रविवार, 3 जनवरी 2016

नवाज से ये कैसी दोस्ती

पहले अचानक थाईलैंड में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं। कुछ ही दिन बात सुषमा स्वराज पाकिस्तान जाती हैं और फिर काबुल में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर कर मोदी पूरी दुनिया को अचंभित कर देते हैं। विपक्ष में रहते पाकिस्तान से लव लेटर का आरोप लगाकर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते ही क्या हो गया है, जनता जानना चाहती है? रूस से अफगानिस्तान और वहां से दो घंटे के लिए मोदी के विमान का पाकिस्तान की सरजमी पर उतरने की असामान्य घटना हर भारतीयों के लिए चौंकाने वाली बात है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस समय पीठ में छुरा घोंपने जैसी घटना की आशंका भी जताई गई थी, जो सच निकली। कुछ ही दिन बाद पठानकोट में पाकिस्तानी दहशतगर्द एयरबेस पर हमला कर देते हैं। आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हो पाते पर हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं। 44 घंटे बाद अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास को भी निशाना बनाने की नाकाम कोशिश होती है। इस दौरान पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटता है। विरोधी पार्टियां मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे पर सवाल उठाती हैं। कुछ तो इसे यात्रा के बदले में उपहार बताकर आलोचना करती हैं। पर इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का रुख पाकिस्तान को लेकर सरकार के बदले नजरिए की ओर स्पष्‍ट संकेत दे रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और नवाज के बीच बढ़ी अचंभित कर देने वाली नजदीकी के निहितार्थ क्या हैं?
बड़ा सवाल यह है कि पठानकोट में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने एयरबेस पर हमले का दुस्साहस किया लेकिन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे तौर पर आलोचना से दूरी क्यों बनाई? उन्होंने मानवता के दुश्मनों की बात कह जवानों के जज्बे को सलाम किया। क्या मोदी और नवाज के बीच किसी दूसरी रणनीति पर चलने की रजामंदी हुई है? क्या दोनों नेता अब समझ चुके हैं कि ऐसे हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चा‌ह‌िए? लेकिन इस डील में ताे नुकसान हमारा है। उन जवानों के परिवारों को प्रधानमंत्री क्या सांत्वना देंगे जिनके आंसू थम नहीं रहे।
7 घरों के चिराग बुझ गए, देशवासी गुस्‍से में हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने फौरन अपने कथित दोस्त नवाज शरीफ को फोन कर विरोध जताना भी जरूरी नहीं समझा जबकि नातिन की शादी में नवाज के न्योते को पीएम ने बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लिया था। इसे भारत की विदेश नीति का बड़ा दिन भी बताया गया था क्योंकि इससे पहले तीन भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए थे। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों ने मोदी के इस रुख को वार्ता के लिहाज से अहम कदम करार दिया था। इसके बाद पठानकोट में हमला हो जाता है तो क्या इसे पाकिस्तान की वास्तविक सरकार यानी सेना और आईएसआई की बौखलाहट समझा जाए, जो नहीं चाहती कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व पर हावी रहने के लिए पाक फौज का भारत की ओर से खतरे का हौवा खड़ा करना जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी तय तारीख पर किसी भारतीय पीएम का पाक दौरे का कार्यक्रम बनता है सीमा पर गोले बरसते हैं और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मोदी का अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन का तोहफा देने लाहौर जाना सियासत की पिच पर मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। इससे न सिर्फ भारत की शांतिपूर्ण भावना दुनिया में एकबार फिर उभर कर सामने आई बल्कि इसने पाकिस्तान की सियासत में भी अचानक गर्माहट ला दी। पाकिस्तान में भी मोदी के चाहने वाले बढ़े। माना जा रहा है कि मोदी नवाज शरीफ को राजनीतिक तौर पर सशक्त देखना चाहते हैं। पाक फौज और आईएसआई के सामने नवाज के कद को बढ़ाने के लिए ही उन्होंने दुनिया के सामने कई बार पाक समकक्ष को काफी तवज्जो दी है। तो क्या जवानाें की जान की कीमत पर यह बदली हुई मोदी नीति है? पाकिस्तान में सियासतदानों का कद सेना से हमेशा छोटा ही रहा है। ऐसे में जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठता है उसे पहले सेना और फिर वहां के कट्टरपंथियों के आगे
झुकना पड़ता है। वह चाहकर भी भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में सोच नहीं पाता। बंटवारे के बाद से घटनाएं ही कुछ ऐसी हुईं कि सेना ने खुद को सियासी जमात से ऊपर कर लिया जिसे आजतक कोई भी वजीर-ए-आजम टस से मस नहीं कर सका।  नवाज शरीफ का एयरपोर्ट पर खड़े रहकर मोदी के आने का बेसब्री से इंतजार कर अगवानी करने का आखिर माजरा क्या है, यह सवाल भारत में न सही पाकिस्तान में दबी जुबान जरूर उठ रहा है।
हालांकि भारतीय नेतृत्व के ऐसे कदमों से जवानों का मनोबल जरूर कमजोर हुआ होगा। सीमा पर पाकिस्तान की गोलीबारी और घुसपैठ का जवाब देने के लिए डटे जवान अपनी जान न्योछावर करने में जरा भी नहीं हिचकते जबकि सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने को उत्सुक दिखाई दे रही है। तो क्या अब आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ चलने में कोई हर्ज नहीं है? जवानों की मौत पर सबसे गहरा दुख तो पत्नी, बच्चों और परिवार को होता है। देश उनके दुख में साथ जरूर खड़ा होता है पर राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी नई रणनीति में जवानों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा देश इस्राइल है जहां दो जवानों की मौत पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले शुरू हो जाते हैं। पूरी सरकार आक्रामक हो जाती है, ऐसे में जवानों को भी अपनी जान कीमती होने का अहसास होता होगा। पर शायद अपने देश में आम आदमी की छोड़िए, जवानों की भी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा।