार केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद अब न तो पार्टी में कोई हिंदीभाषी दमदार नेता दिखता है और न ही पार्टी नेतृत्व अपनी साख बचा पा रहा है। टूजी, कोल, कॉमनवेल्थ जैसे घोटोलों के बदनुमा दाग पार्टी अभी धो भी नहीं पाई थी कि अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले ने उसकी किरकिरी करानी शुरू कर दी। ऐसे में देश की सियासत के लिहाज से महत्वपूर्ण सपा का हो चुका यूपी का किला क्या कांग्रेस 2017 में भेद पाएगी, यह बड़ा सवाल है।
आजादी के बाद कांग्रेस ने अविभाजित यूपी को वीर बहादुर सिंह, श्रीपति मिश्र, विश्वनाथ प्रताप सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, सुचेता कृपलानी, चंद्रभानु गुप्ता, संपूर्णानंद और गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री दिए हैं। पर आखिरी बार पार्टी के नारायण दत्त तिवारी 1988-89 में मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद सपा, बसपा और भाजपा को सूबे की सत्ता मिलती रही है।
इलाहाबाद जिले के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता से हाल ही में मुलाकात हुई। 4-5 साल पहले तक वह राजनीति में सक्रिय थे पर अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। उन्होंने कई कांग्रेसी सांसदों और विधायकों का वोट बैंक बढ़ाकर सत्ता का स्वाद चखाया है। खुद कभी पद का लोभ नहीं किया। आज भी कांग्रेस पार्टी के लिए उनके दिल में काफी सम्मान है। यूपी में कांग्रेस, के सवाल पर कहते हैं, देखिए जी परिवार का मुखिया सबसे अहम होता है। परिवार का तानाबाना, फैसला, पड़ोसियों से संबंध, समाज में मान-सम्मान, समर्थन सब कुछ उसी के नेतृत्व में मिलता है। ऐसे में उसका अक्लमंद, मृदुभाषी, ज्ञानी, थोड़ा चतुर, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबसे महत्वपूर्ण जमीन से जुड़ा होना काफी अहम हो जाता है। अब कांग्रेस को देखिए। मुखिया कौन है। क्या वह सबको साथ लेकर चलने वाला है। क्या वह जमीनी नेता लगता है। वह कहते हैं जब तक राजीव गांधी जैसा सरल, मृदुभाषी और जमीनी नेता कांग्रेस के पास था स्थिति मजबूत थी। अब गांधी परिवार की छांव से पार्टी को निकलने की जरूरत है। जितनी जल्दी पार्टी नया नेतृत्व खोजेगी, उतनी जल्दी उसका कद और सम्मान बढ़ेगा। बाकी सोनिया जी को बहुत कुछ नुकसान उनकी खराब हिंदी की वजह से हो जाता है। काफी लोग तो उनकी हिंदी को समझ नहीं पाते या फिर मजाक बनाकर गंभीरता से नहीं लेते। राहुल गांधी में राजीव का अक्स तो दिखता है पर उनके चारों तरफ घिरे लोगों ने कभी खुद पर भरोसा करने नहीं दिया। हर चीज उन्हें लिखकर, समझाकर करने को दी। अब स्थिति यह है कि एक ही तरह की बात वह हर जगह करते दिख जाते हैं। इससे लोगों में संदेश गलत जाता है। वहीं मोदी हैं जो समय, जगह और लोगों के हिसाब से बोलते हैं और लोगों को अपना मुरीद बना लेते हैं।
कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी यूपी में राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर सकती है। आलाकमान और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के बीच इस पर चर्चा भी हुई है। खुद को साबित करने के लिए राहुल गांधी को एक दिन का संसदीय दौरा छोड़कर जनता के बीच वास्तव में आना होगा। अभी वह सिर्फ महीने-दो महीने में एक दिन अपने क्षेत्र में गाड़ी से उतरते गरीब के यहां रोटी खाते, या फिर हाथ हिलाते देखे जाते हैं। उन्हें खुद को जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध करना होगा। इससे उन्हें जनता को समझने का मौका मिलेगा और जनता भी उन्हें अच्छे से जानेगी। अभी तो वह सेलिब्रिटी ही हैं।
यूपी कांग्रेस का गढ़ रहा है। उसके समर्पित कार्यकर्ता आज भी हैं पर सूबे में पतली हालत के चलते किसी दूसरी पार्टियों से जुड़ गए हैं। कांग्रेस नेतृत्व को एक लहर पैदा करनी होगी। आओ चलें, अपने घर आई है कांग्रेस, जैसा एक अभियान शुरू करना होगा। पिछले 25-28 साल में क्या नफा नुकसान हुआ जनता को समझाना होगा। सर्वर्णों और अल्पसंख्यक वोटरों में कांग्रेस के लिए सम्मान आज भी है बस उन्हें उम्मीद दिखनी बंद हो गई है।
देश की सबसे पुरानी पार्टी बेबस नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंदर किसी प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रप नेता के अभाव में कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर है। यह गंभीर स्थिति है। भले ही भाजपा केशव प्रसाद मौर्य जैसे कम चर्चित व्यक्ति के नेतृत्व में चुनाव हार जाए पर वह बड़ा एवं जोखिम भरा फैसला लेने में पीछे नहीं हटी। हालांकि इसके जातिगत और कई अन्य समीकरण भी हैं पर कांग्रेस को इससे सीख लेना चाहिए। वैसे बिहार में पिछड़ों, अतिपिछड़ों की एकजुटता के कारण बुरी हार का सामना करने के बाद भाजपा द्वारा अगला प्रदेश अध्यक्ष ऐसे ही किसी शख्स को बनाए जाने की संभावना थी। यूपी में कांग्रेस को भी मिलेंगे कई केशव, बस तलाशना पड़ेगा। दिल्ली से उड़कर यूपी के गांव और कस्बे में आना होगा।
जी हुजूरी करने वाले कुछ कांग्रेसी नेता मानते हैं कि राहुल या प्रियंका अगर सरकार चलाने का अनुभव लेना चाहते हैं तो उन्हें यूपी में आजमाना चाहिए। अरे भैया, सीधे मुख्यमंत्री का अनुभव क्यों देना चाहते हो। बाकी नीचे का काम आता है, आता होता तो पार्टी की इतनी बुरी गति नहीं होती। लोकसभा में राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया था पर कोई कमाल नहीं दिखा सके तो अब आगे फिर मौका क्यों दिया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि पहले वो 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो जाते हैं तब वो एक अरब से अधिक की आबादी की समस्या को सुलझा पाने के लायक होंगे। कितनी हास्यास्पद स्थिति है, अरे वे सबसे पहले 20 लोगों की समस्याओं को तो अकेले सुनें, समझें और हल करके रिपोर्ट लें। कई नेता तो मजाकिया अंदाज में राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का अभिषेक बच्चन मानते हैं। लोग कहते हैं कि अभिषेक, अमिताभ का बेटा होते हुए और ढेरों अवसर मिलने के बाद भी सफलता की उन बुलंदियों तक नहीं पहुँच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जाती है।
सूबे के जातीय समीकरण में सामान्य वर्ग की संख्या 20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 54.05, अनुसूचित जाति 24.94 व अनुसूचित जनजाति 0.06 प्रतिशत है। सपा का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव समाज में है। कांग्रेस मजबूत हुई तो आजम खान जैसे लोगों से नाराज मुस्लिम टूटकर कांग्रेस में आ सकते हैं क्योंकि भाजपा को अब भी मुसलमान कम स्वीकार रहा है। यहां मुस्लिम 15-18 प्रतिशत हैं और यादव नौ प्रतिशत। वैसे भी मुस्लिम समुदाय में सपा का वोट बैंक घटकर आधे से भी कम रह गया है। जबकि यादव समाज के तीन चौथाई वोट उसे अब भी मिलते हैं। उत्तर प्रदेश के 19 प्रतिशत दलित समाज के वोट पर मायावती का एकाधिकार है। दलित वोटर के लिए तो जैसे मायावती के सात खून माफ हैं और ये वोट कहीं खिसकने वाले नहीं हैं। कांग्रेस के पतन के बाद कुछ प्रतिशत ब्राह्मण पद और प्रतिष्ठा की लालसा में बसपा के साथ गए हैं। हालांकि ये आते-जाते रहे हैं।
शर्मनाक तो यह है कि सपा और बसपा सरकारों में एक के बाद एक सत्ता का स्वाद लेने की होड़ लगी है। एक की सरकार में कानून व्यवस्था बदतर हो जाती है तो दूसरे के कार्यकाल में सब कुछ एकतरफा सा दिखने लगता है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां विकल्प देने में नाकाम रही हैं। वोटर भी क्या करे एंटी-इनकंबेंसी यानी मौजूदा सरकार के खिलाफ दूसरे नंबर वाली पार्टी को मजबूरी में मौका दे देता है।
खबर है कि कांग्रेस बिहार जैसा यूपी में जदयू और एनसीपी से गठजोड़ कर विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह मान लिया जाएगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में अब वो दमखम नहीं रहा कि वह देश की सत्ता को संभाल सके। जब यूपी अकेले नहीं संभलेगी तो देश क्या संभलेगा। यूपी में एनसीपी और जदयू को तो फायदा पक्का मिलेगा, हो सकता है कांग्रेस की कुछ सीटें भी बढ़ जाएं पर जो निराशा कार्यकर्ताओं और खुद पार्टी के भीतर पनपेगी वो पार्टी को पतन की ओर ही धकेलेगी। अब वक्त आ गया है प्रशांत किशोर भी पार्टी को ऐसी सुझाव रूपी संजीवनी दें कि वह गांधी परिवार से अलग भी कुछ सोचना शुरू करे और पहले खुद में और फिर जनता में दोबारा भरोसा कायम करे। नया नेतृत्व ढूंढ़े तो शायद काम बन सकता है।
ये यूपी नहीं दिल्ली की सत्ता संभालने वालों का किला है, जो इसे संभाल पाएगा वही सुल्तान कहलाएगा।
