पीओके में हमारी फौज ने सर्जिकल स्ट्राइक क्या की बीजेपी के लिए जैसे देश की सभी समस्याएं दूर हो गईं।भारतीय जवानों ने बड़ी बहादुरी से अपने फर्ज को निभाया पर नेता ऐसे बातें करने लगे जैसे वे खुद कंधे पर बंदूक रखकर आतंकियों का सफाया करके आए हों। देश की सुरक्षा जवान करते हैं, दुश्मनों से लोहा भी वही लेते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक में सरकार की भूमिका सख्त फैसले लेने की दृढ़ इच्छाशक्ति के तौर पर सामने आई पर इसका श्रेय लेने की जो छटपटाहट पूरी सरकार में देखी गई वह बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इसने सेना की बहादुरी के रुतबे को भी घटाने का काम किया है जो बिना कहे पूरे देश में महसूस की जा रही थी। इसके बाद सियासी पार्टिंया अपने अपने तरीके से एक सर्जिकल स्ट्राइक की बार बार सर्जरी कर रही हैं। इससे जवानों के मनोबल पर भी असर पड़ता है। सवाल यह है कि देश की सुरक्षा को लेकर की गई किसी भी कार्रवाई का श्रेय लिया जाना क्या जायज है। क्या इस बात का गाल पीटना सही है कि देखो हमने कर दिखाया जबकि दूसरी सरकारें नहीं कर सकीं। उस पर केजरीवाल, राहुल गांधी, ओम पुरी, सलमान खान और दूसरे लोग ऐसा बोल गए जो पाकिस्तान में उन्हें भले ही हीरो बना दे पर देश में उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। जो कल खतरा बनने वाले हैं, उन्हें उनकी जगह पर जाकर मारने की ऐसी कार्रवाई अमेरिका, इस्राइल समेत कई देश कई बार कर चुके हैं पर शायद ही अपने मुंह इतना गुणगान किए हों। सरकार और सेना की ओर से एक दिन बाद ही खुलेआम घोषणा करना अपने आप में एक चौंकाने वाला कदम था। पर इसके पीछे एक सटीक कूटनीति काम आई। सर्जिकल स्ट्राइक ऐसे समय की गई जब पठानकोट के बाद उड़ी हमले से दुनिया का ध्यान पाक प्रायोजित आतंकवाद पर केंद्रित हुआ था। यूएन में नवाज शरीफ हिजबुल कमांडर बुरहान वानी को शहीद बताकर बुरे फंसे। बची कसर सुषमा स्वराज ने पाक को बेनकाब कर निकाल दी। इस तरह से पाक अपनी ही जाल में फंस चुका था। ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक का फैसला नहले पे दहला वाला कदम साबित हुआ। पाक को समझ में ही नहीं आया कि वह हां बोले या ना क्योंकि उसे पता था कि वह जो भी बोलेगा, फंसेगा। यह उस समय पैदा हुए पाक विरोधी माहौल का ही असर था कि दुनिया के किसी भी देश ने खुलकर सर्जिकल स्ट्राइक का विरोध नहीं किया।
दिल्ली में ढाई साल पहले आई नई सरकार ने इस स्ट्राइक से पाक और आतंकियों को दो टूक संदेश दिया कि अब और आतंकवाद को सहन नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ कूटनीतिक तौर पर भी पाक भारत के चक्रव्यूह में घिर गया। आतंकवाद को आश्रय देने का उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया। आठ देशों के संगठन सार्क के सदस्य अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान ने तो खुलकर भारत का समर्थन किया। इतना ही नहीं, अमेरिका ने भी पाक को ही आतंक पर नकेल कसने की नसीहत दे डाली। रूस, सिंगापुर, यूरोपीय संघ समेत दुनिया के प्रमुख देशों ने भारत की कार्रवाई को जायज ठहराया। इससे पाक अलग-थलग पड़ गया।
उधर, भारत में सर्जिकल स्ट्राइक ट्रेंड करने लगा। चैनलों पर जंग छिड़ गई और अखबारों में पन्ने भरने लगे। सीमा पर गांव खाली हो गए, लोगों ने तंबुओं में शरण ली। पर सेना सीमा पर डटी रही। अच्छा होता कि डीजीएमओ की घोषणा के बाद स्वागत, जश्न सब कुछ होता पर श्रेय लेने की होड़ न मचती। वैसे भी कहावत में अपने मुंह अपनी बड़ाई से बचने की बात आती है। पर शायद सियासी लोग आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर समीकरण बैठाने में इतने मशगूल थे कि इसका ख्याल ही नहीं आया।
परदे पर शहीद जवान के पिता का किरदार बखूबी निभाने वाले ओम पुरी कह देते हैं कि सेना में किसी ने जबरी तो नहीं भेजा था। सलमान कहते हैं कि पाक कलाकार आतंकी नहीं होते जबकि ऐसी बात तो कही नहीं जा रही थी कि पाक कलाकार आतंकी होते हैं। सवाल सिर्फ इस बात का था कि जब लंदन, पेरिस में धमाके होने पर पाक कलाकार सोशल मीडिया पर आंसू बहाते हैं और हमले की निंदा करते हैं तो भला जिस देश में उनका गुजारा हो रहा है वहां दहशतगर्दी के खिलाफ वे क्यों कुछ नहीं बोलते। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें देश से बाहर भेजने की बात कही जा रही थी पर जब पाक कलाकारों ने चुप्पी साध ली तो जनभावना उनके खिलाफ हो गई, जिसका फायदा उठाकर हिंदूवादी संगठन मैदान में आ गए। कला संस्कृति शांतिकाल में दोनों देशों के लोगों को जोड़ने प्यार मोहब्बत बढ़ाने का एक जरिया हो सकता है पर उस देश के साथ नहीं जो भारत पर लगातार बुरी नजरें गड़ाए हुए हैं। उसका शांति का प्रेम महज एक छलावा है और वहां के नागरिक अपने देश से अलग कैसे हो सकते हैं।
कांग्रेस पार्टी कह रही है कि हमने पहले भी कई बार सर्जिकल स्ट्राइक की थी, पर श्रेय लेने की कोशिश नहीं की। जो भी हो दुनिया में हमें पाक को अलग-थलग करने में कामयाबी मिलती दिख रही है पर देश में हम अजीब सा रायता फैलता देख रहे हैं। पाक को मुंहतोड़ जवाब देना है तो जंग से नहीं कूटनीति ही काम आएगी और इसके लिए देश को एकजुट होकर निस्वार्थ भाव से संगठित रहना होगा।
सियासतदानों को कम से कम जवान को राजनीति से दूर रखकर ही बात करनी चाहिए तभी वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को दमदार तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। अन्यथा पर हम खुद ही अपना काम बिगाड़ लेंगे।सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगने से बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है।
गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मुद्दों को तो जैसे सरकारों और नेताओं ने मान ही लिया है कि इसे कभी भी सौ प्रतिशत पूरा नहीं किया जा सकता है तो फिर मुद्दे की तलाश में भटकते रहते हैं। भविष्य में भी ऐसे मौके आएंगे पर उम्मीद की जानी चाहिए कि जहां देश और देश की सुरक्षा की बात हो वहां कोई पार्टी, नेता या सरकार अपना गुणगान करने से बचें। इसके लिए इतिहासकार हैं ना, जो उनकी भूमिका को जरूर महत्व देंगे।
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