रविवार, 12 मार्च 2017

अपने फैसले खुद क्यों नहीं लेता मुस्लिम समुदाय

बंटवारे के गुस्से ने तब देश के हिंदुओं और मुसलमानों में एक दूसरे के लिए नफरत भर दी थी। कुछ साल पहले तक देश के लिए मर मिटने वाले भारतीय अब हिंदू और मुसलमान दो खेमों में बंट चुके थे। आगे क्या हुआ, यह इतिहास है। जिन मुसलमानों को जिन्ना के टू नेशन थ्योरी पर यकीन नहीं था, उन्होंने कभी भी पाकिस्तान जाने की नहीं सोची। बाद में सियासी समीकरण इस तरह सेट किए गए कि कांग्रेस खुद को मुसलमानों की एकमात्र मसीहा पार्टी के तौर पर पेश करने में कामयाब रही। जनसंघ और फिर 90 के दशक में राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भी अपना परचम लहराया। कांग्रेस जहां भाजपा को मुस्लिम विरोधी साबित कर मुसलमानों का वोट बटोरने में कामयाब होती रही तो क्षेत्रीय पार्टियों ने भी जातिवादी और स्थानीय मुद्दों को हवा देकर सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान मुसलमानों की अगुआ बनी कांग्रेस ने समुदाय को कभी खुद अपने बारे में सोचने का मौका नहीं दिया। दंगे होते रहे पर सवालों के घेरे में हमेशा भाजपा को रखा गया। धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और फिर असहिष्णुता जैसे शब्दों के सियासी इस्तेमाल ने केवल नेताओं को जबरदस्त फायदा पहुंचाया। लेकिन मोदी के सत्ता पर काबिज होने के बाद काफी कुछ बदला है, जो शायद अब मुसलमानों को भी समझना होगा।

पहले 2014 का लोकसभा चुनाव और हाल में यूपी समेत पांच राज्यों में भाजपा की शानदार विजय। इसमें वैसे तो क्षेत्रीय पार्टियों समेत देशभर के नेताओं के लिए संदेश छिपा है पर सबसे ज्यादा अगर किसी समुदाय को सोचने पर मजबूर होना पड़ा है तो वह है देश का मुसलमान।

बाबरी मस्जिद की बात कर पार्टियों ने मुसलमानों को खुद फैसला लेने नहीं दिया और फिर गुजरात दंगों की याद दिलाकर पिछले डेढ़ दशक से उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। दंगों में दोनों समुदायों के लोग मारे गए, कोर्ट ने फैसला भी सुनाया पर मुसलमानों का हितैषी बनने के लिए नेता उस पर ही सवाल उठाते रहे।

दूसरी तरफ एक बड़ी बात जो गौर करने की है वो है यूपी में भाजपा द्वारा एक भी मुसलमान को उम्मीदवार न बनाना। भाजपा कह रही है कि टिकट देने में जिताऊ फैक्टर को ही केवल आधार बनाया गया। हिंदू-मुस्लिम के आधार पर लोगों को बांटकर टिकट नहीं दिए गए। हो सकता है यह सच हो पर मुसलमानों के लिए यह सोचने का वक्त है। अपने देश में 80 फीसदी हिंदू और करीब 14 फीसदी मुसलमान हैं और अगर एक पार्टी केवल हिंदुओं के बल पर चुनाव जीतकर सत्ता में आ जा रही है तो उनके प्रतिनिधित्व का क्या होगा। अल्पसंख्यकों के अपने मुद्दे हैं, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को बस चुनाव के समय उछाला जाता है पर क्या उसके आधार पर काम करने के प्रयास नहीं होने चाहिए। अगर भाजपा सबका साथ सबका विकास के फलसफे पर काम करना चाहती है तो उसे वोट देने पर फैसला मुसलमान खुद क्यों न लेता। क्या मुसलमान नहीं चाहते कि हर पार्टी में उनके प्रतिनिधि हों। वे पार्टियों की राजनीतिक गोटी बनने के बजाए खुद मैदान में क्यों न उतरे। जो पार्टी उनके हितों की बात करे उसे वे क्यों न वोट दें। पर अब तक होता यह आ रहा है कि जो पार्टी भाजपा को हराने में दमदार दिखती है, उसे ही मुसलमानों का वोट दिलवाने की कोशिश की जाती है इसमें उनके मौलाना व उलमा का भी बड़ा रोल रहता है। उनके ही कौम के नेता पुराना खौफ याद दिलाकर पूरी की पूरी जमात को भाजपा के विरोध में खड़ा कर देते हैं। इस बार यूपी में मुसलमानों की वोट वैसे भी खराब गई। भाजपा ने दलित-पिछड़ा समीकरण बिठाया, मुसलमान सपा के साथ चले गए और बसपा पीछे रह गई और जीत भाजपा की हो गई। क्या मुसलमान बस नेताओं को हराने जिताने की एक कड़ी भर हैं। उनके विकास का कोई मतलब नहीं।

मुसलमान खुद यह फैसला क्यों नहीं करते कि वे तुष्टीकरण में बंधे नहीं रहेंगे। भाजपा ने कभी ऐसा नहीं कहा कि वह हिंदुओं की पार्टी है, हां विपक्ष ने जरूर ऐसा प्रचारित किया। जब देश के मुसलमानों को टोपी पहनने, दाढ़ी बढ़ाने या फिर नमाज पढ़ने को धार्मिकता से जोड़कर देखा जाता है तो फिर जय श्री राम का उद्घोष, माथे पर तिलक या कीर्तन करना सांप्रदायिक कैसे हो गया। क्या मुसलमानों को यह बात समझ में नहीं आती है कि आपका वोट पाने के लिए कुछ मिनट के लिए नेता टोपी पहनकर पाखंड करते हैं। ये आपका विकास कभी नहीं करेंगे क्योंकि उनकी नीयत में खोट है। इससे अच्छा वो है जो तुष्टीकरण नहीं करता, हिंदू है तो माथे पर तिलक लगाकर आपसे मिलने आता है और आपके विकास की बात करता है। बाकी यह भी समझना होगा कि अच्छे या खराब, कट्टरपंथी या उदारवादी, आधुनिक सोच रखने वाले या दकियानूसी सोच में गिरफ्तार लोग हर देश में हर पार्टी, हर समाज में होते हैं और हमें सबके साथ सामंजस्य बिठाकर चलना होता है। इसमें डरने या डराने जैसी कौन सी बात है।

अपने देश में तो सबसे बड़ी ताकत हमारा संविधान है जिसने सभी को अपने धर्म का पालन करने और समानता के अधिकार से परिपूर्ण किया है। तो फिर ये अलगाव किसने क्या। यूपी में बिना मुसलमानों के सहयोग और उनके प्रतिनिधित्व के भाजपा का विजयरथ पर सवार होना मुसलमानों के लिए बड़ा संकेत है अब सोचना उन्हें है कि वे वोट बनकर रहना चाहते हैं या विकास की दौड़ में खुद भागीदार बनना चाहते हैं। अपने देश की विविधता का अद्भुत उदाहरण इस बार यूपी में देखने को मिलेगा जब हज यात्रा का कामकाज और अल्पसंख्यक विकास मंत्रालय का जिम्मा किसी हिंदू के पास होगा। यही तो हमारे देश की खूबी है। जय हिंद

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

समर्थकों की वाहवाही से नुकसान किसका है



दुनिया में लोकतंत्र का प्रादुर्भाव जनता के कल्याण के लिए हुआ था, जहां नुमाइंदगी के तौर पर राजनीतिक पार्टियां साधन मात्र थीं। यानी एक पार्टी या विचारधारा के लोग अगर अच्छा काम नहीं करते हैं तो जनता को यह अधिकार होगा कि वे अगले चुनाव में उनकी जगह दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप दे। अब आज के परिदृश्य पर लौटते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने अगर सबसे ज्यादा समय तक शासन किया तो अच्छाइयों के साथ उनकी खामियां भी गिनाई जाती है। भाजपा या एनडीए, जनता पार्टी आदि की सरकार के भी कमजोर पहलू को विपक्षी पार्टियां हमेशा उजागर करने की कोशिश करती हैं। दरअसल, लोकतांत्रिक प्रणाली की अपनी खूबी है यहां सबको जनता की कसौटी पर खरा उतरना होता है। पिछले ढाई साल से देश में पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार है। नरेंद्र मोदी के साथ विवाद गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल से ही जुड़े हैं। आज वे देश के प्रधानमंत्री हैं और अपने आप में संस्थान हैं। दुनिया में उनसे देश की पहचान है। उनका हर अच्छा फैसला अगर उन्हें लोकप्रिय बनाएगा तो वहीं हर गलत कदम आलोचना के दरवाजे खोल देगा और इसके लिए पूरी सरकार और भाजपा को धैर्य और संयम बनाए रखना चाहिए। 22 दिसंबर को बनारस के दौरे पर पीएम मोदी के भाषण ने उनके एक अलग तरह के व्यक्तित्व को सामने रखा है, जिसका विश्लेषण करने की जरूरत है। यह सवाल भी प्रासंगिक हो गया है कि क्या समर्थकों की वाहवाही या सभा में गूंजती तालियां बेहतर सरकार का प्रमाणपत्र हैं और क्या इससे जनता का कोई हित पूरा होता है या नहीं।

पहले भी सत्तारूढ़ और विपक्षी नेता एक दूसरे का उपहास करते रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं है। पर आज का माहौल ऐसा हो गया है कि जनता को हंसाने या तालियां बज उठने को अच्छी सरकार या अच्छा नेता मानने की भूल की जा रही है। यह एक तरह से पैमाना बनता जा रहा है, जिसकी बात पर जनता ज्यादा हंसे या नारेबाजी करने लगे वह सबसे लोकप्रिय और अच्छा नेता है। तब तो कपिल शर्मा को देश का प्रधानमंत्री बना देना चाहिए क्योंकि वे हर घर के लोगों को और रोज हंसाते हैं। दरअसल, नेता को किसी तीन घंटे के सिनेमाई हीरो से अलग रखकर देखने की जरूरत है। जिस दिन हम किसी कलाकार की तरह नेताओं के फैन हो जाते हैं हम अपना संभावित विकास होने की उम्मीद धो देते हैं। क्योंकि तब नेता सेलिब्रिटी और हम उसके साथ फोटो खिंचाने वाले या ऑटोग्राफ लेने वाले एक प्रशंसक मात्र बनकर रह जाते हैं। इसे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता क्योंकि इससे एकपक्षीय शासन का खतरा बढ़ जाता है। नोटबंदी से जनता की परेशानी, किसानों की आत्महत्या, हवा में घुलता प्रदूषण, सड़कों पर बढ़ती गाड़ियां, आए दिन होते रेल हादसे, साफ पीने के पानी का संकट, बेरोजगारी जैसे गंभीर और प्रासंगिक मुद्दे गौण हो जाते हैं। बैठकबाजों, चाय की दुकानों, गली, नुक्कड़ पर नेता के हंसाने वाले भाषणों को ही चटकारे मारकर सुना और सुनाया जाता है। ऐसे में कोई विरोध करता है तो उस पर द्रोही होने का ठप्पा चस्पा कर दिया जाता है। यह गंभीर स्थिति है और इससे नेताओं का तो फायदा है पर जनता का नुकसान है। नेताओं की फैन फॉलोइंग नहीं उनके विकास को फॉलो करने की जरूरत है, जिससे लोकतंत्र का सार्थक परिणाम निकलकर सामने आएगा। भाषायी कलाबाजी को देखने सुनने के बजाए विकास के मुद्दों पर लौटने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री ने जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का माखौल उड़ाया, इसमें कोई नई बात नहीं यह तो सभी पार्टियां करती हैं। पर पाकिस्तान की सेना और आतंकियों के उदाहरण ने उनके राजनीतिक कद को छोटा कर दिया है। संसद में हंगामे की उन्होंने जिस तरह से एक जेबकतरे से तुलना की वह लोगों से तालियां बजवाने की उनकी ओछी कोशिश ही कही जा सकती है। आखिर प्रधानमंत्री या भाजपा यह बताने का कष्ट करेगी कि जिस सदन में पक्ष और विपक्ष के सांसदों पर चर्चा कर जनता के हित में कानून बनाने की अहम जिम्मेदारी है वहां प्रधानमंत्री नोटबंदी के मुद्दे पर भागते क्यों रहे। कांग्रेस या विपक्ष का संसद न चलने देने का रवैया भी सही नहीं था पर अगर प्रधानमंत्री रैलियों में नोटबंदी की बात कर सकते हैं तो संसद में क्यों नहीं। क्या वे सिर्फ अपनी बात रखना चाहते हैं। ऐसे में सभा या पार्टी मीटिंग में ही बोलने का विकल्प बचता है जहां उनकी बात को सुनकर तालियां बजाने के बजाए विरोध के स्वर नहीं उठेंगे। तब लोकतंत्र कहां रहा यह तो एकपार्टी शासन हो गया। नोटबंदी के फैसले से नरेंद्र मोदी, भाजपा या सरकार को ही फायदा होने जा रहा है ऐसा भी नहीं है, यह देशहित में लिया गया एक बड़ा प्रभावी कदम है पर जनता को ये तो अधिकार है कि वह सरकार से सवाल करे कि उसे लाइन में इस तरह क्यों परेशान किया जा रहा है। जनता की नुमाइंदगी सांसद करते हैं तो संसद में बहस तो होनी चाहिए थी पर न तो विपक्ष ने और न ही सरकार की ओर से इस दिशा में पर्याप्त प्रयास किए गए। नुकसान जनता के पैसों का हुआ। आखिर में यह मुद्दा सरकार और विपक्ष के बीच वर्चस्व की लड़ाई बनकर रह गया है।

जनता को इससे कोई मतलब नहीं है कि राहुल गांधी ने बोलना सीख लिया या नहीं। वे अच्छा बोल पाते हैं या उनके बोलने से भूंकप आएगा या नहीं पर जनता को यह जानने का अधिकार है कि प्राइवेट बैंकों के एटीएम खाली क्यों पड़े हैं। राजधानी दिल्ली में कई एटीएम से 2500 की बजाए 2000 रुपये ही क्यों निकल रहे हैं। अगर कालाधन रोकने की यह पहल है तो 2000 के नोट क्यों छापे गए। विरोध और सवाल पूछना तो लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन जनता की तालियां बटोरकर इसका जवाब देने से बचने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री ने इसका एलान किया था तो उन्हें समर्थकों ही नहीं विरोधियों के बीच भी इस पर चर्चा करनी चाहिए थी।

वैसे भी, राजनीतिक तौर पर मोदी के बार-बार राहुल गांधी पर निशाना साधने से भाजपा का ही नुकसान हुआ है। अभी तक कांग्रेस पार्टी में दूसरे पायदान पर खड़े राहुल गांधी, मोदी को चुनौती देने वाले कांग्रेस के पहले नंबर के नेता बनकर उभरे हैं। जबकि पहले उनकी छवि ऐसे नेता की बन गई थी जिसकी बातों को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं थी। राहुल ने अगर सीधे पीएम मोदी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे तो मोदी सरकार या उनकी पार्टी को पीएम मोदी की तुलना गंगा से करने की बजाए जांच कमेटी बिठा देनी चाहिए थी या कम से कम मोदी सभा में अपनी सफाई में दो शब्द तो बोल ही सकते थे। ऐसा ही कुछ नोटबंदी से ठीक पहले बीजेपी के खातों में पैसे जमा होने के आरोप पर भी पार्टी और सरकार ने किया।  इसका मतलब यह हुआ कि वे जवाब देना या आरोप पर गंभीर होना जरूरी ही नहीं समझते। आरोप लगाना तो विपक्ष का काम है पर जनता के सामने सरकार को अपनी बेदाग छवि को साबित भी तो करना चाहिए।

अब जनता को ही समझना है कि विकास की बात करनी है, सरकार से जवाब मांगना है या फिर प्रशंसक बनकर तालियां पीटनी है। हां, अगर भ्रष्टाचार दूर होता है, गरीबी मिटती है, रोजगार बढता है, शिक्षा का स्तर सुधरता है, कालेधन के कुबेर उजागर होते हैं तो हम सभी को तालियां जरूर पीटनी चाहिए।

रविवार, 18 दिसंबर 2016

कैश छोड़ कैशलेस होने में वक्त लगेगा

500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद पूरा देश लाइन में खड़ा है और बैंकों की गडि्डयां छापे में कहीं दीवाल से तो कहीं टॉयलेट से बरामद हो रही हैं। मोदी सरकार भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ क्रांतिकारी फैसला बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है तो वहीं ढाई साल तक सुस्त रहा विपक्ष मुद्दे को अच्छी तरह भुना लेना चाहता है शायद यूपी में कुछ फायदा हो जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि भ्रष्टाचारी कौन है? जनता में छिपे लोग या तंत्र में शामिल नौकरशाह जिनके कंधों पर जिम्मेदारी सौंप कर प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार खत्म करने और कालाधन जुटाने की उम्मीद लगाए हैं क्योंकि जैसा माना जा रहा है कि बड़ी मछलियां तो नोटबंदी से पकड़ में नहीं आएंगी। 

दरअसल इस कवायद से तो और भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। खुलेआम बैंकों से नई करेंसी निकलकर धन्नासेठों के पास मिल रही है। गौर करने वाली बात तो ये है कि नए नोट आने के बाद आयकर विभाग को जैसे पंख लग गए हैं। ताबड़तोड़ छापेमारी और सभी में बड़ा पर्दाफाश। चर्चा तो ये भी है कि नई नोट में कुछ ऐसा है जो कालेधन के कुबेरों की सटीक लोकेशन दे रहा है क्योंकि इन्होंने तो पहले से ही पुरानी नोटें भी जमा कर रखी थीं तो अब तक पकड़े क्यों नहीं गए? दूसरी तरफ वो जनता है जिसके दिए कर से ही देश तरक्की करता है। इसमें कई वर्ग ऐसे हैं जो बिना कर दिए कमाई कर रहे हैं। इसमें छोटे व्यापारियों की तादाद काफी ज्यादा है। छोटे गांवों से लेकर, कस्बों और शहरों में भी हर गली नुक्कड़ पर ये दुकान चलाते हैं पर इनकी कमाई छिपी रहती हैं। पंजीकरण कराने मात्र से ये करदाता नहीं बनते और इनका धंधा फलता-फूलता रहता है। दिल्ली की अवैध बस्तियों में हजारों दुकानें हैं और गिनी-चुनी हैं जो बाकायदे टैक्स देते हैं। हो सकता है इस कवायद से उनकी पहचान हो और वे कर के दायरे में आएं। दूसरी तरफ ढाई लाख से थोड़ा ज्यादा पाने वाले कर्मचारी को सेविंग के दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं। अंसगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की भी बड़ी तादाद है जिनके साथ कंपनियां छल करती आ रही हैं। प्राइवेट टीचर हो या सुरक्षा गार्ड उनसे दस्तखत ज्यादा वेतन पर कराए जाते हैं और सैलरी के नाम पर उन्हें नगद 8-10 हजार पकड़ा दिए जाते हैं। कैशलेस होने से पहले खातों में अनिवार्य सैलरी का नियम भी लाना होगा। 

सरकार का फैसला सही है या विपक्ष के तर्क? सच मानिए तो जनता इन सवालों के चक्कर में भ्रमित हो गई है। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में असहिष्णुता के बाद विमुद्रीकरण या नोटबंदी दूसरा शब्द है जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी। सोते-जागते बस एक ही सवाल जुबान पर है- पैसे कौन से एटीम में हैं। परेशानी तो है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है और सरकार के फैसले को भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता। 
सरकार कह रही है कि नोटबंदी कैशलेस इकॉनामी की दिशा में बड़ा कदम है। सच बात है पर क्या इतने बड़े फैसले से पहले कैशलेस होने के लिए छोटे फैसले नहीं लिए जाने चाहिए थे। इससे जो परेशानी एक साथ आ गई वो बंट जाती। नोटबंदी के बाद परेशानी बढ़ी तो राहत के लिए ऑनलाइन चार्ज कम कर दिए गए या खत्म कर दिए गए। ट्रेन की टिकट बुक कराने पर अब ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं देना पड़ रहा और बीमा के भी पैसे नहीं कट रहे। अच्छा होता यह काम नोटबंदी के पहले होता तो लोग ऑनलाइन प्लेटफार्म पर आने को प्रोत्साहित होते। इसमें वक्त लग सकता था पर इसके लिए स्कूल के बच्चों से लेकर पंचायत घरों तक जागरुकता अभियान चलाया जा सकता था। 
सच मायने में नोटबंदी और कैशलेस इकॉनामी के बीच लंबी खाई है। नोटबंदी के बाद भी तो नोट उतने ही छापने पड़े तो नोट कम कहां हुए। ऐसे में नोट का इस्तेमाल तो चलता रहेगा। अब सरकार चार्ज कम कर, पेट्रोल-डीजल पर ऑनलाइन छूट, ऑनलाइन शॉपिंग व सरकारी लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए आगे आई है। यानी जबरन कैशलेस इकॉनामी नहीं बनाई जा सकती है, अब जो काम पहले किया जाना चाहिए था वो बाद में करना पड़ रहा है। कैशलेस होने से पहले आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। गांवों में बिजली के साथ इंटरनेट पहुंचाने की चुनौती है। शहरों में मोबाइल नेटवर्क की हालत किसी से छिपी नहीं है। कैशलेस के लिए इंटरनेट जनसामान्य तक पहुंचे वैसा साधारण टैरिफ प्लान कंपनियों के लिए अनिवार्य होना चाहिए और हो सके तो कुछ सेवाएं जैसे बिल भुगतान, ट्रेन-बस टिकट जैसे एप पर नेट की सुविधा फ्री दी जाए। इसके लिए छोटे से गांव से लेकर शहर के गली मोहल्लों में सार्वजनिक स्थानों पर फ्री वाई फाई की सुविधा देना एक अच्छा कदम होगा। इसके बाद ही हम उम्मीद कर सकते हैं कि लोग नोट छोड़कर नेट इस्तेमाल करेंगे। 
वास्तव में बदलाव कोई भी हो हमेशा अपने साथ कुछ समस्याएं लाता है। सभी सुविधाएं देने के बाद भी थोड़ी दिक्कत होगी क्योंकि एक ढर्रे पर चलने वाला व्यक्ति बदलाव के लिए खुद को जल्दी तैयार नहीं कर पाएगा, लेकिन फायदे बतलाकर उसे इस प्लेटफार्म पर अवश्य खींचा जा सकता है। जिस देश में आज भी कई गांवों में बिजली नहीं पहुंची है। नेता, मंत्रियों के गांवों को छोड़ दें तो यूपी के गांवों में 24 घंटे बिजली अभी सपना है। बैंक न जाना पड़े इसलिए लोग जहां गुल्लक भरते हों उनसे ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे नोट की कमी से झट से स्मार्टफोन लेकर कैशलेस काम करना शुरू कर देंगे। शहरों के युवा तो पहले से ही टेक्नॉलाजी को स्वीकार कर काफी हद तक कैशलेस हो गए हैं। देश में बड़ी आबादी उनकी भी है जिनके पास फोन नहीं है, वे कैशलेस इकॉनामी का हिस्सा कैसे बनेंगे? इस पर विचार किए बिना ही अचानक नोटबंदी का फैसला थोड़ी जल्दबाजी ही लगता है। 

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

तो क्या सेक्युलर बनने के लिए राम को भूलना होगा

प्रधानमंत्री मोदी को लेकर नया विवाद दशहरे के दिन लखनऊ में रामलीला के मंच से जयश्रीराम के उद्घोष से जुड़ा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल कह रहे हैं कि इससे साबित हो गया है कि मोदी और भाजपा सांप्रदायिक हैं। मोदी कभी टोपी क्यों नहीं पहनते। देश के प्रधानमंत्री को ऐसा बरताव करना चाहिए जिससे अल्पसंख्यकों को उनसे जुड़ाव महसूस हो। विपक्ष का तर्क है कि मोदी का राम का नाम लेना दरअसल यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर खेला गया ध्रुवीकरण का दांव है। पर सवाल यह उठता है कि क्या दशहरे पर रावण के संहारकर्ता प्रभु राम के दर्शन को उमड़े भक्तों के समक्ष पीएम को अल्ला हू अकबर कहना चाहिए तो विपक्ष को लगता कि देखो पीएम सेक्युलर व्यक्ति हैं। ये दलील जितनी खोखली लगती है उससे ज्यादा हास्यास्पद भी है। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें सपा के एक बड़े नेता यानी चाचाजी भगवान राम से अपना माल्यार्पण करवा रहे हैं तो क्या मोदी को भी ऐसा ही कुछ करवाना चाहिए था तो विपक्ष समझता कि मोदी सेक्युलर हैं। वैसे मोदी कुछ भी कहते, लखनऊ नहीं शिमला या मेघालय भी चले जाते फिर भी विपक्ष ऐसे ही दगे कारतूसों जैसे मुद्दों की ओर लपकता, क्या यही विपक्ष की भूमिका बची है।
सनातन धर्म के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम विष्णु के अवतार हैं। वे कण कण में हैं, जन जन में हैं। उनका स्मरण मन को शांति और व्यक्ति को धर्म और सच्चाई की ओर ले जाता है और जब मौका विजयादशमी का हो तो राम नाम की महिमा और भी बढ़ जाती है तो फिर इतना हंगामा क्यों। क्या कांग्रेस, सपा समेत विपक्ष मोदी के एक उद्घोष से सहम गया है। लोग उन्हें कट्टर हिंदूवादी बता रहे हैं। संविधान में देश के हर एक शख्स को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है तो क्या पीएम को सेक्युलर दिखने के लिए राम नाम भूल जाना चाहिए। अगर सेक्युलर की कोई नई परिभाषा बनाई गई हो तो फिर संसद मैं बैठने वाले नेताओं, सरकारी अधिकारियों और हर उस व्यक्ति का जो जनता से जुड़ा हो, ड्रेस कोड होना चाहिए। चाहे सबको काला कपड़ा पहना दो, सफेद, धानी, हरा, पीला कोई भी जिस रंग को विपक्ष सेक्युलर मानता हो क्योंकि भगवा और खाकी तो शामिल नहीं करना चाहेंगे। सख्त गाइडलाइन जारी की जाए कि कोई हिंदू माथे पर तिलक लगाकर या पीला कपड़ा लपेटकर नहीं आएगा। कोई मुस्लिम दाढ़ी बढ़ाकर या टोपी पहनकर नहीं आएगा। इसी तरह सिख और ईसाइयों के लिए भी निर्देश का पालन करना अनिवार्य हो क्योंकि नेताओं को जनता के सामने सेक्युलर दिखना है। अगर ऐसा होता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए कम से कम धर्म के नाम पर बाजीगरी तो बंद होगी और धर्म के ठेकेदार भी कुछ कम हो जाएंगे।

दरअसल विवाद की मूल में नेताओं का जनता के समक्ष किया जाने वाला पाखंड है। कोई खुद को समाजवादी, कांग्रेसी या कोई और नैतिकता व धर्मनिरपेक्षता को आदर्श मानने वाली पार्टी का बताके कुछ मिनट के लिए सिर पर टोपी रख ले तो उसे महान सेक्युलर होने की उपाधि दे दी जाती है। जबकि वास्तव में यह वोट पाने के लिए नेताओं द्वारा किया जाने वाला ढोंग होता है। और ये एक बार कोई एक नेता नहीं हर साल हर त्योहार पर होता है पर लोग उन्हें अपना तारणहार समझने की भूल कर बैठते हैं। इसी तरह जनता उनसे काम का हिसाब मांगने नहीं जुटती अगर ऐसा होने लगे तो जनता ढकोसला बंद करके काम करने लगेंगे। ये तो वही बात हुई जैसे कांग्रेस के एक बड़े नेता दिल्ली से जाकर यूपी में दलित के घर रोटी खाते हैं और तस्वीर दूसरे दिन अखबारों के पहले पन्ने पर होती है बाद में पता चलता है कि बर्तन तो कोई और लेकर आया था, खाना भी शायद कहीं और पका था बस घर दलित का था। सच्चाई क्या है राम जाने या वो जाने जिसे विपक्ष कहे।
इसी तरह समाजवादी पार्टी के बड़े नेता गरीबों के साथ टाट पर बैठकर भोजन करते दिखते हैं। गुणगान ऐसे किया गया जैसे वे गरीबों से बहुत ही गहराई से जुड़े हैं जबकि तस्वीरें देखिए जो प्रकाशित हुईं, टाट पर बैठे साहब और दाहिनी तरफ बच्चे को गोद में ली भोजन करती गरीब महिला के बीच छुआछूत को दर्शाने वाली दूरी आसानी से समझ में आती है। गंभीर सवाल यह है कि क्या जनता इस तरह के पाखंड से छली नहीं जा रही। क्या सच्चाई जनता के सामने नहीं होनी चाहिए। सेक्युलर दिखाने के लिए ढोंग क्यों।
कोई कह रहा है कि लखनऊ ही क्यों। इस सवाल का जवाब या तो यूपी चुनाव हो सकता है या फिर बीजेपी के लोग जानें पर ऐसा नहीं लगता कि सरकार भी चाहती है विपक्ष ऐसी ही बेसिर पैर की बातों को उछाले और चैनलों, अखबारों में इसी पर बहस होती रहे। इससे तो सत्ता पक्ष का ही फायदा हो रहा है। दो साल बताने में गुजर गए कि हम करने जा रहे हैं अभी तो आएं है समय तो दीजिए। आखिरी के दो साल ये बताएंगे कि शुरूआत कर दी है असर देखने के लिए अगली बार फिर जिताइए। क्या गजब का समीकरण है सत्ता और विपक्ष का।

वास्तविकता यह है कि देश में बहुसंख्यक हिंदू करीब 80 फीसदी हैं और जम्मू से लेकर केरल तक राम का नाम रखने वाले लोग आपको मिल जाएंगे। संसद में ही दो दर्जन से ज्यादा सांसदों के नाम राम पर हैं। वो चाहे राम विलास पासवान हो या सीताराम येचुरी। सुबह हमारी राम राम से होती है। ये नेता नहीं समझेंगे कि हमारे गांव में कोई मुसलमान सुबह जब हिंदू से मिलता है तो राम राम कहता है और हिंदू जब बुजुर्ग मियांदीन से मिलता है तो सलाम चच्चा कहता है।  ये लोग राम के नाम पर खाई पैदा कर रहे हैं।

अगर ऐसे ही नेता मानसिक दिवालियापन का शिकार होते रहे तो देश अजीब सी मुसीबत में फंस जाएगा। क्योंकि जब सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना और सरकार से सबूत की मांग की जा सकती है तो कल को कोई यह भी कह सकता है कि हम कैसे मानें कि आप सेक्युलर हैं सबूत दीजिए। इस परिस्थित से बचने के लिए नेताओं को धर्म, जाति के खांचे से राजनीति को बाहर निकालकर विकास के गलियारे में पहुंचाना होगा। जहां किसी से उसका धर्म, जाति, जयघोष नहीं उसका काम पूछा जाए।
जयश्रीराम के उद्घोष पर भड़के नेता क्या यह बताने का कष्ट करेंगे कि हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और इतिहास कहता है कि सेक्युलर भी पर क्या हमें अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए राम को भूलना होगा। अगर ऐसा है तो फिर धर्मनिरपेक्षता कहां बची। जय श्री राम। 

सर्जिकल स्ट्राइक: फर्ज निभाइए, गुणगान इतिहास करेगा

पीओके में हमारी फौज ने सर्जिकल स्ट्राइक क्या की बीजेपी के लिए जैसे देश की सभी समस्याएं दूर हो गईं।भारतीय जवानों ने बड़ी बहादुरी से अपने फर्ज को निभाया पर नेता ऐसे बातें करने लगे जैसे वे खुद कंधे पर बंदूक रखकर आतंकियों का सफाया करके आए हों। देश की सुरक्षा जवान करते हैं, दुश्मनों से लोहा भी वही लेते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक में सरकार की भूमिका सख्त फैसले लेने की दृढ़ इच्छाशक्ति के तौर पर सामने आई पर इसका श्रेय लेने की जो छटपटाहट पूरी सरकार में देखी गई वह बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने सेना की बहादुरी के रुतबे को भी घटाने का काम किया है जो बिना कहे पूरे देश में महसूस की जा रही थी। इसके बाद सियासी पार्टिंया अपने अपने तरीके से एक सर्जिकल स्ट्राइक की बार बार सर्जरी कर रही हैं। इससे जवानों के मनोबल पर भी असर पड़ता है। सवाल यह है कि देश की सुरक्षा को लेकर की गई किसी भी कार्रवाई का श्रेय लिया जाना क्या जायज है। क्या इस बात का गाल पीटना सही है कि देखो हमने कर दिखाया जबकि दूसरी सरकारें नहीं कर सकीं। उस पर केजरीवाल, राहुल गांधी, ओम पुरी, सलमान खान और दूसरे लोग ऐसा बोल गए जो पाकिस्तान में उन्हें भले ही हीरो बना दे पर देश में उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जो कल खतरा बनने वाले हैं, उन्हें उनकी जगह पर जाकर मारने की ऐसी कार्रवाई अमेरिका, इस्राइल समेत कई देश कई बार कर चुके हैं पर शायद ही अपने मुंह इतना गुणगान किए हों। सरकार और सेना की ओर से एक दिन बाद ही खुलेआम घोषणा करना अपने आप में एक चौंकाने वाला कदम था। पर इसके पीछे एक सटीक कूटनीति काम आई। सर्जिकल स्ट्राइक ऐसे समय की गई जब पठानकोट के बाद उड़ी हमले से दुनिया का ध्यान पाक प्रायोजित आतंकवाद पर केंद्रित हुआ था। यूएन में नवाज शरीफ हिजबुल कमांडर बुरहान वानी को शहीद बताकर बुरे फंसे। बची कसर सुषमा स्वराज ने पाक को बेनकाब कर निकाल दी। इस तरह से पाक अपनी ही जाल में फंस चुका था। ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला नहले पे दहला वाला कदम साबित हुआ। पाक को समझ में ही नहीं आया कि वह हां बोले या ना क्योंकि उसे पता था कि वह जो भी बोलेगा, फंसेगा। यह उस समय पैदा हुए पाक विरोधी माहौल का ही असर था कि दुनिया के किसी भी देश ने खुलकर सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध नहीं किया।

दिल्ली में ढाई साल पहले आई नई सरकार ने इस स्ट्राइक से पाक और आतंकियों को दो टूक संदेश दिया कि अब और आतंकवाद को सहन नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ कूटनीतिक तौर पर भी पाक भारत के चक्रव्यूह में घिर गया। आतंकवाद को आश्रय देने का उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया। आठ देशों के संगठन सार्क के सदस्य अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान ने तो खुलकर भारत का समर्थन किया। इतना ही नहीं, अमेरिका ने भी पाक को ही आतंक पर नकेल कसने की नसीहत दे डाली। रूस, सिंगापुर, यूरोपीय संघ समेत दुनिया के प्रमुख देशों ने भारत की कार्रवाई को जायज ठहराया। इससे पाक अलग-थलग पड़ गया।

उधर, भारत में सर्जिकल स्ट्राइक ट्रेंड करने लगा। चैनलों पर जंग छिड़ गई और अखबारों में पन्ने भरने लगे। सीमा पर गांव खाली हो गए, लोगों ने तंबुओं में शरण ली। पर सेना सीमा पर डटी रही। अच्छा होता कि डीजीएमओ की घोषणा के बाद स्वागत, जश्न सब कुछ होता पर श्रेय लेने की होड़ न मचती। वैसे भी कहावत में अपने मुंह अपनी बड़ाई से बचने की बात आती है। पर शायद सियासी लोग आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर समीकरण बैठाने में इतने मशगूल थे कि इसका ख्याल ही नहीं आया।

परदे पर शहीद जवान के पिता का किरदार बखूबी निभाने वाले ओम पुरी कह देते हैं कि सेना में किसी ने जबरी तो नहीं भेजा था। सलमान कहते हैं कि पाक कलाकार आतंकी नहीं होते जबकि ऐसी बात तो कही नहीं जा रही थी कि पाक कलाकार आतंकी होते हैं। सवाल सिर्फ इस बात का था कि जब लंदन, पेरिस में धमाके होने पर पाक कलाकार सोशल मीडिया पर आंसू बहाते हैं और हमले की निंदा करते हैं तो भला जिस देश में उनका गुजारा हो रहा है वहां दहशतगर्दी के खिलाफ वे क्यों कुछ नहीं बोलते। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें देश से बाहर भेजने की बात कही जा रही थी पर जब पाक कलाकारों ने चुप्पी साध ली तो जनभावना उनके खिलाफ हो गई, जिसका फायदा उठाकर हिंदूवादी संगठन मैदान में आ गए। कला संस्कृति शांतिकाल में दोनों देशों के लोगों को जोड़ने प्यार मोहब्बत बढ़ाने का एक जरिया हो सकता है पर उस देश के साथ नहीं जो भारत पर लगातार बुरी नजरें गड़ाए हुए हैं। उसका शांति का प्रेम महज एक छलावा है और वहां के नागरिक अपने देश से अलग कैसे हो सकते हैं।

कांग्रेस पार्टी कह रही है कि हमने पहले भी कई बार सर्जिकल स्ट्राइक की थी, पर श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। जो भी हो दुनिया में हमें पाक को अलग-थलग करने में कामयाबी मिलती दिख रही है पर देश में हम अजीब सा रायता फैलता देख रहे हैं। पाक को मुंहतोड़ जवाब देना है तो जंग से नहीं कूटनीति ही काम आएगी और इसके लिए देश को एकजुट होकर निस्वार्थ भाव से संगठित रहना होगा।

सियासतदानों को कम से कम जवान को राजनीति से दूर रखकर ही बात करनी चाहिए तभी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को दमदार तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। अन्यथा पर हम खुद ही अपना काम बिगाड़ लेंगे।सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने से बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है।

गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों को तो जैसे सरकारों और नेताओं ने मान ही लिया है कि इसे कभी भी सौ प्रतिशत पूरा नहीं किया जा सकता है तो फिर मुद्दे की तलाश में भटकते रहते हैं। भविष्य में भी ऐसे मौके आएंगे पर उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां देश और देश की सुरक्षा की बात हो वहां कोई पार्टी, नेता या सरकार अपना गुणगान करने से बचें। इसके लिए इतिहासकार हैं ना, जो उनकी भूमिका को जरूर महत्व देंगे।

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

पाक में भारत और भारत में पाक बिक रहा है


लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने बलूचिस्तान के लोगों की चर्चा क्या की पाकिस्तान बौखला गया। हो भी क्यों न, भारत ने पहली बार दुनिया के किसी देश में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर वहां की हुकूमत के खिलाफ खुलेआम अपनी बात रखी है। अब तक भारत ऐसे मामलों में तटस्थ रहा था। तो क्या मोदी सरकार ने पाक को लेकर नीति बदली है? क्या सरकार कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की हरकत का मुहंतोड़ जवाब देने के लिए बलूचिस्तान मसले को उछालना चाहती है? क्या वाकई 1971 की घटना दोहराई जाएगी? आखिर भारत सरकार के इस बदले रुख के निहितार्थ क्या है?

कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा था कि हम दुश्मन को तीन तरीके से काउंटर कर सकते हैं। पहला तरीका डिफेंसिव मोड का है। इसमें हम चारों तरफ सुरक्षा कड़ी करते हैं और जो भी दहशतगर्द आता है हम उसे वहीं ढेर कर देते हें। दूसरा मोड डिफेंसिव अफेंस का है यानी हम उस जड़ तक पहुंचते हैं जहां से समस्या पैदा हो रही है और हम उसका इलाज करते हैं। और तीसरा मोड ऑफेंसिव मोड का है जिसमें हम बाहर जाकर कार्रवाई करते हैं। परमाणु ताकत ऑफेंसिव मोड में एक बड़ी चुनौती है पर डिफेंसिव अफेंस में कतई नहीं। फिलहाल भारत डिफेंसिव मोड में पाक से निपट रहा है अगर हम डिफेंसिव अफेंस में आते हैं तो पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने के लिए हम आर्थिक, सामाजिक, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे अलग-थलग करने के अलावा उसके आतंकवाद प्रेम को उजागर करने के साथ ही आंतरिक अस्थिरता जैसे तमाम पहलुओं पर काम करेंगे। पाक की अफगान नीति को भी काउंटर करेंगे। वास्तव में मौजूदा डिफेंसिव मोड में भारत पर पाक की ओर से 100 साजिशें हो रही हैं और हम 90 नाकाम करने में सफल रहे हैं पर 10 फिर भी हमें नुकसान पहुंचा रही हैं। हम यह भी समझते हैं कि सभी पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है। पाकिस्तान को जब यह पता चलेगा कि भारत डिफेंसिव मोड छोड़कर डिफेंसिव अफेंस मोड में आ गया है तो वह बचने की कोशिश करेगा। पूरी दुनिया को पता है भारत की तुलना में पाकिस्तान में हमले करना या उसे निशाना बनाना कहीं ज्यादा आसान है। डोभाल ने सख्त लहजे में साफ कहा कि ऐसी स्थिति में अगर पाक एक मुंबई हमला करवाता है तो वह बलूचिस्तान से हाथ धो बैठेगा। इसमें कोई परमाणु ताकत शामिल नहीं होगी और न ही सैन्य शक्ति को इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ेगी। इस कार्यक्रम का वीडियो पाक मीडिया में अक्सर दिखाया जाता है। तो क्या बलूचिस्तान का समर्थन डोभाल मोड की देन है?

ऐसे में क्या यह समझा जाए कि भारत ने पाकिस्तान को लेकर डिफेंसिव अफेंस मोड अपना लिया है और अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। इधर, कश्मीर में भी सेना ने सख्त रुख बरकरार रखा है। पैलेट गन यानी छर्रे से घायल लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही हैं। कुछ लोग इसे बेहद शर्मनाक करार दे रहे हैं। उनका सवाल है कि कश्मीर में समस्या है तो उसका निपटारा करने के लिए अपने ही नागरिकों के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार क्यों। इससे तो आग और भड़केगी।

दरअसल हमें यह समझना होगा कि सैनिक जानबूझकर अपने ही देश के नागरिकों पर पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं कर रहे। वे यह समझते हैं कि सख्ती से अलगाववादियों का ही फायदा होगा। पर भड़काए गए युवाओं की पत्थरबाजी और ग्रेनेड हमलों के कारण मजबूरन उन्हें ऐसा करना पड़ता है। सीआरपीएफ ने भी कोर्ट में कहा है कि जानमाल का नुकसान न हो इसीलिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर इस पर रोक लगाई गई तो मुश्किल हालात में सैनिक गोली चलाने को मजबूर हो जाएंगे और ज्यादा लोगों की जान जाएगी। तो सवाल उठता है कि इस समस्या का समाधान क्या है। लोकतंत्र में बड़ी से बड़ी समस्या का राजनीतिक समाधान है। अगर कश्मीर से निकले आईएएस, इंजीनियर, प्रोफेसर, सिविल सोसाइटी के लोग, स्थानीय सरपंच और नेता घर-घर जाकर बात करें। जिन्होंने अपनों को खोया है उनके घाव पर मरहम रखें और यह समझाएं कि हिंसा समस्या का समाधान नहीं है। अगर ऐसा होता तो अपनी ही जमीन से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडितों ने हथियार उठा लिए होते पर उन्हें विश्वास है कि आज नहीं तो कल घाटी की हवा बदलेगी। जिस झड़प में 66 कश्मीरी मारे गए हैं उसमें सेना के पांच हजार से ज्यादा जवान घायल भी हुए हैं। कश्मीर को पाक दहशतगर्दों  के आतंक से बचाने के लिए हजारों जवानों  ने सर्वोच्च बलिदान दिया है।

सेना का काम ही शांति कायम रखना है और अगर इसमें कोई रुकावट पैदा करेगा तो उससे सख्ती से ही निपटा जाएगा। आम कश्मीरी को यह समझाना होगा कि अलगाववादी उनके हमदर्द नहीं हैं वे तो उस मौकापरस्त की तरह हैं जो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए दूसरे के घर में आग लगाकर खुद को बचाता है। इनके बच्चे विदेश में अच्छी तालीम हासिल करते हैं जबकि आम कश्मीरी युवा इनके बहकावे में मजहब और तहरीक के नाम पर हथियार उठा लेते हैं। पाकिस्तान की शह पर अलगाववादी लोगों को मरने-मारने के लिए उकसा रहे हैं। तहरीक के नाम पर देश में ही बैठकर ये चंद फिरकापरस्त लोग भारत विरोधी साजिश में जुटे हैं और यह काम कई वर्षों से चल रहा है पर सरकार और खुफिया एजेंसियों ने इस पर तत्परता नहीं दिखाई। आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि खुलेआम कश्मीरी युवा सड़कों पर उतरकर सेना के जवानों को चुनौती दे रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार भी सवालों के घेरे में है। यह ठीक है कि घाटी में केंद्र सरकार के निर्देश पर कार्रवाई हो रही है पर राज्य सरकार को अपने स्तर पर मामला शांत कराने की पहल तो करनी चाहिए। आखिर वे सीधे तौर पर वहां के लोगों से जुड़े हैं। सैन्य कार्रवाई तो आखिरी विकल्प होना चाहिए। केंद्र के मंत्री भी जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे रख पाकिस्तान के ही इर्द-गिर्द बात कर रहे हैं। पाक हमारे लिए चुनौती है वह कश्मीर को लेकर नई-नई चाल चल रहा है पर हम उसी को लेकर सिर्फ सियासत करेंगे तो देश को पीछे ही धकेलेंगे। पाकिस्तान में तो ऐसा ही हो रहा है, बेरोजगारी, भुखमरी, बिजली की कर्मी, पानी और स्वास्थ्य की समस्या से पीछा छुड़ाने के लिए पूरी हुकूमत कश्मीर की माला जप रही है और वहां के कट्टरपंथियों का खून उबाल मारने लगता है। मोदी सरकार एक तरफ तो दोस्ती के हाथ बढ़ा रही है तो दूसरी तरफ बयान बहादुर लोग एक पर 10 गोलियां मारने की बात करते हैं। जनता में भी गुस्सा बढ़ता है पर इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। पाकिस्तान पर भरोसा खुद को ठगने जैसा है और यह हम बंटवारे के बाद से ही देखते आए हैं। ऐसे में भारत सरकार को पाक को लेकर एक सख्त नीति कायम रखनी होगी।

भारत के समर्थन से बलूचों को फायदा यह होगा कि इस मसले की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देने लगेगी। बाकी 1971 की घटना को दोहराना आसान नहीं है। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है और वहां कट्टरपंथियों, आईएसआई और आतंकियों की चलती है तो उससे संयम की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बेहतर यह होगा कि मोदी सरकार कश्मीर में राजनीतिक समाधान की ओर बढ़े और बलूचों के लिए कूटनीतिक तरीके से ही समर्थन जारी रखे। हमारा पूरा फोकस कश्मीर में जवानों और नागरिकों की मौत का सिलसिला रोकने पर होना चाहिए। हमें कश्मीर का समाधान बलूचिस्तान में नहीं ढूंढना चाहिए वरना पाकिस्तान को भी कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का मौका मिल जाएगा। 

कभी कभी तो लगता है कि दोनों अोर सियासत चल रही है। पाकिस्तान में भारत और भारत में पाक बिक रहा है। खरीदने वाली जनता है जो हकीकत से काेसों दूर बस उकसावे पर फैसले कर लेती है।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

धर्मांधता की छांव में पांव पसार रहा कट्टरपंथ


धर्म हमें इंसानियत का पाठ पढ़ाता है पर खुद को मुसलमान कहने वाले कुछ भटके हुए लोग इस्लाम के नाम पर लोगों का खून बहा रहे हैं। हाल में इनकी क्रूरता ‌का शिकार बांग्लादेश हुआ है। यहां एक कैफे में घुसकर हमलावरों ने कुरान की आयतें न पढ़ पाने वाले गैर मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा। वैसे तो यहां पहले से ही कुछ कट्टरपंथी संगठन और पार्टियां सक्रिय हैं पर शेख हसीना की सरकार में इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में थोड़ी कामयाबी मिली। मुक्ति संग्राम में पाकिस्तान का साथ देने वालों को फांसी पर लटकाए जाने से भड़के कट्टरपंथियों ने
अब आतंकवाद को आयातित करना शुरू कर दिया है। आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट भी दक्षिण एशिया में पांव पसारने की कोशिश में है, ऐसे में गरीब और धर्म के नाम पर उकसाए गए कुछ बांग्लादेशी युवा उनके बहकावे में आ रहे हैं। देश का पहला बड़ा आतंकी हमला इसी का परिणाम है। हसीना सरकार की बड़ी नाकामी यह है कि महीनों से हिंदुओं समेत अन्य अल्पसंख्यकों की हत्याएं हो रही हैं पर उन्होंने शायद राजनीतिक हित साधने के लिए आंखें मूद रखी थीं। जब बड़ा हमला हुआ तो उनको देश के हमलावरों को धिक्कारते हुए कहना पड़ा कि आप कैसे मुसलमान हैं।

वैसे, हसीना की पार्टी धर्मनिरपेक्ष है इसीलिए 1953 में ही बांग्लादेशी आवामी लीग ने अपने नाम से मुस्लिम शब्द हटा दिया था पर आज इससे अल्पसंख्यकों की रक्षा होने वाली नहीं है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय कट्टरपंथियों के निशाने पर है। युवाओं के तेजी से कट्टरपंथ और हिंसा की राह पकड़ने की मूल वजह को हमें समझना होगा। दरअसल, युवाओं में भड़काई गई धर्मांधता उन्हें दूसरे धर्म के लोगों को दुश्मन मानने को मजबूर कर देती है। इस आग में घी डालने का काम करते हैं धार्मिक उपदेशकों के अस्पष्ट और एकतरफा भड़काऊ विचार। वैसे, रिलीजियस प्रीचर हर धर्म के होते हैं, जिनका काम धर्म की अच्छाइयों का प्रचार प्रसार करना होता है। पर ढाका हमले में आतंकियों के विवादास्पद भारतीय मुस्लिम धर्म प्रचारक डॉ. जाकिर नाइक से प्रेरित होने की खबरें सामने आने के बाद इस पर बहस होनी चाहिए कि ऐसे लोगों की समाज में भूमिका क्या है और क्या होनी चाहिए। नाइक कई सालों से देश-विदेश में बड़ी-बड़ी सभाओं में मुस्लिम धर्म का गुणगान कर रहे हैं। इसमें किसी को भी समस्या नहीं होनी चाहिए पर इन सभाओं में उनके तीखे बोल युवाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं इस पर बहस की जा सकती है।

एक सभा में गैर मुस्लिम युवक ने मुस्लिम और आतंकवाद पर सवाल पूछा। आतंकवाद को सिरे से खारिज करने की बजाए नाइक बतलाने लगे कि मेरी नजर में सबसे बड़े आतंकी अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। इराक, अफगानिस्तान समेत दुनिया के तमाम मुल्कों में फैली हिंसा को वे महाभारत की लड़ाई से जोड़ते हैं। कहते हैं हिंदू मजहब में आपस में ही हिंसा होती आई है। कुरान से ज्यादा लड़ाई-झगड़ों का जिक्र महाभारत में है। वह उदाहरण देते हैं कि गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि लड़ोगे तो स्वर्ग में जाओगे। इसका मतलब अप्रत्यक्ष तौर पर वे मौजूदा आतंकवाद को गलत नहीं मानते। वह जिहाद की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि अपने हक की लड़ाई लड़ना जिहाद है और वह फलस्तीन समेत कई जगहों पर लड़ रहे मुसलमानों को असली जिहादी साबित कर देते हैं। इस पर सभा में मौजूद हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ तालियां बजाकर समर्थन जाहिर करती है। जबकि महाभारत की लड़ाई अधर्म और अन्याय के खिलाफ थी, ढाका में बेगुनाह लोगों ने कौन सा अन्याय किया था जिन्हें मारा गया। क्या गैर मजहब का होना अधर्म है। शायद कुछ ऐसी ही भड़काऊ एवं बिना सिर पैर की बातें युवाओं को गलत रास्ते पर ले जाती हैं। क्या वे सीधे यह नहीं बता सकते थे कि किसी भी बेगुनाह को मारना इस्लाम के खिलाफ है जैसा कि हजारों मौलवी अपने फतवे में कह चुके हैं। क्या इस तरह की तकरीर से बड़ी तादाद में उनके अनुयायी हथियार उठाना अपनी कौम के लिए नेक काम नहीं मानेंगे। बिल्कुल यह संभव है और बांग्लादेशी आतंकियों के नाइक से प्रेरित होने की खबरों से यह साबित भी हो जाता है। यू-ट्यूब पर उनके वीडियो हजारों, लाखों बार देखे जा रहे हैं।
कई हिंदुओं ने अपना तर्क देकर उनका विरोध भी किया है। नाइक इस्लाम को सर्वश्रेष्‍ठ बताने, नुकीले दांत धरती पर मौजूद ज्यादातर जानवरों का मांस खाने के लिए हैं जैसे विवादित मुद्दों पर अपनी दलील देते देखे और सुने जाते हैं। वह विरोधी सवालों को तुरंत हिंदू धर्म में से उदाहरण उठाकर उसे गलत साबित कर देते हैं। नफरत फैलाने वाली तकरीर के कारण ही नाइक पर यूके, कनाडा और मलयेशिया में प्रतिबंध है। अपने पीस टीवी चैनल के जरिए वह बांग्लादेश में काफी मशहूर हैं। यह चैनल भारत में प्रतिबंधित है।

भारतीय खुफिया एजेंसियों के सतर्क रहने और भारतीय मुसलमानों के आईएस के बहकावे में न आने से आतंकी संगठन का प्रवेश मुश्किल है, इसलिए उन्होंने बांग्लादेश को चुना है। ये संगठन कथित जिहाद में मरने पर युवाओं को जन्नत मिलने का खोखला दावा करता है। ऐसे गलत प्रोपगंडा को फैलने से रोकने के लिए समाज के पढ़े-लिखे, जानकार, संत और मौलवियों की भ‌ूमिका अहम है।
दरअसल यह सब हो रहा है क्योंकि सच्ची राह दिखाने वालों की कमी है। नाइक जैसे जानकार लोगों द्वारा युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि जीवन उन्हें मरने के लिए नहीं, जिंदा रहकर समाज के लिए कुछ करने को मिला है, जिससे आने वाली पीढ़ी उन्हें याद करे। धर्म कोई भी हो किसी बेगुनाह को मारना सबमें पाप है।