गुरुवार, 25 अगस्त 2016

पाक में भारत और भारत में पाक बिक रहा है


लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी ने बलूचिस्तान के लोगों की चर्चा क्या की पाकिस्तान बौखला गया। हो भी क्यों न, भारत ने पहली बार दुनिया के किसी देश में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर वहां की हुकूमत के खिलाफ खुलेआम अपनी बात रखी है। अब तक भारत ऐसे मामलों में तटस्थ रहा था। तो क्या मोदी सरकार ने पाक को लेकर नीति बदली है? क्या सरकार कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की हरकत का मुहंतोड़ जवाब देने के लिए बलूचिस्तान मसले को उछालना चाहती है? क्या वाकई 1971 की घटना दोहराई जाएगी? आखिर भारत सरकार के इस बदले रुख के निहितार्थ क्या है?

कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कहा था कि हम दुश्मन को तीन तरीके से काउंटर कर सकते हैं। पहला तरीका डिफेंसिव मोड का है। इसमें हम चारों तरफ सुरक्षा कड़ी करते हैं और जो भी दहशतगर्द आता है हम उसे वहीं ढेर कर देते हें। दूसरा मोड डिफेंसिव अफेंस का है यानी हम उस जड़ तक पहुंचते हैं जहां से समस्या पैदा हो रही है और हम उसका इलाज करते हैं। और तीसरा मोड ऑफेंसिव मोड का है जिसमें हम बाहर जाकर कार्रवाई करते हैं। परमाणु ताकत ऑफेंसिव मोड में एक बड़ी चुनौती है पर डिफेंसिव अफेंस में कतई नहीं। फिलहाल भारत डिफेंसिव मोड में पाक से निपट रहा है अगर हम डिफेंसिव अफेंस में आते हैं तो पाकिस्तान को नुकसान पहुंचाने के लिए हम आर्थिक, सामाजिक, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे अलग-थलग करने के अलावा उसके आतंकवाद प्रेम को उजागर करने के साथ ही आंतरिक अस्थिरता जैसे तमाम पहलुओं पर काम करेंगे। पाक की अफगान नीति को भी काउंटर करेंगे। वास्तव में मौजूदा डिफेंसिव मोड में भारत पर पाक की ओर से 100 साजिशें हो रही हैं और हम 90 नाकाम करने में सफल रहे हैं पर 10 फिर भी हमें नुकसान पहुंचा रही हैं। हम यह भी समझते हैं कि सभी पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं है। पाकिस्तान को जब यह पता चलेगा कि भारत डिफेंसिव मोड छोड़कर डिफेंसिव अफेंस मोड में आ गया है तो वह बचने की कोशिश करेगा। पूरी दुनिया को पता है भारत की तुलना में पाकिस्तान में हमले करना या उसे निशाना बनाना कहीं ज्यादा आसान है। डोभाल ने सख्त लहजे में साफ कहा कि ऐसी स्थिति में अगर पाक एक मुंबई हमला करवाता है तो वह बलूचिस्तान से हाथ धो बैठेगा। इसमें कोई परमाणु ताकत शामिल नहीं होगी और न ही सैन्य शक्ति को इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ेगी। इस कार्यक्रम का वीडियो पाक मीडिया में अक्सर दिखाया जाता है। तो क्या बलूचिस्तान का समर्थन डोभाल मोड की देन है?

ऐसे में क्या यह समझा जाए कि भारत ने पाकिस्तान को लेकर डिफेंसिव अफेंस मोड अपना लिया है और अब पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। इधर, कश्मीर में भी सेना ने सख्त रुख बरकरार रखा है। पैलेट गन यानी छर्रे से घायल लोगों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही हैं। कुछ लोग इसे बेहद शर्मनाक करार दे रहे हैं। उनका सवाल है कि कश्मीर में समस्या है तो उसका निपटारा करने के लिए अपने ही नागरिकों के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार क्यों। इससे तो आग और भड़केगी।

दरअसल हमें यह समझना होगा कि सैनिक जानबूझकर अपने ही देश के नागरिकों पर पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं कर रहे। वे यह समझते हैं कि सख्ती से अलगाववादियों का ही फायदा होगा। पर भड़काए गए युवाओं की पत्थरबाजी और ग्रेनेड हमलों के कारण मजबूरन उन्हें ऐसा करना पड़ता है। सीआरपीएफ ने भी कोर्ट में कहा है कि जानमाल का नुकसान न हो इसीलिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा रहा है, अगर इस पर रोक लगाई गई तो मुश्किल हालात में सैनिक गोली चलाने को मजबूर हो जाएंगे और ज्यादा लोगों की जान जाएगी। तो सवाल उठता है कि इस समस्या का समाधान क्या है। लोकतंत्र में बड़ी से बड़ी समस्या का राजनीतिक समाधान है। अगर कश्मीर से निकले आईएएस, इंजीनियर, प्रोफेसर, सिविल सोसाइटी के लोग, स्थानीय सरपंच और नेता घर-घर जाकर बात करें। जिन्होंने अपनों को खोया है उनके घाव पर मरहम रखें और यह समझाएं कि हिंसा समस्या का समाधान नहीं है। अगर ऐसा होता तो अपनी ही जमीन से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडितों ने हथियार उठा लिए होते पर उन्हें विश्वास है कि आज नहीं तो कल घाटी की हवा बदलेगी। जिस झड़प में 66 कश्मीरी मारे गए हैं उसमें सेना के पांच हजार से ज्यादा जवान घायल भी हुए हैं। कश्मीर को पाक दहशतगर्दों  के आतंक से बचाने के लिए हजारों जवानों  ने सर्वोच्च बलिदान दिया है।

सेना का काम ही शांति कायम रखना है और अगर इसमें कोई रुकावट पैदा करेगा तो उससे सख्ती से ही निपटा जाएगा। आम कश्मीरी को यह समझाना होगा कि अलगाववादी उनके हमदर्द नहीं हैं वे तो उस मौकापरस्त की तरह हैं जो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए दूसरे के घर में आग लगाकर खुद को बचाता है। इनके बच्चे विदेश में अच्छी तालीम हासिल करते हैं जबकि आम कश्मीरी युवा इनके बहकावे में मजहब और तहरीक के नाम पर हथियार उठा लेते हैं। पाकिस्तान की शह पर अलगाववादी लोगों को मरने-मारने के लिए उकसा रहे हैं। तहरीक के नाम पर देश में ही बैठकर ये चंद फिरकापरस्त लोग भारत विरोधी साजिश में जुटे हैं और यह काम कई वर्षों से चल रहा है पर सरकार और खुफिया एजेंसियों ने इस पर तत्परता नहीं दिखाई। आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि खुलेआम कश्मीरी युवा सड़कों पर उतरकर सेना के जवानों को चुनौती दे रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा सरकार भी सवालों के घेरे में है। यह ठीक है कि घाटी में केंद्र सरकार के निर्देश पर कार्रवाई हो रही है पर राज्य सरकार को अपने स्तर पर मामला शांत कराने की पहल तो करनी चाहिए। आखिर वे सीधे तौर पर वहां के लोगों से जुड़े हैं। सैन्य कार्रवाई तो आखिरी विकल्प होना चाहिए। केंद्र के मंत्री भी जनता से जुड़े मुद्दों को पीछे रख पाकिस्तान के ही इर्द-गिर्द बात कर रहे हैं। पाक हमारे लिए चुनौती है वह कश्मीर को लेकर नई-नई चाल चल रहा है पर हम उसी को लेकर सिर्फ सियासत करेंगे तो देश को पीछे ही धकेलेंगे। पाकिस्तान में तो ऐसा ही हो रहा है, बेरोजगारी, भुखमरी, बिजली की कर्मी, पानी और स्वास्थ्य की समस्या से पीछा छुड़ाने के लिए पूरी हुकूमत कश्मीर की माला जप रही है और वहां के कट्टरपंथियों का खून उबाल मारने लगता है। मोदी सरकार एक तरफ तो दोस्ती के हाथ बढ़ा रही है तो दूसरी तरफ बयान बहादुर लोग एक पर 10 गोलियां मारने की बात करते हैं। जनता में भी गुस्सा बढ़ता है पर इससे कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। पाकिस्तान पर भरोसा खुद को ठगने जैसा है और यह हम बंटवारे के बाद से ही देखते आए हैं। ऐसे में भारत सरकार को पाक को लेकर एक सख्त नीति कायम रखनी होगी।

भारत के समर्थन से बलूचों को फायदा यह होगा कि इस मसले की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देने लगेगी। बाकी 1971 की घटना को दोहराना आसान नहीं है। पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है और वहां कट्टरपंथियों, आईएसआई और आतंकियों की चलती है तो उससे संयम की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बेहतर यह होगा कि मोदी सरकार कश्मीर में राजनीतिक समाधान की ओर बढ़े और बलूचों के लिए कूटनीतिक तरीके से ही समर्थन जारी रखे। हमारा पूरा फोकस कश्मीर में जवानों और नागरिकों की मौत का सिलसिला रोकने पर होना चाहिए। हमें कश्मीर का समाधान बलूचिस्तान में नहीं ढूंढना चाहिए वरना पाकिस्तान को भी कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का मौका मिल जाएगा। 

कभी कभी तो लगता है कि दोनों अोर सियासत चल रही है। पाकिस्तान में भारत और भारत में पाक बिक रहा है। खरीदने वाली जनता है जो हकीकत से काेसों दूर बस उकसावे पर फैसले कर लेती है।

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