प्रधानमंत्री मोदी को लेकर नया विवाद दशहरे के दिन लखनऊ में रामलीला के मंच से जयश्रीराम के उद्घोष से जुड़ा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल कह रहे हैं कि इससे साबित हो गया है कि मोदी और भाजपा सांप्रदायिक हैं। मोदी कभी टोपी क्यों नहीं पहनते। देश के प्रधानमंत्री को ऐसा बरताव करना चाहिए जिससे अल्पसंख्यकों को उनसे जुड़ाव महसूस हो। विपक्ष का तर्क है कि मोदी का राम का नाम लेना दरअसल यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर खेला गया ध्रुवीकरण का दांव है। पर सवाल यह उठता है कि क्या दशहरे पर रावण के संहारकर्ता प्रभु राम के दर्शन को उमड़े भक्तों के समक्ष पीएम को अल्ला हू अकबर कहना चाहिए तो विपक्ष को लगता कि देखो पीएम सेक्युलर व्यक्ति हैं। ये दलील जितनी खोखली लगती है उससे ज्यादा हास्यास्पद भी है। सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें सपा के एक बड़े नेता यानी चाचाजी भगवान राम से अपना माल्यार्पण करवा रहे हैं तो क्या मोदी को भी ऐसा ही कुछ करवाना चाहिए था तो विपक्ष समझता कि मोदी सेक्युलर हैं। वैसे मोदी कुछ भी कहते, लखनऊ नहीं शिमला या मेघालय भी चले जाते फिर भी विपक्ष ऐसे ही दगे कारतूसों जैसे मुद्दों की ओर लपकता, क्या यही विपक्ष की भूमिका बची है। सनातन धर्म के अनुसार मर्यादा पुरुषोत्तम राम विष्णु के अवतार हैं। वे कण कण में हैं, जन जन में हैं। उनका स्मरण मन को शांति और व्यक्ति को धर्म और सच्चाई की ओर ले जाता है और जब मौका विजयादशमी का हो तो राम नाम की महिमा और भी बढ़ जाती है तो फिर इतना हंगामा क्यों। क्या कांग्रेस, सपा समेत विपक्ष मोदी के एक उद्घोष से सहम गया है। लोग उन्हें कट्टर हिंदूवादी बता रहे हैं। संविधान में देश के हर एक शख्स को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है तो क्या पीएम को सेक्युलर दिखने के लिए राम नाम भूल जाना चाहिए। अगर सेक्युलर की कोई नई परिभाषा बनाई गई हो तो फिर संसद मैं बैठने वाले नेताओं, सरकारी अधिकारियों और हर उस व्यक्ति का जो जनता से जुड़ा हो, ड्रेस कोड होना चाहिए। चाहे सबको काला कपड़ा पहना दो, सफेद, धानी, हरा, पीला कोई भी जिस रंग को विपक्ष सेक्युलर मानता हो क्योंकि भगवा और खाकी तो शामिल नहीं करना चाहेंगे। सख्त गाइडलाइन जारी की जाए कि कोई हिंदू माथे पर तिलक लगाकर या पीला कपड़ा लपेटकर नहीं आएगा। कोई मुस्लिम दाढ़ी बढ़ाकर या टोपी पहनकर नहीं आएगा। इसी तरह सिख और ईसाइयों के लिए भी निर्देश का पालन करना अनिवार्य हो क्योंकि नेताओं को जनता के सामने सेक्युलर दिखना है। अगर ऐसा होता है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए कम से कम धर्म के नाम पर बाजीगरी तो बंद होगी और धर्म के ठेकेदार भी कुछ कम हो जाएंगे।
दरअसल विवाद की मूल में नेताओं का जनता के समक्ष किया जाने वाला पाखंड है। कोई खुद को समाजवादी, कांग्रेसी या कोई और नैतिकता व धर्मनिरपेक्षता को आदर्श मानने वाली पार्टी का बताके कुछ मिनट के लिए सिर पर टोपी रख ले तो उसे महान सेक्युलर होने की उपाधि दे दी जाती है। जबकि वास्तव में यह वोट पाने के लिए नेताओं द्वारा किया जाने वाला ढोंग होता है। और ये एक बार कोई एक नेता नहीं हर साल हर त्योहार पर होता है पर लोग उन्हें अपना तारणहार समझने की भूल कर बैठते हैं। इसी तरह जनता उनसे काम का हिसाब मांगने नहीं जुटती अगर ऐसा होने लगे तो जनता ढकोसला बंद करके काम करने लगेंगे। ये तो वही बात हुई जैसे कांग्रेस के एक बड़े नेता दिल्ली से जाकर यूपी में दलित के घर रोटी खाते हैं और तस्वीर दूसरे दिन अखबारों के पहले पन्ने पर होती है बाद में पता चलता है कि बर्तन तो कोई और लेकर आया था, खाना भी शायद कहीं और पका था बस घर दलित का था। सच्चाई क्या है राम जाने या वो जाने जिसे विपक्ष कहे।
इसी तरह समाजवादी पार्टी के बड़े नेता गरीबों के साथ टाट पर बैठकर भोजन करते दिखते हैं। गुणगान ऐसे किया गया जैसे वे गरीबों से बहुत ही गहराई से जुड़े हैं जबकि तस्वीरें देखिए जो प्रकाशित हुईं, टाट पर बैठे साहब और दाहिनी तरफ बच्चे को गोद में ली भोजन करती गरीब महिला के बीच छुआछूत को दर्शाने वाली दूरी आसानी से समझ में आती है। गंभीर सवाल यह है कि क्या जनता इस तरह के पाखंड से छली नहीं जा रही। क्या सच्चाई जनता के सामने नहीं होनी चाहिए। सेक्युलर दिखाने के लिए ढोंग क्यों।
कोई कह रहा है कि लखनऊ ही क्यों। इस सवाल का जवाब या तो यूपी चुनाव हो सकता है या फिर बीजेपी के लोग जानें पर ऐसा नहीं लगता कि सरकार भी चाहती है विपक्ष ऐसी ही बेसिर पैर की बातों को उछाले और चैनलों, अखबारों में इसी पर बहस होती रहे। इससे तो सत्ता पक्ष का ही फायदा हो रहा है। दो साल बताने में गुजर गए कि हम करने जा रहे हैं अभी तो आएं है समय तो दीजिए। आखिरी के दो साल ये बताएंगे कि शुरूआत कर दी है असर देखने के लिए अगली बार फिर जिताइए। क्या गजब का समीकरण है सत्ता और विपक्ष का।
वास्तविकता यह है कि देश में बहुसंख्यक हिंदू करीब 80 फीसदी हैं और जम्मू से लेकर केरल तक राम का नाम रखने वाले लोग आपको मिल जाएंगे। संसद में ही दो दर्जन से ज्यादा सांसदों के नाम राम पर हैं। वो चाहे राम विलास पासवान हो या सीताराम येचुरी। सुबह हमारी राम राम से होती है। ये नेता नहीं समझेंगे कि हमारे गांव में कोई मुसलमान सुबह जब हिंदू से मिलता है तो राम राम कहता है और हिंदू जब बुजुर्ग मियांदीन से मिलता है तो सलाम चच्चा कहता है। ये लोग राम के नाम पर खाई पैदा कर रहे हैं।
अगर ऐसे ही नेता मानसिक दिवालियापन का शिकार होते रहे तो देश अजीब सी मुसीबत में फंस जाएगा। क्योंकि जब सर्जिकल स्ट्राइक पर सेना और सरकार से सबूत की मांग की जा सकती है तो कल को कोई यह भी कह सकता है कि हम कैसे मानें कि आप सेक्युलर हैं सबूत दीजिए। इस परिस्थित से बचने के लिए नेताओं को धर्म, जाति के खांचे से राजनीति को बाहर निकालकर विकास के गलियारे में पहुंचाना होगा। जहां किसी से उसका धर्म, जाति, जयघोष नहीं उसका काम पूछा जाए।
जयश्रीराम के उद्घोष पर भड़के नेता क्या यह बताने का कष्ट करेंगे कि हिंदू आबादी बहुसंख्यक है और इतिहास कहता है कि सेक्युलर भी पर क्या हमें अपनी धर्मनिरपेक्षता को साबित करने के लिए राम को भूलना होगा। अगर ऐसा है तो फिर धर्मनिरपेक्षता कहां बची। जय श्री राम।
