बुधवार, 11 मई 2016

अपने किले में हथियार डालना समझदारी तो नहीं

पहले जब राजा-महाराजा युद्ध के लिए निकलते थे तो अपने एक सबसे खास सिपहसालार की टुकड़ी को किले की सुरक्षा के लिए छोड़ जाते थे। अपनी सरजमीं की सुरक्षा को अभेद्य सुनिश्चित करना उनका मकसद होता था। आज जंग कम चुनाव ज्यादा होते हैं और किले की जगह चुनावी गढ़ ने ले ली है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं लेकिन बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री की एक के बाद एक बलिया और बनारस की रैली ने इसके संकेत भी दे दिए। पार्टियों के रणनीतिकारों ने युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया है।
बसपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात कही है। सपा की मौजूदा सरकार है तो उसका किसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी बिहार में उसे दरकिनार कर दिया गया था तो वह पुराने दोस्तों को करारा जवाब देना चाहेगी। रही बात कांग्रेस और भाजपा की। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का जबरदस्त फायदा उठाने वाली भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरने की रूपरेखा तैयार कर रही है। दिल्ली और बिहार में उसे भले ही मुंह की खानी पड़ी हो मगर मोदी-शाह की टीम इसे भुलाकर यूपी की सत्ता पर सवार होने का ख्वाब देख रही है। इसमें सबसे बुरी हालत में कांग्रेस है। लगातार दो बार केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद अब न तो पार्टी में कोई हिंदीभाषी दमदार नेता दिखता है और न ही पार्टी नेतृत्व अपनी साख बचा पा रहा है। टूजी, कोल, कॉमनवेल्थ जैसे घोटोलों के बदनुमा दाग पार्टी अभी धो भी नहीं पाई थी कि अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले ने उसकी किरकिरी करानी शुरू कर दी। ऐसे में देश की सियासत के लिहाज से महत्वपूर्ण सपा का हो चुका यूपी का किला क्या कांग्रेस 2017 में भेद पाएगी, यह बड़ा सवाल है।

आजादी के बाद कांग्रेस ने अविभाजित यूपी को वीर बहादुर सिंह, श्रीपति मिश्र, विश्वनाथ प्रताप सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, सुचेता कृपलानी, चंद्रभानु गुप्ता, संपूर्णानंद और गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री दिए हैं। पर आखिरी बार पार्टी के नारायण दत्त तिवारी 1988-89 में मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद सपा, बसपा और भाजपा को सूबे की सत्ता मिलती रही है।

इलाहाबाद जिले के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता से हाल ही में मुलाकात हुई। 4-5 साल पहले तक वह राजनीति में सक्रिय थे पर अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। उन्होंने कई कांग्रेसी सांसदों और विधायकों का वोट बैंक बढ़ाकर सत्ता का स्वाद चखाया है। खुद कभी पद का लोभ नहीं किया। आज भी कांग्रेस पार्टी के लिए उनके दिल में काफी सम्मान है। यूपी में कांग्रेस, के सवाल पर कहते हैं, देखिए जी परिवार का मुखिया सबसे अहम होता है। परिवार का तानाबाना, फैसला, पड़ोसियों से संबंध, समाज में मान-सम्मान, समर्थन सब कुछ उसी के नेतृत्व में मिलता है। ऐसे में उसका अक्लमंद, मृदुभाषी, ज्ञानी, थोड़ा चतुर, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबसे महत्वपूर्ण जमीन से जुड़ा होना काफी अहम हो जाता है। अब कांग्रेस को देखिए। मुखिया कौन है। क्या वह सबको साथ लेकर चलने वाला है। क्या वह जमीनी नेता लगता है। वह कहते हैं जब तक राजीव गांधी जैसा सरल, मृदुभाषी और जमीनी नेता कांग्रेस के पास था स्थिति मजबूत थी। अब गांधी परिवार की छांव से पार्टी को निकलने की जरूरत है। जितनी जल्दी पार्टी नया नेतृत्व खोजेगी, उतनी जल्दी उसका कद और सम्मान बढ़ेगा। बाकी सोनिया जी को बहुत कुछ नुकसान उनकी खराब हिंदी की वजह से हो जाता है। काफी लोग तो उनकी हिंदी को समझ नहीं पाते या फिर मजाक बनाकर गंभीरता से नहीं लेते। राहुल गांधी में राजीव का अक्स तो दिखता है पर उनके चारों तरफ घिरे लोगों ने कभी खुद पर भरोसा करने नहीं दिया। हर चीज उन्हें लिखकर, समझाकर करने को दी। अब स्थिति यह है कि एक ही तरह की बात वह हर जगह करते दिख जाते हैं। इससे लोगों में संदेश गलत जाता है। वहीं मोदी हैं जो समय, जगह और लोगों के हिसाब से बोलते हैं और लोगों को अपना मुरीद बना लेते हैं।

कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी यूपी में राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर सकती है। आलाकमान और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के बीच इस पर चर्चा भी हुई है। खुद को साबित करने के लिए राहुल गांधी को एक दिन का संसदीय दौरा छोड़कर जनता के बीच वास्तव में आना होगा। अभी वह सिर्फ महीने-दो महीने में एक दिन अपने क्षेत्र में गाड़ी से उतरते गरीब के यहां रोटी खाते, या फिर हाथ हिलाते देखे जाते हैं। उन्हें खुद को जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध करना होगा। इससे उन्हें जनता को समझने का मौका मिलेगा और जनता भी उन्हें अच्छे से जानेगी। अभी तो वह सेलिब्रिटी ही हैं।
यूपी कांग्रेस का गढ़ रहा है। उसके समर्पित कार्यकर्ता आज भी हैं पर सूबे में पतली हालत के चलते किसी दूसरी पार्टियों से जुड़ गए हैं। कांग्रेस नेतृत्व को एक लहर पैदा करनी होगी। आओ चलें, अपने घर आई है कांग्रेस, जैसा एक अभियान शुरू करना होगा। पिछले 25-28 साल में क्या नफा नुकसान हुआ जनता को समझाना होगा। सर्वर्णों और अल्पसंख्यक वोटरों में कांग्रेस के लिए सम्मान आज भी है बस उन्हें उम्मीद दिखनी बंद हो गई है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी बेबस नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंदर किसी प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रप नेता के अभाव में कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर है। यह गंभीर स्थिति है। भले ही भाजपा केशव प्रसाद मौर्य जैसे कम चर्चित व्यक्ति के नेतृत्व में चुनाव हार जाए पर वह बड़ा एवं जोखिम भरा फैसला लेने में पीछे नहीं हटी। हालांकि इसके जातिगत और कई अन्य समीकरण भी हैं पर कांग्रेस को इससे सीख लेना चाहिए। वैसे बिहार में पिछड़ों, अतिपिछड़ों की एकजुटता के कारण बुरी हार का सामना करने के बाद भाजपा द्वारा अगला प्रदेश अध्यक्ष ऐसे ही किसी शख्स को बनाए जाने की संभावना थी। यूपी में कांग्रेस को भी मिलेंगे कई केशव, बस तलाशना पड़ेगा। दिल्ली से उड़कर यूपी के गांव और कस्बे में आना होगा।

जी हुजूरी करने वाले कुछ कांग्रेसी नेता मानते हैं कि राहुल या प्रियंका अगर सरकार चलाने का अनुभव लेना चाहते हैं तो उन्हें यूपी में आजमाना चाहिए। अरे भैया, सीधे मुख्यमंत्री का अनुभव क्यों देना चाहते हो। बाकी नीचे का काम आता है, आता होता तो पार्टी की इतनी बुरी गति नहीं होती। लोकसभा में राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया था पर कोई कमाल नहीं दिखा सके तो अब आगे फिर मौका क्यों दिया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि पहले वो 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो जाते हैं तब वो एक अरब से अधिक की आबादी की समस्या को सुलझा पाने के लायक होंगे। कितनी हास्यास्पद स्थिति है, अरे वे सबसे पहले 20 लोगों की समस्याओं को तो अकेले सुनें, समझें और हल करके रिपोर्ट लें। कई नेता तो मजाकिया अंदाज में राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का अभिषेक बच्चन मानते हैं। लोग कहते हैं कि अभिषेक, अमिताभ का बेटा होते हुए और ढेरों अवसर मिलने के बाद भी सफलता की उन बुलंदियों तक नहीं पहुँच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जाती है।

सूबे के जातीय समीकरण में सामान्य वर्ग की संख्या 20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 54.05, अनुसूचित जाति 24.94 व अनुसूचित जनजाति 0.06 प्रतिशत है। सपा का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव समाज में है। कांग्रेस मजबूत हुई तो आजम खान जैसे लोगों से नाराज मुस्लिम टूटकर कांग्रेस में आ सकते हैं क्योंकि भाजपा को अब भी मुसलमान कम स्वीकार रहा है। यहां मुस्लिम 15-18 प्रतिशत हैं और यादव नौ प्रतिशत। वैसे भी मुस्लिम समुदाय में सपा का वोट बैंक घटकर आधे से भी कम रह गया है। जबकि यादव समाज के तीन चौथाई वोट उसे अब भी मिलते हैं। उत्तर प्रदेश के 19 प्रतिशत दलित समाज के वोट पर मायावती का एकाधिकार है। दलित वोटर के लिए तो जैसे मायावती के सात खून माफ हैं और ये वोट कहीं खिसकने वाले नहीं हैं। कांग्रेस के पतन के बाद कुछ प्रतिशत ब्राह्मण पद और प्रतिष्ठा की लालसा में बसपा के साथ गए हैं। हालांकि ये आते-जाते रहे हैं।

शर्मनाक तो यह है कि सपा और बसपा सरकारों में एक के बाद एक सत्ता का स्वाद लेने की होड़ लगी है। एक की सरकार में कानून व्यवस्था बदतर हो जाती है तो दूसरे के कार्यकाल में सब कुछ एकतरफा सा दिखने लगता है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां विकल्प देने में नाकाम रही हैं। वोटर भी क्या करे एंटी-इनकंबेंसी यानी मौजूदा सरकार  के खिलाफ दूसरे नंबर वाली पार्टी को मजबूरी में मौका दे देता है।

खबर है कि कांग्रेस बिहार जैसा यूपी में जदयू और एनसीपी से गठजोड़ कर विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह मान लिया जाएगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में अब वो दमखम नहीं रहा कि वह देश की सत्ता को संभाल सके। जब यूपी अकेले नहीं संभलेगी तो देश क्या संभलेगा। यूपी में एनसीपी और जदयू को तो फायदा पक्का मिलेगा, हो सकता है कांग्रेस की कुछ सीटें भी बढ़ जाएं पर जो निराशा कार्यकर्ताओं और खुद पार्टी के भीतर पनपेगी वो पार्टी को पतन की ओर ही धकेलेगी। अब वक्त आ गया है प्रशांत किशोर भी पार्टी को ऐसी सुझाव रूपी संजीवनी दें कि वह गांधी परिवार से अलग भी कुछ सोचना शुरू करे और पहले खुद में और फिर जनता में दोबारा भरोसा कायम करे। नया नेतृत्व ढूंढ़े तो शायद काम बन सकता है।

ये यूपी नहीं दिल्ली की सत्ता संभालने वालों का किला है, जो इसे संभाल पाएगा वही सुल्तान कहलाएगा।

गुरुवार, 5 मई 2016

अमेरिका में ट्रंप की चुनावी फिजा

अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। ओबामा के बाद सुपरपावर अमेरिका का कमांडर इन चीफ कौन होगा, यह जानने की उत्सुकता दुनिया भर के लोगों में है। विवादित बयानों से सुर्खियों में आए डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदवारी रिपब्लिकन पार्टी से पक्की हो गई है जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी से हिलेरी क्लिंटन सबसे आगे हैं। पांच राज्यों में क्लीन स्वीप और फिर इंडियाना में शानदार जीत के बाद ट्रंप को 1237 प्रतिनिधियों के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए अब महज 190 डेलीगेट की दरकार है। इधर, उनके दो बड़े प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज और जॉन कैसिच ने दावेदारी वापस ले ली है। इससे ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती खत्म हो गई है। एक तरफ अरबपति कारोबारी रिपब्लिकन ट्रंप को विवादों की लहर का फायदा मिलता दिख रहा है तो वहीं अनुभवी डेमोक्रेट पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी आगे चल रही हैं पर चुनावी फिजा उतनी दमदार नहीं है क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों को भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।

 राष्ट्रीय हित की बात तो हर नेता करता है ऐसे में यह समझना दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि अमेरिका फर्स्ट की बात करने वाले ट्रंप में खास क्या है जो वे अमेरिकियों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। शायद एक सबसे बड़ी बात जिससे वे सुर्खियों में आए वो था मुस्लिमों को अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी का उनका विवादित बयान। वैसे तो इस तरह का बयान लोकतांत्रिक नेता को शोभा नहीं देता पर इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया जिस दहशत में है उसी का परिणाम है कि बिना ज्यादा सोचे अमेरिकी ट्रंप के समर्थन में आ गए हैं और ध्रुवीकरण शुरू हो गया है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के सुपरपावर बनने पर बड़े युद्ध तो नहीं हुए लेकिन नई चुनौतियां जरूर खड़ी हुईं। महाविनाशक हथियार बने, लंबी दूरी की मिसाइलें आ गईं, साइबर वार ‌छिड़ा और सबसे खतरनाक आतंकवाद और कट्टरपंथ ने जड़ें जमानी शुरू कर दी। अमेरिका को हिलाकर रख देने वाले 9/11 की घटना के बाद नीतियां बदलने से सुरक्षा मजबूत तो हुई पर कई गंभीर समस्याओं ने देश को जकड़ लिया। अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, रोजगार घटे, असमानता और मौतें बढ़ीं, ऐसे में सुरक्षा पर खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ा, इन सबके बीच अमेरिका को सुपरपावर बनाए रखते हुए सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर पाना चुनौतीपूर्ण हो गया। अब नए राष्ट्रपति इससे कैसे निपटते हैं, यह भविष्य की गर्भ में है लेकिन ट्रंप ने चुनावी प्रचार और डिबेट के दौरान अपनी नीतियों को जिस बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है उससे मतदाताओं में उनके प्रति भरोसा बढ़ा है। प्राइमरी चुनाव के नतीजे इसका प्रमाण हैं। मुद्दा कोई भी हो अवैध अप्रवासियों को रोकने का, मैक्सिको सीमा सील करने या इस्लामिक कट्टरपंथ के सफाए का। दरअसल अमेरिका के लोग सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते। ओबामा के कार्यकाल में देश में कोई बड़ा हमला तो नहीं हुआ पर दुनिया में अमेरिकियों के मारे जाने का सिलसिला भी नहीं थमा। अकेले इराक और अफगानिस्तान में ही 6,845 अमेरिकी मारे गए और नौ लाख घायल हो गए। अब जनता ऐसा राष्ट्रपति चाहती है जो जवानों की जान का सौदा किए बिना सुरक्षा दे और दुनिया में अमेरिका के दबदबे को कायम रख सके। ट्रंप यह भलीभांति समझते हैं इसीलिए वे बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि दुनिया भर में अमेरिकियों की सुरक्षा ट्रंप प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

प्रधानमंत्री मोदी की तरह ट्रंप लिखा हुआ नहीं पढ़ते। इससे वे जनता से सीधे जुड़ पाते हैं क्योंकि वह सरल और जमीनी बातें कर रहे होते हैं। वे भाषण के दौरान विरोधियों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकते। या यूं कहें उन्हें जनता को लुभाने की कला आती है। वे कहते हैं कि अमेरिका ने दुनिया को नाजियों और जापानियों से बचाया। लेकिन आज अमेरिका का कद घट गया है। हमारी विदेश नीति लड़खड़ा गई है। इराक, मिस्र, लीबिया, सीरिया हर जगह हम नाकाम रहे। आज जरूरत है एक मजबूत नेता कि जो अमेरिका का गौरव और रुतबा लौटा सके। रियल एस्टेट कारोबारी ट्रंप कारोबार, आव्रजन, अर्थव्यवस्था, रोजगार और सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं।

ट्रंप अमेरिका की मौजूदा सैन्य ताकत को पहले से कमजोर बताते हैं। 1991 में अमेरिका के सक्रिय सशस्त्र बल की तादाद करीब 20 लाख थी जो घटकर 13 लाख रह गई है। नौसेना के एक्टिव शिप 316 बचे हैं। वायुसेना की ताकत तिहाई रह गई है। सैन्य बजट भी घटा है। उधर, आईएसआईएस, अल कायदा, तालिबान, बोको हराम जैसे आतंकी संगठन हैं जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की साजिश रच रहे हैं। ट्रंप में लोग ऐसा दमदार नेतृत्व देख रहे हैं जो बेझिझक सियासत किए बिना देशहित में फैसले ले सके।

हकीकत यह है कि आज अमेरिका का चीन से कारोबार घाटा बढ़ा है, सीमाएं खुलने से अवैध तरीके से घुसपैठ बढ़ी है। आज बेरोजगारी दर पांच फीसदी तक जा पहुंची है। ट्रंप का दावा है कि घर की माताओं, बुजुर्गों और किशोरों की बेरोजगारी को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 93 मिलियन (कुल आबादी 323 मिलियन) पहुंच जाएगा। उत्तर कोरिया जैसा छोटा सा देश अमेरिका को धमकी देता है। सऊदी अरब आंख दिखा रहा है। इसके लिए वे ओबामा की विदेश नीति को जिम्मेदार बताते हैं। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले देशों को उजागर न करने, मध्य पूर्व में अस्थिरता और ईसाइयों को आतंकियों से न बचाने के मुद्दे को उन्होंने जोरशोर से उछाला है। एक तरफ वे चीन और भारत पर नौकरियां छीनने का आरोप लगाते हैं तो वहीं रूस से शत्रुता भुलाकर शांतिपूर्ण संबंध की भी वकालत करते हैं। उनका मत साफ है कि अमेरिकियों को पहली प्राथमिकता मिलेगी।

ट्रंप जीतते हैं तो आतंकवाद के खिलाफ भारत को पूरा सहयोग मिल सकता है। पाकिस्तान के परमाणु जखीरे के कारण ट्रंप उसे दुनिया का संभवत: सबसे खतरनाक मुल्क भी करार दे चुके हैं। उनका संकेत साफ है कि जिन देशों से मदद के बदले में धोखा मिलता है, उन्हें धन रोका जाएगा। अमेरिका से पाक को अरबों डॉलर की मदद मिलती रही है। अब लड़ाकू विमान एफ-16 भी देने की बात चल रही है। ओबामा ने 2016-17 के लिए पाक को 860 मिलियन डॉलर की मदद देने का प्रस्ताव रखा है। ट्रंप जीते तो यह सब बंद होगा या फिर पाक को आतंकियों के प्रति नरमी छोड़नी होगी। यह रवैया भारत के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि विदेशी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार में करता रहा है। हालांकि आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। एच1बी वीजा पर ट्रंप अपना पुराना विरोधी रुख बदल रहे हैं। ट्रंप ग्रुप ने पुणे और मुंबई में दो रियल एस्टेट कंपनियों के साथ मिलकर अपार्टमेंट प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है। आने वाले समय में यह कारोबारी रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।

अब देखना यह है कि ट्रंप अगर व्हाइट हाउस पहुंचते हैं तो वह अपने वादों को कितना अमलीजामा पहना पाते हैं या फिर सब चुनावी जुमले ही साबित होंगे।