बंटवारे के गुस्से ने तब देश के हिंदुओं और मुसलमानों में एक दूसरे के लिए नफरत भर दी थी। कुछ साल पहले तक देश के लिए मर मिटने वाले भारतीय अब हिंदू और मुसलमान दो खेमों में बंट चुके थे। आगे क्या हुआ, यह इतिहास है। जिन मुसलमानों को जिन्ना के टू नेशन थ्योरी पर यकीन नहीं था, उन्होंने कभी भी पाकिस्तान जाने की नहीं सोची। बाद में सियासी समीकरण इस तरह सेट किए गए कि कांग्रेस खुद को मुसलमानों की एकमात्र मसीहा पार्टी के तौर पर पेश करने में कामयाब रही। जनसंघ और फिर 90 के दशक में राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भी अपना परचम लहराया। कांग्रेस जहां भाजपा को मुस्लिम विरोधी साबित कर मुसलमानों का वोट बटोरने में कामयाब होती रही तो क्षेत्रीय पार्टियों ने भी जातिवादी और स्थानीय मुद्दों को हवा देकर सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान मुसलमानों की अगुआ बनी कांग्रेस ने समुदाय को कभी खुद अपने बारे में सोचने का मौका नहीं दिया। दंगे होते रहे पर सवालों के घेरे में हमेशा भाजपा को रखा गया। धर्मनिरपेक्ष, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और फिर असहिष्णुता जैसे शब्दों के सियासी इस्तेमाल ने केवल नेताओं को जबरदस्त फायदा पहुंचाया। लेकिन मोदी के सत्ता पर काबिज होने के बाद काफी कुछ बदला है, जो शायद अब मुसलमानों को भी समझना होगा।पहले 2014 का लोकसभा चुनाव और हाल में यूपी समेत पांच राज्यों में भाजपा की शानदार विजय। इसमें वैसे तो क्षेत्रीय पार्टियों समेत देशभर के नेताओं के लिए संदेश छिपा है पर सबसे ज्यादा अगर किसी समुदाय को सोचने पर मजबूर होना पड़ा है तो वह है देश का मुसलमान।
बाबरी मस्जिद की बात कर पार्टियों ने मुसलमानों को खुद फैसला लेने नहीं दिया और फिर गुजरात दंगों की याद दिलाकर पिछले डेढ़ दशक से उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। दंगों में दोनों समुदायों के लोग मारे गए, कोर्ट ने फैसला भी सुनाया पर मुसलमानों का हितैषी बनने के लिए नेता उस पर ही सवाल उठाते रहे।
दूसरी तरफ एक बड़ी बात जो गौर करने की है वो है यूपी में भाजपा द्वारा एक भी मुसलमान को उम्मीदवार न बनाना। भाजपा कह रही है कि टिकट देने में जिताऊ फैक्टर को ही केवल आधार बनाया गया। हिंदू-मुस्लिम के आधार पर लोगों को बांटकर टिकट नहीं दिए गए। हो सकता है यह सच हो पर मुसलमानों के लिए यह सोचने का वक्त है। अपने देश में 80 फीसदी हिंदू और करीब 14 फीसदी मुसलमान हैं और अगर एक पार्टी केवल हिंदुओं के बल पर चुनाव जीतकर सत्ता में आ जा रही है तो उनके प्रतिनिधित्व का क्या होगा। अल्पसंख्यकों के अपने मुद्दे हैं, सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को बस चुनाव के समय उछाला जाता है पर क्या उसके आधार पर काम करने के प्रयास नहीं होने चाहिए। अगर भाजपा सबका साथ सबका विकास के फलसफे पर काम करना चाहती है तो उसे वोट देने पर फैसला मुसलमान खुद क्यों न लेता। क्या मुसलमान नहीं चाहते कि हर पार्टी में उनके प्रतिनिधि हों। वे पार्टियों की राजनीतिक गोटी बनने के बजाए खुद मैदान में क्यों न उतरे। जो पार्टी उनके हितों की बात करे उसे वे क्यों न वोट दें। पर अब तक होता यह आ रहा है कि जो पार्टी भाजपा को हराने में दमदार दिखती है, उसे ही मुसलमानों का वोट दिलवाने की कोशिश की जाती है इसमें उनके मौलाना व उलमा का भी बड़ा रोल रहता है। उनके ही कौम के नेता पुराना खौफ याद दिलाकर पूरी की पूरी जमात को भाजपा के विरोध में खड़ा कर देते हैं। इस बार यूपी में मुसलमानों की वोट वैसे भी खराब गई। भाजपा ने दलित-पिछड़ा समीकरण बिठाया, मुसलमान सपा के साथ चले गए और बसपा पीछे रह गई और जीत भाजपा की हो गई। क्या मुसलमान बस नेताओं को हराने जिताने की एक कड़ी भर हैं। उनके विकास का कोई मतलब नहीं।
मुसलमान खुद यह फैसला क्यों नहीं करते कि वे तुष्टीकरण में बंधे नहीं रहेंगे। भाजपा ने कभी ऐसा नहीं कहा कि वह हिंदुओं की पार्टी है, हां विपक्ष ने जरूर ऐसा प्रचारित किया। जब देश के मुसलमानों को टोपी पहनने, दाढ़ी बढ़ाने या फिर नमाज पढ़ने को धार्मिकता से जोड़कर देखा जाता है तो फिर जय श्री राम का उद्घोष, माथे पर तिलक या कीर्तन करना सांप्रदायिक कैसे हो गया। क्या मुसलमानों को यह बात समझ में नहीं आती है कि आपका वोट पाने के लिए कुछ मिनट के लिए नेता टोपी पहनकर पाखंड करते हैं। ये आपका विकास कभी नहीं करेंगे क्योंकि उनकी नीयत में खोट है। इससे अच्छा वो है जो तुष्टीकरण नहीं करता, हिंदू है तो माथे पर तिलक लगाकर आपसे मिलने आता है और आपके विकास की बात करता है। बाकी यह भी समझना होगा कि अच्छे या खराब, कट्टरपंथी या उदारवादी, आधुनिक सोच रखने वाले या दकियानूसी सोच में गिरफ्तार लोग हर देश में हर पार्टी, हर समाज में होते हैं और हमें सबके साथ सामंजस्य बिठाकर चलना होता है। इसमें डरने या डराने जैसी कौन सी बात है।
अपने देश में तो सबसे बड़ी ताकत हमारा संविधान है जिसने सभी को अपने धर्म का पालन करने और समानता के अधिकार से परिपूर्ण किया है। तो फिर ये अलगाव किसने क्या। यूपी में बिना मुसलमानों के सहयोग और उनके प्रतिनिधित्व के भाजपा का विजयरथ पर सवार होना मुसलमानों के लिए बड़ा संकेत है अब सोचना उन्हें है कि वे वोट बनकर रहना चाहते हैं या विकास की दौड़ में खुद भागीदार बनना चाहते हैं। अपने देश की विविधता का अद्भुत उदाहरण इस बार यूपी में देखने को मिलेगा जब हज यात्रा का कामकाज और अल्पसंख्यक विकास मंत्रालय का जिम्मा किसी हिंदू के पास होगा। यही तो हमारे देश की खूबी है। जय हिंद