बुधवार, 11 मई 2016

अपने किले में हथियार डालना समझदारी तो नहीं

पहले जब राजा-महाराजा युद्ध के लिए निकलते थे तो अपने एक सबसे खास सिपहसालार की टुकड़ी को किले की सुरक्षा के लिए छोड़ जाते थे। अपनी सरजमीं की सुरक्षा को अभेद्य सुनिश्चित करना उनका मकसद होता था। आज जंग कम चुनाव ज्यादा होते हैं और किले की जगह चुनावी गढ़ ने ले ली है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं लेकिन बिगुल बज चुका है। प्रधानमंत्री की एक के बाद एक बलिया और बनारस की रैली ने इसके संकेत भी दे दिए। पार्टियों के रणनीतिकारों ने युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया है।
बसपा ने अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात कही है। सपा की मौजूदा सरकार है तो उसका किसी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का कोई तुक नहीं बनता। वैसे भी बिहार में उसे दरकिनार कर दिया गया था तो वह पुराने दोस्तों को करारा जवाब देना चाहेगी। रही बात कांग्रेस और भाजपा की। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर का जबरदस्त फायदा उठाने वाली भाजपा पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरने की रूपरेखा तैयार कर रही है। दिल्ली और बिहार में उसे भले ही मुंह की खानी पड़ी हो मगर मोदी-शाह की टीम इसे भुलाकर यूपी की सत्ता पर सवार होने का ख्वाब देख रही है। इसमें सबसे बुरी हालत में कांग्रेस है। लगातार दो बार केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद अब न तो पार्टी में कोई हिंदीभाषी दमदार नेता दिखता है और न ही पार्टी नेतृत्व अपनी साख बचा पा रहा है। टूजी, कोल, कॉमनवेल्थ जैसे घोटोलों के बदनुमा दाग पार्टी अभी धो भी नहीं पाई थी कि अगस्तावेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले ने उसकी किरकिरी करानी शुरू कर दी। ऐसे में देश की सियासत के लिहाज से महत्वपूर्ण सपा का हो चुका यूपी का किला क्या कांग्रेस 2017 में भेद पाएगी, यह बड़ा सवाल है।

आजादी के बाद कांग्रेस ने अविभाजित यूपी को वीर बहादुर सिंह, श्रीपति मिश्र, विश्वनाथ प्रताप सिंह, हेमवती नंदन बहुगुणा, कमलापति त्रिपाठी, त्रिभुवन नारायण सिंह, सुचेता कृपलानी, चंद्रभानु गुप्ता, संपूर्णानंद और गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गज मुख्यमंत्री दिए हैं। पर आखिरी बार पार्टी के नारायण दत्त तिवारी 1988-89 में मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद सपा, बसपा और भाजपा को सूबे की सत्ता मिलती रही है।

इलाहाबाद जिले के प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र में एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता से हाल ही में मुलाकात हुई। 4-5 साल पहले तक वह राजनीति में सक्रिय थे पर अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। उन्होंने कई कांग्रेसी सांसदों और विधायकों का वोट बैंक बढ़ाकर सत्ता का स्वाद चखाया है। खुद कभी पद का लोभ नहीं किया। आज भी कांग्रेस पार्टी के लिए उनके दिल में काफी सम्मान है। यूपी में कांग्रेस, के सवाल पर कहते हैं, देखिए जी परिवार का मुखिया सबसे अहम होता है। परिवार का तानाबाना, फैसला, पड़ोसियों से संबंध, समाज में मान-सम्मान, समर्थन सब कुछ उसी के नेतृत्व में मिलता है। ऐसे में उसका अक्लमंद, मृदुभाषी, ज्ञानी, थोड़ा चतुर, सबको साथ लेकर चलने वाला और सबसे महत्वपूर्ण जमीन से जुड़ा होना काफी अहम हो जाता है। अब कांग्रेस को देखिए। मुखिया कौन है। क्या वह सबको साथ लेकर चलने वाला है। क्या वह जमीनी नेता लगता है। वह कहते हैं जब तक राजीव गांधी जैसा सरल, मृदुभाषी और जमीनी नेता कांग्रेस के पास था स्थिति मजबूत थी। अब गांधी परिवार की छांव से पार्टी को निकलने की जरूरत है। जितनी जल्दी पार्टी नया नेतृत्व खोजेगी, उतनी जल्दी उसका कद और सम्मान बढ़ेगा। बाकी सोनिया जी को बहुत कुछ नुकसान उनकी खराब हिंदी की वजह से हो जाता है। काफी लोग तो उनकी हिंदी को समझ नहीं पाते या फिर मजाक बनाकर गंभीरता से नहीं लेते। राहुल गांधी में राजीव का अक्स तो दिखता है पर उनके चारों तरफ घिरे लोगों ने कभी खुद पर भरोसा करने नहीं दिया। हर चीज उन्हें लिखकर, समझाकर करने को दी। अब स्थिति यह है कि एक ही तरह की बात वह हर जगह करते दिख जाते हैं। इससे लोगों में संदेश गलत जाता है। वहीं मोदी हैं जो समय, जगह और लोगों के हिसाब से बोलते हैं और लोगों को अपना मुरीद बना लेते हैं।

कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी यूपी में राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर सकती है। आलाकमान और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के बीच इस पर चर्चा भी हुई है। खुद को साबित करने के लिए राहुल गांधी को एक दिन का संसदीय दौरा छोड़कर जनता के बीच वास्तव में आना होगा। अभी वह सिर्फ महीने-दो महीने में एक दिन अपने क्षेत्र में गाड़ी से उतरते गरीब के यहां रोटी खाते, या फिर हाथ हिलाते देखे जाते हैं। उन्हें खुद को जनता के लिए ज्यादा से ज्यादा उपलब्ध करना होगा। इससे उन्हें जनता को समझने का मौका मिलेगा और जनता भी उन्हें अच्छे से जानेगी। अभी तो वह सेलिब्रिटी ही हैं।
यूपी कांग्रेस का गढ़ रहा है। उसके समर्पित कार्यकर्ता आज भी हैं पर सूबे में पतली हालत के चलते किसी दूसरी पार्टियों से जुड़ गए हैं। कांग्रेस नेतृत्व को एक लहर पैदा करनी होगी। आओ चलें, अपने घर आई है कांग्रेस, जैसा एक अभियान शुरू करना होगा। पिछले 25-28 साल में क्या नफा नुकसान हुआ जनता को समझाना होगा। सर्वर्णों और अल्पसंख्यक वोटरों में कांग्रेस के लिए सम्मान आज भी है बस उन्हें उम्मीद दिखनी बंद हो गई है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी बेबस नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंदर किसी प्रमुख क्षेत्रीय क्षत्रप नेता के अभाव में कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार पर ही निर्भर है। यह गंभीर स्थिति है। भले ही भाजपा केशव प्रसाद मौर्य जैसे कम चर्चित व्यक्ति के नेतृत्व में चुनाव हार जाए पर वह बड़ा एवं जोखिम भरा फैसला लेने में पीछे नहीं हटी। हालांकि इसके जातिगत और कई अन्य समीकरण भी हैं पर कांग्रेस को इससे सीख लेना चाहिए। वैसे बिहार में पिछड़ों, अतिपिछड़ों की एकजुटता के कारण बुरी हार का सामना करने के बाद भाजपा द्वारा अगला प्रदेश अध्यक्ष ऐसे ही किसी शख्स को बनाए जाने की संभावना थी। यूपी में कांग्रेस को भी मिलेंगे कई केशव, बस तलाशना पड़ेगा। दिल्ली से उड़कर यूपी के गांव और कस्बे में आना होगा।

जी हुजूरी करने वाले कुछ कांग्रेसी नेता मानते हैं कि राहुल या प्रियंका अगर सरकार चलाने का अनुभव लेना चाहते हैं तो उन्हें यूपी में आजमाना चाहिए। अरे भैया, सीधे मुख्यमंत्री का अनुभव क्यों देना चाहते हो। बाकी नीचे का काम आता है, आता होता तो पार्टी की इतनी बुरी गति नहीं होती। लोकसभा में राहुल गांधी ने पूरा जोर लगा दिया था पर कोई कमाल नहीं दिखा सके तो अब आगे फिर मौका क्यों दिया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि पहले वो 20 करोड़ लोगों की समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हो जाते हैं तब वो एक अरब से अधिक की आबादी की समस्या को सुलझा पाने के लायक होंगे। कितनी हास्यास्पद स्थिति है, अरे वे सबसे पहले 20 लोगों की समस्याओं को तो अकेले सुनें, समझें और हल करके रिपोर्ट लें। कई नेता तो मजाकिया अंदाज में राहुल गांधी को भारतीय राजनीति का अभिषेक बच्चन मानते हैं। लोग कहते हैं कि अभिषेक, अमिताभ का बेटा होते हुए और ढेरों अवसर मिलने के बाद भी सफलता की उन बुलंदियों तक नहीं पहुँच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जाती है।

सूबे के जातीय समीकरण में सामान्य वर्ग की संख्या 20.95, अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 54.05, अनुसूचित जाति 24.94 व अनुसूचित जनजाति 0.06 प्रतिशत है। सपा का मुख्य आधार मुस्लिम और यादव समाज में है। कांग्रेस मजबूत हुई तो आजम खान जैसे लोगों से नाराज मुस्लिम टूटकर कांग्रेस में आ सकते हैं क्योंकि भाजपा को अब भी मुसलमान कम स्वीकार रहा है। यहां मुस्लिम 15-18 प्रतिशत हैं और यादव नौ प्रतिशत। वैसे भी मुस्लिम समुदाय में सपा का वोट बैंक घटकर आधे से भी कम रह गया है। जबकि यादव समाज के तीन चौथाई वोट उसे अब भी मिलते हैं। उत्तर प्रदेश के 19 प्रतिशत दलित समाज के वोट पर मायावती का एकाधिकार है। दलित वोटर के लिए तो जैसे मायावती के सात खून माफ हैं और ये वोट कहीं खिसकने वाले नहीं हैं। कांग्रेस के पतन के बाद कुछ प्रतिशत ब्राह्मण पद और प्रतिष्ठा की लालसा में बसपा के साथ गए हैं। हालांकि ये आते-जाते रहे हैं।

शर्मनाक तो यह है कि सपा और बसपा सरकारों में एक के बाद एक सत्ता का स्वाद लेने की होड़ लगी है। एक की सरकार में कानून व्यवस्था बदतर हो जाती है तो दूसरे के कार्यकाल में सब कुछ एकतरफा सा दिखने लगता है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां विकल्प देने में नाकाम रही हैं। वोटर भी क्या करे एंटी-इनकंबेंसी यानी मौजूदा सरकार  के खिलाफ दूसरे नंबर वाली पार्टी को मजबूरी में मौका दे देता है।

खबर है कि कांग्रेस बिहार जैसा यूपी में जदयू और एनसीपी से गठजोड़ कर विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना पर काम कर रही है। अगर ऐसा होता है तो यह मान लिया जाएगा कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में अब वो दमखम नहीं रहा कि वह देश की सत्ता को संभाल सके। जब यूपी अकेले नहीं संभलेगी तो देश क्या संभलेगा। यूपी में एनसीपी और जदयू को तो फायदा पक्का मिलेगा, हो सकता है कांग्रेस की कुछ सीटें भी बढ़ जाएं पर जो निराशा कार्यकर्ताओं और खुद पार्टी के भीतर पनपेगी वो पार्टी को पतन की ओर ही धकेलेगी। अब वक्त आ गया है प्रशांत किशोर भी पार्टी को ऐसी सुझाव रूपी संजीवनी दें कि वह गांधी परिवार से अलग भी कुछ सोचना शुरू करे और पहले खुद में और फिर जनता में दोबारा भरोसा कायम करे। नया नेतृत्व ढूंढ़े तो शायद काम बन सकता है।

ये यूपी नहीं दिल्ली की सत्ता संभालने वालों का किला है, जो इसे संभाल पाएगा वही सुल्तान कहलाएगा।

गुरुवार, 5 मई 2016

अमेरिका में ट्रंप की चुनावी फिजा

अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव की तस्वीर लगभग साफ हो गई है। ओबामा के बाद सुपरपावर अमेरिका का कमांडर इन चीफ कौन होगा, यह जानने की उत्सुकता दुनिया भर के लोगों में है। विवादित बयानों से सुर्खियों में आए डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदवारी रिपब्लिकन पार्टी से पक्की हो गई है जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी से हिलेरी क्लिंटन सबसे आगे हैं। पांच राज्यों में क्लीन स्वीप और फिर इंडियाना में शानदार जीत के बाद ट्रंप को 1237 प्रतिनिधियों के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए अब महज 190 डेलीगेट की दरकार है। इधर, उनके दो बड़े प्रतिद्वंद्वी टेड क्रूज और जॉन कैसिच ने दावेदारी वापस ले ली है। इससे ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती खत्म हो गई है। एक तरफ अरबपति कारोबारी रिपब्लिकन ट्रंप को विवादों की लहर का फायदा मिलता दिख रहा है तो वहीं अनुभवी डेमोक्रेट पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी आगे चल रही हैं पर चुनावी फिजा उतनी दमदार नहीं है क्योंकि उनके प्रतिद्वंद्वियों को भी अच्छा समर्थन मिल रहा है।

 राष्ट्रीय हित की बात तो हर नेता करता है ऐसे में यह समझना दिलचस्प और महत्वपूर्ण है कि अमेरिका फर्स्ट की बात करने वाले ट्रंप में खास क्या है जो वे अमेरिकियों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। शायद एक सबसे बड़ी बात जिससे वे सुर्खियों में आए वो था मुस्लिमों को अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी का उनका विवादित बयान। वैसे तो इस तरह का बयान लोकतांत्रिक नेता को शोभा नहीं देता पर इस्लामिक आतंकवाद से दुनिया जिस दहशत में है उसी का परिणाम है कि बिना ज्यादा सोचे अमेरिकी ट्रंप के समर्थन में आ गए हैं और ध्रुवीकरण शुरू हो गया है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका के सुपरपावर बनने पर बड़े युद्ध तो नहीं हुए लेकिन नई चुनौतियां जरूर खड़ी हुईं। महाविनाशक हथियार बने, लंबी दूरी की मिसाइलें आ गईं, साइबर वार ‌छिड़ा और सबसे खतरनाक आतंकवाद और कट्टरपंथ ने जड़ें जमानी शुरू कर दी। अमेरिका को हिलाकर रख देने वाले 9/11 की घटना के बाद नीतियां बदलने से सुरक्षा मजबूत तो हुई पर कई गंभीर समस्याओं ने देश को जकड़ लिया। अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, रोजगार घटे, असमानता और मौतें बढ़ीं, ऐसे में सुरक्षा पर खर्च कम करने का दबाव भी बढ़ा, इन सबके बीच अमेरिका को सुपरपावर बनाए रखते हुए सुरक्षा जरूरतों को पूरा कर पाना चुनौतीपूर्ण हो गया। अब नए राष्ट्रपति इससे कैसे निपटते हैं, यह भविष्य की गर्भ में है लेकिन ट्रंप ने चुनावी प्रचार और डिबेट के दौरान अपनी नीतियों को जिस बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है उससे मतदाताओं में उनके प्रति भरोसा बढ़ा है। प्राइमरी चुनाव के नतीजे इसका प्रमाण हैं। मुद्दा कोई भी हो अवैध अप्रवासियों को रोकने का, मैक्सिको सीमा सील करने या इस्लामिक कट्टरपंथ के सफाए का। दरअसल अमेरिका के लोग सुरक्षा को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहते। ओबामा के कार्यकाल में देश में कोई बड़ा हमला तो नहीं हुआ पर दुनिया में अमेरिकियों के मारे जाने का सिलसिला भी नहीं थमा। अकेले इराक और अफगानिस्तान में ही 6,845 अमेरिकी मारे गए और नौ लाख घायल हो गए। अब जनता ऐसा राष्ट्रपति चाहती है जो जवानों की जान का सौदा किए बिना सुरक्षा दे और दुनिया में अमेरिका के दबदबे को कायम रख सके। ट्रंप यह भलीभांति समझते हैं इसीलिए वे बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि दुनिया भर में अमेरिकियों की सुरक्षा ट्रंप प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी।

प्रधानमंत्री मोदी की तरह ट्रंप लिखा हुआ नहीं पढ़ते। इससे वे जनता से सीधे जुड़ पाते हैं क्योंकि वह सरल और जमीनी बातें कर रहे होते हैं। वे भाषण के दौरान विरोधियों का मजाक उड़ाने से भी नहीं चूकते। या यूं कहें उन्हें जनता को लुभाने की कला आती है। वे कहते हैं कि अमेरिका ने दुनिया को नाजियों और जापानियों से बचाया। लेकिन आज अमेरिका का कद घट गया है। हमारी विदेश नीति लड़खड़ा गई है। इराक, मिस्र, लीबिया, सीरिया हर जगह हम नाकाम रहे। आज जरूरत है एक मजबूत नेता कि जो अमेरिका का गौरव और रुतबा लौटा सके। रियल एस्टेट कारोबारी ट्रंप कारोबार, आव्रजन, अर्थव्यवस्था, रोजगार और सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं।

ट्रंप अमेरिका की मौजूदा सैन्य ताकत को पहले से कमजोर बताते हैं। 1991 में अमेरिका के सक्रिय सशस्त्र बल की तादाद करीब 20 लाख थी जो घटकर 13 लाख रह गई है। नौसेना के एक्टिव शिप 316 बचे हैं। वायुसेना की ताकत तिहाई रह गई है। सैन्य बजट भी घटा है। उधर, आईएसआईएस, अल कायदा, तालिबान, बोको हराम जैसे आतंकी संगठन हैं जो अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की साजिश रच रहे हैं। ट्रंप में लोग ऐसा दमदार नेतृत्व देख रहे हैं जो बेझिझक सियासत किए बिना देशहित में फैसले ले सके।

हकीकत यह है कि आज अमेरिका का चीन से कारोबार घाटा बढ़ा है, सीमाएं खुलने से अवैध तरीके से घुसपैठ बढ़ी है। आज बेरोजगारी दर पांच फीसदी तक जा पहुंची है। ट्रंप का दावा है कि घर की माताओं, बुजुर्गों और किशोरों की बेरोजगारी को शामिल किया जाए तो यह आंकड़ा 93 मिलियन (कुल आबादी 323 मिलियन) पहुंच जाएगा। उत्तर कोरिया जैसा छोटा सा देश अमेरिका को धमकी देता है। सऊदी अरब आंख दिखा रहा है। इसके लिए वे ओबामा की विदेश नीति को जिम्मेदार बताते हैं। कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले देशों को उजागर न करने, मध्य पूर्व में अस्थिरता और ईसाइयों को आतंकियों से न बचाने के मुद्दे को उन्होंने जोरशोर से उछाला है। एक तरफ वे चीन और भारत पर नौकरियां छीनने का आरोप लगाते हैं तो वहीं रूस से शत्रुता भुलाकर शांतिपूर्ण संबंध की भी वकालत करते हैं। उनका मत साफ है कि अमेरिकियों को पहली प्राथमिकता मिलेगी।

ट्रंप जीतते हैं तो आतंकवाद के खिलाफ भारत को पूरा सहयोग मिल सकता है। पाकिस्तान के परमाणु जखीरे के कारण ट्रंप उसे दुनिया का संभवत: सबसे खतरनाक मुल्क भी करार दे चुके हैं। उनका संकेत साफ है कि जिन देशों से मदद के बदले में धोखा मिलता है, उन्हें धन रोका जाएगा। अमेरिका से पाक को अरबों डॉलर की मदद मिलती रही है। अब लड़ाकू विमान एफ-16 भी देने की बात चल रही है। ओबामा ने 2016-17 के लिए पाक को 860 मिलियन डॉलर की मदद देने का प्रस्ताव रखा है। ट्रंप जीते तो यह सब बंद होगा या फिर पाक को आतंकियों के प्रति नरमी छोड़नी होगी। यह रवैया भारत के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि विदेशी मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार में करता रहा है। हालांकि आउटसोर्सिंग इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भारत को ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। एच1बी वीजा पर ट्रंप अपना पुराना विरोधी रुख बदल रहे हैं। ट्रंप ग्रुप ने पुणे और मुंबई में दो रियल एस्टेट कंपनियों के साथ मिलकर अपार्टमेंट प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है। आने वाले समय में यह कारोबारी रिश्ते और मजबूत हो सकते हैं।

अब देखना यह है कि ट्रंप अगर व्हाइट हाउस पहुंचते हैं तो वह अपने वादों को कितना अमलीजामा पहना पाते हैं या फिर सब चुनावी जुमले ही साबित होंगे। 

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए ...

पाकिस्तान के हिंदू या सिख भारत में शरण मांगते हैं तो कहा जाता है कि इस्लामिक मुल्क में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं। जबकि हकीकत यह भी है कि उसी देश के सबसे बड़े और सबसे कम आबादी वाले सूबे बलूचिस्तान के मुसलमान पाक से आजादी मांग रहे हैं। बलूच राष्ट्रवादी अपनी सांस्कृतिक पहचान, संसाधनों पर बराबर हक और अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन जवाब में उन्हें पाकिस्तानी हुकूमत और फौज का अत्याचार सहना पड़ रहा है। बलूच अंग्रेजों के बाद खुद को पाकिस्तान का गुलाम मानते हैं क्योंकि यहां सिर्फ पाक फौज का सिक्का चलता है जो कभी भी कहीं भी किसी को भी उठा लेती है और अपना हक मांगने वालों को मौत के घाट उतार देती है। हैरत की बात तो यह है कि कश्मीर, अफगानिस्तान में गृह युद्ध, परमाणु सुरक्षा, धार्मिक कट्टरपंथ को लेकर बार-बार पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में आता है पर कभी भी बलूचिस्तान का मुद्दा खुलकर सामने नहीं आ पाता। बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाक फौज की क्रूरता कभी-कभार किसी स्थानीय नागरिक की बदौलत ही सामने आ पाती है। दोनों ही जगहों पर मीडिया को पूरी तरह से सेंसर किया गया है। पाक के अत्याचार से त्रस्त यहां की जनता भारत से दूसरे मुक्ति संग्राम की परिणति की उम्मीद लगाए बैठी है। 
प्रमुख राष्‍ट्रीय मीडिया में तो बलूचिस्तान की घटनाओं को स्पेस नाम मात्र का मिलता है। बलूचिस्तान के पत्रकार सच्चाई लिखते हैं तो इस्लामाबाद में बैठे संपादक खबरों को पाक फौज के चश्मे से एडिट कर देते हैं। पाक हुकूमत को चुनौती देने वाले तेजतर्रार पत्रकारों को धमकाया जाता है। मजबूरन ऐसे दर्जनों पत्रकारों को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे समेत दुनिया के कई देशों में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है। पाक फौज द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं पर बेबाक रिपोर्ट देने के चलते युवा बलूच पत्रकार मलिक सिराज अकबर को 2011 में भागकर अमेरिका में शरण लेनी पड़ी। अब वे वहीं से बलूचिस्तान की सच्चाई दुनिया को बता रहे हैं। पाक फौज ने आधुनिक विचारों वाले राष्ट्रवादियों की हर उस आवाज को शांत करना शुरू कर दिया जो अपना हक मांगते हैं। इनमें नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, विद्वान, वकील और पत्रकार सीधे तौर पर निशाना बने। उन्हें अगवा कर मार दिया गया, या इतनी यातना दी गई कि वे टूट गए। बलूच अलगाववादियों ने भी समय-समय पर हिंसक जवाब दिया। ऐसे में अब बातचीत के जरिए बलूच समस्या के समाधान की उम्मीदें कम ही बची हैं। 2004 के बाद आजादी के आंदोलन में तेजी आई तो हजारों की संख्या में हत्याएं भी हुईं। 

बलूचों की तीन प्रमुख जनजातियां हैं- मैरी, बुगती और मेंगल, तीनों जनजातियों के नेता बड़ी फौज खड़ी कर सकते हैं पर इनमें एकता नहीं है। पाक फौज इनमें फूट डालने में सफल रही है। इसी कारण पाक फौज का तर्क रहता है कि बलूचिस्तान में सब सामान्य है, बुगती समुदाय के कुछ लोग सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रहे हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी और बलूचिस्तान लिबरेशन यूनिटी फ्रंट दो प्रमुख बलूच संगठन हैं जो सीधे तौर पर पाक फौज से लोहा ले रहे हैं। 
वास्तव में बलूचिस्तान समस्या के मूल में जातीय समुदाय में टकराव भी है। अंग्रेजों का विश्वासपात्र होने का पाक पंजाबियों को फायदा मिला। सेना एवं अन्य सरकारी प्रतिष्ठानों में सबसे ज्यादा पंजाब के लोग भर्ती किए गए जबकि बलूचिस्तान को नाममात्र का प्रतिनिधित्‍व मिला। ऐसे में बलूचों का हक सेना मार रही है। पंजाबी पाक की कुल आबादी का करीब 45 फीसदी हैं। 


बलूचों की नाराजगी की इस सदी की सबसे बड़ी वजह ग्वादर पोर्ट का निर्माण है, जो 2002 में शुरू हुआ। चीन की मदद से पाक छोटे से मछली पकड़ने वाले लोगों के गांव ग्वादर को ट्रांसपोर्टेशन हब के तौर पर अंतरराष्ट्रीय पहचान देना चाहता है। भारत के लिहाज से ग्वादर का पाक के लिए सामरिक महत्व भी है। यह ऊर्जा की भारी मांग वाले भारत, चीन और पूर्वी एशिया के लिए महत्वपूर्ण गलियारा बन सकता है जो पाक अधिकृत कश्मीर से होकर निकलेगा। ग्वादर प्रोजेक्ट पूरी तरह से पाक सरकार के नियंत्रण में हैं। इससे स्थानीय बलूचों के जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं दिख रहा है। यही नहीं, बलूचों को कमजोर करने के लिए पाक सरकार ग्वादर के पास दूसरे प्रांतों के लोगों को बसा रही है। कर्मचारियों के लिए पूरा एक कस्बा बसाया जा रहा है। प्रस्तावित ईरान-पाक-भारत पाइपलाइन भी बलूचिस्तान से होकर आएगी, जिसका बलूच विरोध कर रहे हैं। अफगानिस्तान युद्ध से शरणार्थी बड़ी तादाद में बलूचिस्तान में घुस आए। ऐसे में अपने ही क्षेत्र में बलूच आबादी हासिए पर आ गई है। दोनों समुदायों में रंजिश ब्रिटिश शासन से ही है। तालिबान आतंकी भी यहां शरण ले चुके हैं। राजधानी क्वेटा तो अल कायदा और तालिबान का गढ़ बन चुकी है। 


2004 में बलूच विद्रोह फिर से शुरू हुआ और सेना द्वारा 2006 में जानेमाने बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या के बाद विरोध की चिंगारी तेजी से भभकी। अवैध तरीके से कई लोगों हिरासत में रखा या गायब कर दिया। आज आलम यह है कि बलूचिस्तान पाक का ऐसा प्रांत बन चुका है जहां सबसे ज्यादा लोग गायब हुए हैं। अमेरिका और एमनेस्टी समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने इस पर सवाल उठाए पर राजनीतिक दबाव और इच्छाशक्ति के बगैर इसका कोई फायदा बलूचों को नहीं हुआ। 


बलूच समुदाय सिर्फ दक्षिण पश्चिम पाकिस्तान ही नहीं पूर्वी ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में पाक बलूचों की आबादी तेजी से घटी है। पाक अक्सर अपनी करतूत को छिपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ने का सहारा लेता रहता है। हाल ही में एक पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी को बलूचिस्तान से गिरफ्तार कर उसने कहा कि ये रॉ के मिशन पर थे जबकि कुलभूषण जाधव अपने कारोबार के सिलसिले में ईरान से पाक आए थे। जानीमानी बलूच कार्यकर्ता नाएला कादरी भारत से किसी भी प्रकार के मदद के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहती हैं कि यह तो पाक की नापाक चाल है जिससे वह बड़े पैमाने पर अपहरण और कत्लेआम की घटनाओं से दुनिया का ध्यान हटा सके। कादरी ने कहा कि हम तो भारत से मांग करते हैं कि जिस तरह से आपने बांग्लादेश के लोगों को पाकिस्तान के जुल्मओ-सितम से आजाद कराया उसी तरह प्रभावशाली पड़ोसी मुल्क होने के नाते बलूचों की मदद के लिए आगे आएं। बलूचों को भारत से काफी उम्मीदें हैं पर अब तक भारत का रवैया उदासीन रहा है। 

वर्ष 1800 के आसपास इस इलाके में कबायलियों के बीच कमजोर आपसी संबंध का अंग्रेजों ने फायदा उठाया और फूट डालो राज करो की नीति अपनाई। इसके तहत बलूचिस्तान को सात क्षेत्रों में बांट दिया गया। अंग्रेज चाहते थे कि ऐसा कर वे उस इलाके पर कब्जा कर लें जिससे होकर अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सके। 1877 में अंग्रेजों ने बलूचिस्तान को ब्रिटिश भारत में मिला लिया। 1947 में भी क्षेत्र का कबायली कुनबा संगठित नहीं हो सका जिसका परिणाम यह हुआ कि पाक ने सूबे पर जबरन कब्जा कर लिया। 

प्रकृति ने इस क्षेत्र को सबसे ज्यादा समृद्ध बनाया लेकिन इसे जानबूझकर दक्षिण ‌एशिया का सबसे बदहाल क्षेत्र बनने के लिए छोड़ दिया गया। आज यह पाकिस्तान का सबसे गरीब और सबसे कम साक्षरता वाला प्रांत है। देश की जीडीपी में इसका योगदान भी 3.7 से नीचे आ गया है। बलूचिस्तान में मातृ और शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। अंग्रेजों के समय में यहां से कोयला निकाला जाता था। 1952 में यहां पहली बार प्राकृतिक गैस का भंडार खोजा गया। देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस का भंडार होने के बावजूद क्षेत्र की बदहाली सूबे के लोगों में पाक हुकूमत के प्रति नफरत की भावना बढ़ाती है। बलूचिस्तान के गैस क्षेत्र का फायदा यहां के नहीं बल्कि सिंध और पंजाब के लोगों को मिलता है। बलूचिस्तान कर्ज में डूबा है। स्वास्‍थ्य की हालत खस्ता है। लोगों को पीने के लिए साफ पानी भी मयस्सर नहीं है। रोजगार भी सीमित लोगों को दिया जाता है। देश विरोधी होने का ठप्पा लगाकर न जाने कितने लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया। कुछ के घरवालों को तो आज भी अपनों का इंतजार है। 
बलूच अपने संसाधनों का मालिकाना हक मांग रहे हैं जबकि पाक सेना ब्रिटिश हुकूमत की भूमिका में है। उसका कहना है कि वह लोगों को सभ्य, आधुनिक और विकास की धारा से जोड़ने के लिए बलूचिस्तान में है जबकि सच मायने में पूरा सूबा पाकिस्तान की कॉलोनी बन चुका है। 


आज बलूच राष्ट्रवादियों को भारत से ढेरों उम्मीदें हैं। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों की तरह बलूचों को भी राजनीति में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा। पाक सरकार में पंजाबियों का दबदबा है। प्रांतीय शासन के अधिकार सीमित कर दिए गए। भारत ने बंगालियों को पाक के अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी तो बलूचिस्तान का नंबर कब आएगा, यह सवाल वहां की फिजा में उठ रहा है। पाक को भी यही डर सता रहा है। कश्मीर और इस्लामिक आतंकवादियों के बाद बलूचिस्तान पाक फौज के लिए तीसरा फ्रंट बन चुका है। अच्छा होता इस मामले को सेना के बजाए निर्वाचित सरकार सुलझाने का प्रयास करती पर इसकी उम्मीद फिलहाल नहीं की जा सकती। 

एक मशहूर शायर की ये लाइनें कितनी सटीक बैठती हैं- 

खंजर आजाद है सीनों में उतरने के लिए 
मौत आजाद है लाशों पे गुजरने के लिए 
कौन आजाद हुआ 

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

जेएनयू प्रकरण में थोड़ी समझ सबको दिखानी चाहिए थी


देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारेबाजी की दुस्साहसपूर्ण घटना के बाद देशभर में हो रहे प्रदर्शन और दो खेमों में लोगों के बंटने के बाद यह विश्लेषण जरूरी है कि
वास्तव में मीडिया, राजनेताओं और समाज के आम लोगों ने इस मामले को किस तरह से लिया। और क्या वह तरीका सही था। दो दिनों में मैंने दिल्ली में करीब एक दर्जन लोगों से बात कर इस ज्वलंत मुद्दे
पर उनके विचार जानने की कोशिश की।
आपको जानकर हैरानी होगी कि कोई भी मामले को गहराई से न समझा और न ही उसकी इसमें रुचि है। वो तो बस भड़क गया, एक उकसावे पर। मैं भी। सभी एकसुर में जेएनयू को अलगाववादियों का अड्डा और उसे बंद करने की भी बातें करने लग गए।
फौरन बाद ही विवाद ने सियासी चोला पहन लिया। सड़कें लाल और भगवा झंडे से पट गईं। यहां तिरंगे की बात नहीं करूंगा क्योंकि यह सियासत से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। मेरा मानना है कि
आपकी विचारधारा कोई भी हो, आपको मुबारक। पर देश, देश का झंडा, एकता-अखंडता के नाम पर पहले राष्ट्र की भावना की आपसे अपेक्षा की जाती है। कुछ लोग इसे जबरदस्ती संघी विचारधारा को
थोपना कह रहे हैं। यहां एक सवाल उठता है कि पार्टी पॉलिटिक्स और छात्र राजनीति में कोई अंतर है भी कि नहीं। नेताओं की सियासत का अड्डा विश्वविद्यालयों को बनने क्यों दिया जा रहा है। नेताओं और
पार्टियों के हितों को साधने का जरिया पढ़ने वाले छात्र न बनें इस बात का किसी को ख्याल है या नहीं। क्योंकि राजनीतिक लोग 24 घंटे सातों दिन बस सियासत करते हैं और पढ़ाई करने वालों को तो
भविष्य बनाना है, अपना और परिवार की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना है। अब इस हंगामे के बाद नुकसान तो पढ़ने वालों का ही हो रहा है। जबकि चैनलों को दर्शक मिल रहे हैं। विश्लेषक अपना ज्ञान
बघार रहे हैं। अखबारों के पेज भर रहे हैं। पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही है। किसी का काम खराब हुआ तो वो सिर्फ और सिर्फ पढ़ने वाले हैं। हां जिन लोगों ने देशविरोधी जहर उगला उनके खिलाफ
कार्रवाई हो, यह पूरा देश चाहता है।
अब पीछे चलते हैं-
चैनलों पर दिखाए गए वीडियो को देख सभी में देशभक्ति की भावनाएं हावी हुई। होनी भी चाहिए, मैंने जब पहली बार सुना- भारत तेरे टुकड़े होंगे... यकीन मानिए तलवार और गोली की बात ही जेहन में कौंध गई। गुस्साए लोगों का ताप अपनी जगह जायज है। हां, देशभक्ति किसे कहते हैं इसमें भी सब की राय जुदा है। पर यहां तो एक वीडियो से लोगों को उकसाया गया। आप शायद अब भी न समझें होंगे
कि उकसाया कैसे गया। दरअसल नापाक हरकत की मंशा दो चार लोगों की थी, बाकी के लोग तो संघ और बीजेपी का विरोध करने के लिए जुटते चले गए जो विचारधारा में मतभेद की बात है। जोशीले
नारों के बीच ऐसा लगता है कि मास्टरमाइंड ने पांच- दस लोगों के सहयोग से कश्मीर और भारत विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए।
अब आपको एक पत्रकारिता की गूढ़ बात समझाता हूं। कश्मीर में जुमे की नमाज के बाद कुछ लोग अक्सर मस्जिद से आती भीड़ के आगे खड़े होकर पाकिस्तान या आजादी या फिर आईएसआईएस का
झंडा लहराते हैं और विरोधी नारे लगा देते हैं। विश्व मीडिया में गई तस्वीरों में लगता है मानों कश्मीर में बड़ा जुल्म हो रहा है और वहां बगावत की आंधी उमड़ रही है जबकि चंद लोग होते हैं जो यह विवाद
सुलगाए रखना चाहते हैं और इसमें आजादी जैसा कुछ नहीं सियासत साधने की मंशा रहती है। गरीबों, मजलूमों की फिक्र इन्हें नहीं होती। इसे कुछ भारतीय अखबारों और चैनलों ने समझा और इस
प्रोपगेंडा की कवरेज सीमित होती है या नहीं की जाती है। ऐसे में जेएनयू प्रकरण में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सावधानी क्यों नहीं बरती। हम तो पूछेंगे, तेज, सर्वश्रेष्ठ, आपसे आगे चलने वालों ने उत्तेजक
और देश विरोधी बातों को सार्वजनिक क्यों कर दिया।
मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाक में भारत विरोधी बातें करता है तो अखबार के लोग भारत के खिलाफ उगला जहर से काम चलाते हैं। इस खबर को अक्षरश: लिखा भी जा सकता है लेकिन
यही तो आतंकी या अराजक तत्व चाहते हैं कि वे कुछ ऐसा करें कि विवाद खड़ा हो और जबरन सुर्खियां बने। हमें इनके मंसूबे को तोड़ना होगा।
आज का दौर टीवी का है। भारत में सोचने समझने की क्षमता रखने वाले जिस किसी भी शख्स के कानों में ऐसी देशविरोधी नारों की गूंज सुनाई देगी, उसका खून खौलेगा ही। इस मामले में भी विवाद के
तेजी से बढ़ने की यह प्रमुख वजह रही। पर क्या आग को हवा देने से पहले मीडिया ने सधी हुई रिपोर्टिंग की। अगर कल को कन्हैया के सभी विवादित वीडियो गलत निकले जैसा कि वामपंथी छात्र और
जेएनयू के लोग दावा कर रहे हैं तो क्या मीडिया संस्‍थानों के खिलाफ कार्रवाई होगी। अगर वीडियो सच भी निकलता है तो इस तरह खुलेआम देशविरोधी वीडियो को चैनलों पर प्रसारित कर देना क्या एक
उचित फैसला था। क्या चैनल वालों को यह पता नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया भयावह होगी। पर कड़वी सच्चाई है कि टीवी चैनल यही तो चाहते हैं कि विवाद हो और ज्यादा से ज्यादा दर्शक उनका चैनल
देखें। मेरा ऐसा मानना है कि टीवी मीडिया से रिपोर्टिंग में थोड़ी सी चूक हुई। अब कई फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी कन्हैया की बनाई जा रही है। जैसे सुप्रीम कोर्ट ने उसे देशद्रोही ठहरा दिया हो। बाकी गद्दार
कौन हैं और कहां हैं। उनकी धरपकड़ चल रही है।
कुछ दिन पहले जेएनयू के जानेमाने प्रोफेसर और साहित्यकार मकरंद परांजपे को सुनने का मौका मिला। विषय गांधी, अंबेडकर और नेहरू था पर जेएनयू विवाद ही छाया रहा। डॉ. परांजपे ने साफ कहा
कि जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इसका कोई समर्थन नहीं करता और पर पूरे मामले में दोनों पक्षों ने अहिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। he said please do not use
political weapon to protest. there are multiple type of intolerence. politics is कामधेनु in our country. Listening is an act of अहिंसा but in
this case कोई भी किसी की नहीं सुन रहा। लोग बस भड़क रहे हैं। मीडिया ट्रायल हो रहा है जबकि असली दोषी अभी गिरफ्त से बाहर हैं। बापू और अंबेडकर में भी मतभेद थे और सार्वजनिक तौर
पर थे लेकिन वे साथ-साथ रहते और काम करते थे। चिल्लाना, नारेबाजी भी एक प्रकार की हिंसा ही है। जेएनयू विवाद के राजनीतिकरण ने विचारधारा को मायावी बना दिया है। he said we
should be active not reactive. first understand, feel and then if very necessary speak.उन्होंने मामले को हैंडल करने के लिए दोनों पक्षों को गलत ठहराया।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले लोगों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सच्चाई को सुनना और समझना चाहिए था और
सड़क पर उतरने वालों को कानून पर भरोसा रखना चाहिए।
इसी कार्यक्रम में सुविख्यात लेखक पद्मश्री एसएल भयरप्पा भी मौजूद थे। उन्होंने बड़ी ही कड़वी मगर सौ फीसदी सच बातें कहीं। इतिहास के पन्ने पलटते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने कुछ मुसलमानों को
भड़काया था कि हम चले गए तो हिंदू तुम पर राज करेंगे। इससे अच्छा है कि हमी शासन करें। उन्होंने मुसलमानों को इतना डरा दिया कि वे आजादी भूल अंग्रेजों को अपना हमदर्द मानने लगे और विद्रोह
कमजोर हुआ। आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वही रास्ता अपनाया। अंग्रेजों की तरह मुसलमानों को भड़काया कि हिंदू क्रूर हैं। ऐसे में देश को बांटकर राज करने की परंपरा अनवरत जारी रही। किसी ने
मुसलमानों को ये समझाने की कोशिश नहीं कि देश आपका है तो कोई आपसे जोर जबरदस्ती कैसे कर सकता है। यह पाकिस्तान नहीं भारत का लोकतंत्र है। नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानों को
अल्पसंख्यक दर्जा दिलाया पढ़ने, रोजगार पाने या किसी कल्याणकारी कार्य के लिए नहीं धार्मिक पहचान दिलाने के लिए, जो उनका वोट बैंक बना। ऐसी राजनीति बंद होनी चाहिए।
वास्तव में जेएनयू को नेताओं ने अपना अखाड़ा बना लिया और इस अखाड़े को महिमामंडित किया मीडिया ने। कहा तो यह भी जा रहा है कि जेएनयू के जरिए भाजपा शैक्षिक संस्थानों पर पकड़ मजबूत
करना चाहती है तो दूसरी तरफ वामपंथी दल विधानसभा चुनावों के लिए दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं सच क्या है पर इतना ता सबको समझना चाहिए कि
राजनीति जारी है।
बाकी चार लोगों के नारों से हिमालय पर पड़ी एक किलो बर्फ भी पिघलने वाली नहीं है टुकड़े ये क्या करेंगे देश के। नादान हैं या तो जीवन भर चक्की पीसेंगे या कहीं गोली खाकर टें हो जाएंगे। पर दोस्तों
थोड़ा सब्र कर लो। विरोध करो हिंसा नहीं।

बाकी अब तो उमर खालिद समेत देशद्रोह के 10 आरोपी भी कह रहे हैं कि वे देशविरोधी नहीं है। ये विश्वविद्यालयों की लड़ाई है। ऊपर वाला जाने जब सभी देश के हित में सोच रहे हैं तो टुकड़े होंगे इंशाल्लाह ----- के नारे कौन लगा रहा था। जांच का विषय है।

जय हिंद
#nationfirst

रविवार, 3 जनवरी 2016

नवाज से ये कैसी दोस्ती

पहले अचानक थाईलैंड में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं। कुछ ही दिन बात सुषमा स्वराज पाकिस्तान जाती हैं और फिर काबुल में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर कर मोदी पूरी दुनिया को अचंभित कर देते हैं। विपक्ष में रहते पाकिस्तान से लव लेटर का आरोप लगाकर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते ही क्या हो गया है, जनता जानना चाहती है? रूस से अफगानिस्तान और वहां से दो घंटे के लिए मोदी के विमान का पाकिस्तान की सरजमी पर उतरने की असामान्य घटना हर भारतीयों के लिए चौंकाने वाली बात है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस समय पीठ में छुरा घोंपने जैसी घटना की आशंका भी जताई गई थी, जो सच निकली। कुछ ही दिन बाद पठानकोट में पाकिस्तानी दहशतगर्द एयरबेस पर हमला कर देते हैं। आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हो पाते पर हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं। 44 घंटे बाद अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास को भी निशाना बनाने की नाकाम कोशिश होती है। इस दौरान पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटता है। विरोधी पार्टियां मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे पर सवाल उठाती हैं। कुछ तो इसे यात्रा के बदले में उपहार बताकर आलोचना करती हैं। पर इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का रुख पाकिस्तान को लेकर सरकार के बदले नजरिए की ओर स्पष्‍ट संकेत दे रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और नवाज के बीच बढ़ी अचंभित कर देने वाली नजदीकी के निहितार्थ क्या हैं?
बड़ा सवाल यह है कि पठानकोट में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने एयरबेस पर हमले का दुस्साहस किया लेकिन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे तौर पर आलोचना से दूरी क्यों बनाई? उन्होंने मानवता के दुश्मनों की बात कह जवानों के जज्बे को सलाम किया। क्या मोदी और नवाज के बीच किसी दूसरी रणनीति पर चलने की रजामंदी हुई है? क्या दोनों नेता अब समझ चुके हैं कि ऐसे हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चा‌ह‌िए? लेकिन इस डील में ताे नुकसान हमारा है। उन जवानों के परिवारों को प्रधानमंत्री क्या सांत्वना देंगे जिनके आंसू थम नहीं रहे।
7 घरों के चिराग बुझ गए, देशवासी गुस्‍से में हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने फौरन अपने कथित दोस्त नवाज शरीफ को फोन कर विरोध जताना भी जरूरी नहीं समझा जबकि नातिन की शादी में नवाज के न्योते को पीएम ने बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लिया था। इसे भारत की विदेश नीति का बड़ा दिन भी बताया गया था क्योंकि इससे पहले तीन भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए थे। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों ने मोदी के इस रुख को वार्ता के लिहाज से अहम कदम करार दिया था। इसके बाद पठानकोट में हमला हो जाता है तो क्या इसे पाकिस्तान की वास्तविक सरकार यानी सेना और आईएसआई की बौखलाहट समझा जाए, जो नहीं चाहती कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व पर हावी रहने के लिए पाक फौज का भारत की ओर से खतरे का हौवा खड़ा करना जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी तय तारीख पर किसी भारतीय पीएम का पाक दौरे का कार्यक्रम बनता है सीमा पर गोले बरसते हैं और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मोदी का अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन का तोहफा देने लाहौर जाना सियासत की पिच पर मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। इससे न सिर्फ भारत की शांतिपूर्ण भावना दुनिया में एकबार फिर उभर कर सामने आई बल्कि इसने पाकिस्तान की सियासत में भी अचानक गर्माहट ला दी। पाकिस्तान में भी मोदी के चाहने वाले बढ़े। माना जा रहा है कि मोदी नवाज शरीफ को राजनीतिक तौर पर सशक्त देखना चाहते हैं। पाक फौज और आईएसआई के सामने नवाज के कद को बढ़ाने के लिए ही उन्होंने दुनिया के सामने कई बार पाक समकक्ष को काफी तवज्जो दी है। तो क्या जवानाें की जान की कीमत पर यह बदली हुई मोदी नीति है? पाकिस्तान में सियासतदानों का कद सेना से हमेशा छोटा ही रहा है। ऐसे में जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठता है उसे पहले सेना और फिर वहां के कट्टरपंथियों के आगे
झुकना पड़ता है। वह चाहकर भी भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में सोच नहीं पाता। बंटवारे के बाद से घटनाएं ही कुछ ऐसी हुईं कि सेना ने खुद को सियासी जमात से ऊपर कर लिया जिसे आजतक कोई भी वजीर-ए-आजम टस से मस नहीं कर सका।  नवाज शरीफ का एयरपोर्ट पर खड़े रहकर मोदी के आने का बेसब्री से इंतजार कर अगवानी करने का आखिर माजरा क्या है, यह सवाल भारत में न सही पाकिस्तान में दबी जुबान जरूर उठ रहा है।
हालांकि भारतीय नेतृत्व के ऐसे कदमों से जवानों का मनोबल जरूर कमजोर हुआ होगा। सीमा पर पाकिस्तान की गोलीबारी और घुसपैठ का जवाब देने के लिए डटे जवान अपनी जान न्योछावर करने में जरा भी नहीं हिचकते जबकि सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने को उत्सुक दिखाई दे रही है। तो क्या अब आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ चलने में कोई हर्ज नहीं है? जवानों की मौत पर सबसे गहरा दुख तो पत्नी, बच्चों और परिवार को होता है। देश उनके दुख में साथ जरूर खड़ा होता है पर राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी नई रणनीति में जवानों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा देश इस्राइल है जहां दो जवानों की मौत पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले शुरू हो जाते हैं। पूरी सरकार आक्रामक हो जाती है, ऐसे में जवानों को भी अपनी जान कीमती होने का अहसास होता होगा। पर शायद अपने देश में आम आदमी की छोड़िए, जवानों की भी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार और बिग हार

बिहार में
करारी हार पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। टीम शाह-मोदी नतीजों से कितना मायूस हुई है यह समझने के लिए जरा चुनाव नतीजे वाले दिन तमाम टीवी चैनलों पर पधारे भाजपा के प्रवक्ताओं के चेहरों को याद करिए। एंकर पूरे फार्म में थे उस दिन दनादन कंटीले और चुटीले शब्दों के बाण चलाए जा रहे थे। कौन कहता है असहिष्णुता बढ़ रही है? बेचारे प्रवक्ता तो सभी बाणों को मुस्कुराते हुए झेल रहे थे। कितने सहिष्णु दिख रहे थे, भाई वाह। पर दिल की टीस बनावटी मुस्कान से साफ झलक रही थी। संबित पात्रा जैसे मंझे हुए प्रवक्ता ने भी राहुल गांधी के तीखे हमले पर बस इतना कहा- आज उन बातों का जवाब देने का वक्त नहीं है। और तो और दिन भर सोशल मीडिया पर गजब की दलबदलू प्रवृत्ति देखी गई। खुद को कट्टर समर्थक बताने वाले भी पीएम के पुराने भाषण से कोई चर्चित बयान निकाल कर उसका माखौल उड़ाते नजर आ रहे थे। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया- अजी ये तो होना ही था, ये टीम इंडिया है टीम इंडिया। जो किसी भी मैच को रोमांचक ही नहीं बनाती बल्कि पहले हार जाए तो आगे जीतने की राह खुल जाती है। पर शायद महापुरुष यह भूल गए कि भाजपा को धूल चटाने वाला बिहार पहला प्रांत नहीं, दिल्ली ने तो इससे भी बुरे दिन दिखाए थे। अब तमाम राजनीतिक पंडित विश्लेषण कर रहे हैं कि आखिर भाजपा की हार के कारण क्या रहे।
दरअसल, जनता नेताओं में अपना पालनहार खोजती है। विकास करो या बेच खाओ पर सज्जनता झलकनी चाहिए। एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने घर-घर जाकर आम जनता से सीधे जुड़कर संवाद कायम किया और अपनी विकास पुरुष की छवि को बनाए रखा। वहीं भाजपा के नेताओं ने सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर डाल दी। अब पीएम साब विदेश से लौटे तब सीधा बिहार भागे। भाजपा की बड़ी भूल बिहार में सीएम प्रोजेक्ट न करना रही। हालांकि कुछ तर्क दिल्ली और बिहार भाजपा को लेकर यह भी है कि हो सकता है रणनीतिकारों ने किसी पर भरोसा ही न जताया हो। उन्हें लगा हो पीएम साब चुनाव जितवा दें बाद में किसी को भी सरकार चलाने को दे दिया जाएगा। बस यहीं चूक हो गई।
बिहार पिछड़ा भले है पर वहां के लोग राजनीतिक तौर पर दूसरे प्रांतों यहां तक कि यूपी से भी ज्यादा सशक्त सोच रखते हैं। जरा आसपास नजर दौड़ाइए, यूपी के गांवों में अखबार कितने घरों में आते हैं पर बिहार के गांवों में अखबारों के पाठक सबसे ज्यादा हैं। एक तरफ देश का प्रधानमंत्री बिहारियों से अनाम नेतृत्व के लिए वोट मांग रहा था तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार के दस साल के विकास की छवि मतदाताओं की आंख में बनी हुई थी।
मोदी ने इस बार सकारात्मक रूप से केवल विकास की बात की होती तो जनता को वादों में सच्चाई नजर भी आती पर वे तो उल्टे-सीधे जुमलों, बोरिंग संवादों और विपक्ष के कुछ हल्के नेताओं के बयानों के जवाब को ही चुनाव पेज की लीड बनाते गए। ग्रामीण जनता भी रंगीन पन्नों की तरह उड़नखटोले से उड़कर भारी तामझाम के साथ पहुंचे प्रधानमंत्री को देखने यूं ही चली जाती। भाजपावालों को लगता मोदी लहर पर यहां तो तूफान से पहले का सन्नाटा छाया हुआ था जिसे भांपने में बड़ी गलती हुई।
संघ प्रमुख, भाजपा अध्यक्ष से लेकर गिरि, साध्वी, योगी जैसे बड़े चेहरों ने टीवी पर अपने बयानों से ऐसा माहौल बनाया कि लगने लगा जैसे इनकी बात न मानने वाले सारे देशद्रोही मान लिए जाएंगे। असहिष्णुता जैसी कोई दूसरी बात थोड़े ही है। यह सब इनके मुंह से निकली जहरीली भाषा का ही दुष्परिणाम है। अब इनके लोग ही इन्हें सीख लेने की नसीहत देते फिर रहे हैं। पार्टी को बड़ी ही सहजता के साथ कथित घमंडी चोले को समझने और उतार फेंकने की जरूरत है। राष्ट्रवादी होना देशभक्ति की बात है पर हम ही ठीक बाकी सब गलत, ये भावना कम से कम नेताओं के पेशे से मेल नहीं खाती है।
एक बड़ी बात प्रचार के तरीके में भी रही जब बिहार में कोई नेतृत्व था ही नहीं तो किसी भी नेता ने खुद को जिम्मेदारी के खांचे में बांधा भी नहीं। सभी मोदी लहर में विधानसभा पहुंचने के दिवास्वप्न देखने लगे। दूसरी तरफ लालू के पास खोने को कुछ नहीं था, तो उन्होंने जीरो से शुरू किया जबकि नीतीश ने मोदी के ही पुराने रणनीतिकार की मदद से जबरदस्त माहौल बनाया। ये वही हैं जिनकी शानदार प्रचार प्रस्तुति ने लोकसभा चुनाव में जनता को मोदी का दीवाना बना दिया था। यकीन न हो तो नीतीश के प्रचार के लिए बनाया गया कोई एक एड सुन लीजिए यूट्यूब पर... शानदार जबरदस्त जिंदाबाद।
मोहन भागवत के आरक्षण के विवादित बयान से पहले जदयू-राजद के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था पर इसी बयान ने उन्हें बैठे बिठाए बीजेपी पर हावी कर दिया। बाद में पीएम ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। लालू ने यही मुद्दा उठा लिया और जनता को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वह आरक्षण ही नहीं पिछड़े और दलितों के अधिकारों पर कैंची चलने नहीं देंगे। एक तरह से मतदाता के इसी डर का फायदा उठा लिया महागठबंधन ने। शाह यह जातिगत समीकरण हल नहीं सके। ऊपर से स्थानीय नेताओं पर कम भरोसा और टिकट बंटवारे की रणनीति भी भाजपा की विफल ही रही।  वैसे बिहार चुनाव के परिणाम से नीतीश की कुर्सी भले बच गई पर फायदा तो लालू और सोनिया को ही हुआ। लालू ने अपना जनाधार फिर से मजबूत कर लिया और लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से वेंटिलेटर पर चल रही कांग्रेस को बिहार से संजीवनी मिल गई। अब यूपी में कांग्रेस से उम्मीदें बढ़ गई हैं। लालू भी राष्ट्रीय पटल पर सक्रियता बढ़ाएंगे।
अब क्या, यूपी समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा की रणनीति क्या होगी। जो भी हो, पर नेता अपना घमंड उतार फेंके और जमीनी हकीकत को समझते हुए समीकरण बनाएं तभी बात बनेगी अन्यथा बड़े-बड़े सूरमा हवा हो जाएंगे। चलिए अच्छा है अब पार्टी में ओवरहालिंग हो जाएगी। शत्रु और सिंह का क्या होगा, चैनलों में बड़ा कौतूहल है।
खैर, बहुत हो गया चुनाव। अब एक महत्वपूर्ण बात और आज की बात खत्म। लोकतंत्र में किसी एक पार्टी या नेता का राज्य के परिदृश्य से उभरकर देश और फिर सभी राज्यों को आसमान की तरह अपने आगोश में बटोरते जाना उनके समर्थकों के लिए भले ही ठीक हो पर आम जनमानस और लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं। अहम आ जाता है फिर जाता है जनता से ही। नमस्ते.... कुछ असहिष्णुता झलक आई हो तो माफी। 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बस इतना चाहते हैं सरकार...

कि आप बोलें, कुछ तो मुंह खोलें
आप हैं जो नहीं बोल रहे
बाकी सब बहुत बोल रहे

सब कह रहे, सब सुन रहे हम
देश को क्या हो गया है
माहौल खराब हो गया है

कोई कह रहा
संघ, शिवसेना वगैरह
हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर बढ़ रही आगे
किसी ने सम्मान लौटाया, तो किसी ने सवाल उठाया

पर हम डिगे नहीं
हमें यकीन है खुद पर देश पर और
सवा अरब भारतीयों की देशभक्ति, भाईचारे पर

फिर भी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था
इसीलिए आपसे करबद्ध निवेदन है
बस, बहुत हो गया
चुनाव तो जीते-हारे जाते हैं
देश की एकता पर चोट दुस्साहस है
उनका, जो गलत मंशा पाले हैं
इसीलिए हम कह रहे हैं अपना खास हो
या हो सहयोगी
कुछ कार्रवाई तो करिए
लगे, हां सरकार हमारे वैसा नहीं होने देंगे
जैसा कह कुछ लोग डरा और डर रहे हैं

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
हम सब इस देश के हैं और
यह देश हमारा है
अब तो दिखा दो हुजूर
... बस इतना ही चाहते हैं सरकार