रविवार, 21 फ़रवरी 2016

जेएनयू प्रकरण में थोड़ी समझ सबको दिखानी चाहिए थी


देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारत विरोधी नारेबाजी की दुस्साहसपूर्ण घटना के बाद देशभर में हो रहे प्रदर्शन और दो खेमों में लोगों के बंटने के बाद यह विश्लेषण जरूरी है कि
वास्तव में मीडिया, राजनेताओं और समाज के आम लोगों ने इस मामले को किस तरह से लिया। और क्या वह तरीका सही था। दो दिनों में मैंने दिल्ली में करीब एक दर्जन लोगों से बात कर इस ज्वलंत मुद्दे
पर उनके विचार जानने की कोशिश की।
आपको जानकर हैरानी होगी कि कोई भी मामले को गहराई से न समझा और न ही उसकी इसमें रुचि है। वो तो बस भड़क गया, एक उकसावे पर। मैं भी। सभी एकसुर में जेएनयू को अलगाववादियों का अड्डा और उसे बंद करने की भी बातें करने लग गए।
फौरन बाद ही विवाद ने सियासी चोला पहन लिया। सड़कें लाल और भगवा झंडे से पट गईं। यहां तिरंगे की बात नहीं करूंगा क्योंकि यह सियासत से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। मेरा मानना है कि
आपकी विचारधारा कोई भी हो, आपको मुबारक। पर देश, देश का झंडा, एकता-अखंडता के नाम पर पहले राष्ट्र की भावना की आपसे अपेक्षा की जाती है। कुछ लोग इसे जबरदस्ती संघी विचारधारा को
थोपना कह रहे हैं। यहां एक सवाल उठता है कि पार्टी पॉलिटिक्स और छात्र राजनीति में कोई अंतर है भी कि नहीं। नेताओं की सियासत का अड्डा विश्वविद्यालयों को बनने क्यों दिया जा रहा है। नेताओं और
पार्टियों के हितों को साधने का जरिया पढ़ने वाले छात्र न बनें इस बात का किसी को ख्याल है या नहीं। क्योंकि राजनीतिक लोग 24 घंटे सातों दिन बस सियासत करते हैं और पढ़ाई करने वालों को तो
भविष्य बनाना है, अपना और परिवार की रोजी-रोटी का जुगाड़ करना है। अब इस हंगामे के बाद नुकसान तो पढ़ने वालों का ही हो रहा है। जबकि चैनलों को दर्शक मिल रहे हैं। विश्लेषक अपना ज्ञान
बघार रहे हैं। अखबारों के पेज भर रहे हैं। पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही है। किसी का काम खराब हुआ तो वो सिर्फ और सिर्फ पढ़ने वाले हैं। हां जिन लोगों ने देशविरोधी जहर उगला उनके खिलाफ
कार्रवाई हो, यह पूरा देश चाहता है।
अब पीछे चलते हैं-
चैनलों पर दिखाए गए वीडियो को देख सभी में देशभक्ति की भावनाएं हावी हुई। होनी भी चाहिए, मैंने जब पहली बार सुना- भारत तेरे टुकड़े होंगे... यकीन मानिए तलवार और गोली की बात ही जेहन में कौंध गई। गुस्साए लोगों का ताप अपनी जगह जायज है। हां, देशभक्ति किसे कहते हैं इसमें भी सब की राय जुदा है। पर यहां तो एक वीडियो से लोगों को उकसाया गया। आप शायद अब भी न समझें होंगे
कि उकसाया कैसे गया। दरअसल नापाक हरकत की मंशा दो चार लोगों की थी, बाकी के लोग तो संघ और बीजेपी का विरोध करने के लिए जुटते चले गए जो विचारधारा में मतभेद की बात है। जोशीले
नारों के बीच ऐसा लगता है कि मास्टरमाइंड ने पांच- दस लोगों के सहयोग से कश्मीर और भारत विरोधी नारे लगाने शुरू कर दिए।
अब आपको एक पत्रकारिता की गूढ़ बात समझाता हूं। कश्मीर में जुमे की नमाज के बाद कुछ लोग अक्सर मस्जिद से आती भीड़ के आगे खड़े होकर पाकिस्तान या आजादी या फिर आईएसआईएस का
झंडा लहराते हैं और विरोधी नारे लगा देते हैं। विश्व मीडिया में गई तस्वीरों में लगता है मानों कश्मीर में बड़ा जुल्म हो रहा है और वहां बगावत की आंधी उमड़ रही है जबकि चंद लोग होते हैं जो यह विवाद
सुलगाए रखना चाहते हैं और इसमें आजादी जैसा कुछ नहीं सियासत साधने की मंशा रहती है। गरीबों, मजलूमों की फिक्र इन्हें नहीं होती। इसे कुछ भारतीय अखबारों और चैनलों ने समझा और इस
प्रोपगेंडा की कवरेज सीमित होती है या नहीं की जाती है। ऐसे में जेएनयू प्रकरण में भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सावधानी क्यों नहीं बरती। हम तो पूछेंगे, तेज, सर्वश्रेष्ठ, आपसे आगे चलने वालों ने उत्तेजक
और देश विरोधी बातों को सार्वजनिक क्यों कर दिया।
मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाक में भारत विरोधी बातें करता है तो अखबार के लोग भारत के खिलाफ उगला जहर से काम चलाते हैं। इस खबर को अक्षरश: लिखा भी जा सकता है लेकिन
यही तो आतंकी या अराजक तत्व चाहते हैं कि वे कुछ ऐसा करें कि विवाद खड़ा हो और जबरन सुर्खियां बने। हमें इनके मंसूबे को तोड़ना होगा।
आज का दौर टीवी का है। भारत में सोचने समझने की क्षमता रखने वाले जिस किसी भी शख्स के कानों में ऐसी देशविरोधी नारों की गूंज सुनाई देगी, उसका खून खौलेगा ही। इस मामले में भी विवाद के
तेजी से बढ़ने की यह प्रमुख वजह रही। पर क्या आग को हवा देने से पहले मीडिया ने सधी हुई रिपोर्टिंग की। अगर कल को कन्हैया के सभी विवादित वीडियो गलत निकले जैसा कि वामपंथी छात्र और
जेएनयू के लोग दावा कर रहे हैं तो क्या मीडिया संस्‍थानों के खिलाफ कार्रवाई होगी। अगर वीडियो सच भी निकलता है तो इस तरह खुलेआम देशविरोधी वीडियो को चैनलों पर प्रसारित कर देना क्या एक
उचित फैसला था। क्या चैनल वालों को यह पता नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया भयावह होगी। पर कड़वी सच्चाई है कि टीवी चैनल यही तो चाहते हैं कि विवाद हो और ज्यादा से ज्यादा दर्शक उनका चैनल
देखें। मेरा ऐसा मानना है कि टीवी मीडिया से रिपोर्टिंग में थोड़ी सी चूक हुई। अब कई फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी कन्हैया की बनाई जा रही है। जैसे सुप्रीम कोर्ट ने उसे देशद्रोही ठहरा दिया हो। बाकी गद्दार
कौन हैं और कहां हैं। उनकी धरपकड़ चल रही है।
कुछ दिन पहले जेएनयू के जानेमाने प्रोफेसर और साहित्यकार मकरंद परांजपे को सुनने का मौका मिला। विषय गांधी, अंबेडकर और नेहरू था पर जेएनयू विवाद ही छाया रहा। डॉ. परांजपे ने साफ कहा
कि जेएनयू में भारत विरोधी नारेबाजी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। इसका कोई समर्थन नहीं करता और पर पूरे मामले में दोनों पक्षों ने अहिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। he said please do not use
political weapon to protest. there are multiple type of intolerence. politics is कामधेनु in our country. Listening is an act of अहिंसा but in
this case कोई भी किसी की नहीं सुन रहा। लोग बस भड़क रहे हैं। मीडिया ट्रायल हो रहा है जबकि असली दोषी अभी गिरफ्त से बाहर हैं। बापू और अंबेडकर में भी मतभेद थे और सार्वजनिक तौर
पर थे लेकिन वे साथ-साथ रहते और काम करते थे। चिल्लाना, नारेबाजी भी एक प्रकार की हिंसा ही है। जेएनयू विवाद के राजनीतिकरण ने विचारधारा को मायावी बना दिया है। he said we
should be active not reactive. first understand, feel and then if very necessary speak.उन्होंने मामले को हैंडल करने के लिए दोनों पक्षों को गलत ठहराया।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले लोगों को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सच्चाई को सुनना और समझना चाहिए था और
सड़क पर उतरने वालों को कानून पर भरोसा रखना चाहिए।
इसी कार्यक्रम में सुविख्यात लेखक पद्मश्री एसएल भयरप्पा भी मौजूद थे। उन्होंने बड़ी ही कड़वी मगर सौ फीसदी सच बातें कहीं। इतिहास के पन्ने पलटते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने कुछ मुसलमानों को
भड़काया था कि हम चले गए तो हिंदू तुम पर राज करेंगे। इससे अच्छा है कि हमी शासन करें। उन्होंने मुसलमानों को इतना डरा दिया कि वे आजादी भूल अंग्रेजों को अपना हमदर्द मानने लगे और विद्रोह
कमजोर हुआ। आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वही रास्ता अपनाया। अंग्रेजों की तरह मुसलमानों को भड़काया कि हिंदू क्रूर हैं। ऐसे में देश को बांटकर राज करने की परंपरा अनवरत जारी रही। किसी ने
मुसलमानों को ये समझाने की कोशिश नहीं कि देश आपका है तो कोई आपसे जोर जबरदस्ती कैसे कर सकता है। यह पाकिस्तान नहीं भारत का लोकतंत्र है। नेताओं और पार्टियों ने मुसलमानों को
अल्पसंख्यक दर्जा दिलाया पढ़ने, रोजगार पाने या किसी कल्याणकारी कार्य के लिए नहीं धार्मिक पहचान दिलाने के लिए, जो उनका वोट बैंक बना। ऐसी राजनीति बंद होनी चाहिए।
वास्तव में जेएनयू को नेताओं ने अपना अखाड़ा बना लिया और इस अखाड़े को महिमामंडित किया मीडिया ने। कहा तो यह भी जा रहा है कि जेएनयू के जरिए भाजपा शैक्षिक संस्थानों पर पकड़ मजबूत
करना चाहती है तो दूसरी तरफ वामपंथी दल विधानसभा चुनावों के लिए दोबारा अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं सच क्या है पर इतना ता सबको समझना चाहिए कि
राजनीति जारी है।
बाकी चार लोगों के नारों से हिमालय पर पड़ी एक किलो बर्फ भी पिघलने वाली नहीं है टुकड़े ये क्या करेंगे देश के। नादान हैं या तो जीवन भर चक्की पीसेंगे या कहीं गोली खाकर टें हो जाएंगे। पर दोस्तों
थोड़ा सब्र कर लो। विरोध करो हिंसा नहीं।

बाकी अब तो उमर खालिद समेत देशद्रोह के 10 आरोपी भी कह रहे हैं कि वे देशविरोधी नहीं है। ये विश्वविद्यालयों की लड़ाई है। ऊपर वाला जाने जब सभी देश के हित में सोच रहे हैं तो टुकड़े होंगे इंशाल्लाह ----- के नारे कौन लगा रहा था। जांच का विषय है।

जय हिंद
#nationfirst

रविवार, 3 जनवरी 2016

नवाज से ये कैसी दोस्ती

पहले अचानक थाईलैंड में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं। कुछ ही दिन बात सुषमा स्वराज पाकिस्तान जाती हैं और फिर काबुल में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर कर मोदी पूरी दुनिया को अचंभित कर देते हैं। विपक्ष में रहते पाकिस्तान से लव लेटर का आरोप लगाकर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते ही क्या हो गया है, जनता जानना चाहती है? रूस से अफगानिस्तान और वहां से दो घंटे के लिए मोदी के विमान का पाकिस्तान की सरजमी पर उतरने की असामान्य घटना हर भारतीयों के लिए चौंकाने वाली बात है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस समय पीठ में छुरा घोंपने जैसी घटना की आशंका भी जताई गई थी, जो सच निकली। कुछ ही दिन बाद पठानकोट में पाकिस्तानी दहशतगर्द एयरबेस पर हमला कर देते हैं। आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हो पाते पर हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं। 44 घंटे बाद अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास को भी निशाना बनाने की नाकाम कोशिश होती है। इस दौरान पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटता है। विरोधी पार्टियां मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे पर सवाल उठाती हैं। कुछ तो इसे यात्रा के बदले में उपहार बताकर आलोचना करती हैं। पर इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का रुख पाकिस्तान को लेकर सरकार के बदले नजरिए की ओर स्पष्‍ट संकेत दे रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और नवाज के बीच बढ़ी अचंभित कर देने वाली नजदीकी के निहितार्थ क्या हैं?
बड़ा सवाल यह है कि पठानकोट में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने एयरबेस पर हमले का दुस्साहस किया लेकिन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे तौर पर आलोचना से दूरी क्यों बनाई? उन्होंने मानवता के दुश्मनों की बात कह जवानों के जज्बे को सलाम किया। क्या मोदी और नवाज के बीच किसी दूसरी रणनीति पर चलने की रजामंदी हुई है? क्या दोनों नेता अब समझ चुके हैं कि ऐसे हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चा‌ह‌िए? लेकिन इस डील में ताे नुकसान हमारा है। उन जवानों के परिवारों को प्रधानमंत्री क्या सांत्वना देंगे जिनके आंसू थम नहीं रहे।
7 घरों के चिराग बुझ गए, देशवासी गुस्‍से में हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने फौरन अपने कथित दोस्त नवाज शरीफ को फोन कर विरोध जताना भी जरूरी नहीं समझा जबकि नातिन की शादी में नवाज के न्योते को पीएम ने बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लिया था। इसे भारत की विदेश नीति का बड़ा दिन भी बताया गया था क्योंकि इससे पहले तीन भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए थे। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों ने मोदी के इस रुख को वार्ता के लिहाज से अहम कदम करार दिया था। इसके बाद पठानकोट में हमला हो जाता है तो क्या इसे पाकिस्तान की वास्तविक सरकार यानी सेना और आईएसआई की बौखलाहट समझा जाए, जो नहीं चाहती कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व पर हावी रहने के लिए पाक फौज का भारत की ओर से खतरे का हौवा खड़ा करना जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी तय तारीख पर किसी भारतीय पीएम का पाक दौरे का कार्यक्रम बनता है सीमा पर गोले बरसते हैं और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मोदी का अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन का तोहफा देने लाहौर जाना सियासत की पिच पर मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। इससे न सिर्फ भारत की शांतिपूर्ण भावना दुनिया में एकबार फिर उभर कर सामने आई बल्कि इसने पाकिस्तान की सियासत में भी अचानक गर्माहट ला दी। पाकिस्तान में भी मोदी के चाहने वाले बढ़े। माना जा रहा है कि मोदी नवाज शरीफ को राजनीतिक तौर पर सशक्त देखना चाहते हैं। पाक फौज और आईएसआई के सामने नवाज के कद को बढ़ाने के लिए ही उन्होंने दुनिया के सामने कई बार पाक समकक्ष को काफी तवज्जो दी है। तो क्या जवानाें की जान की कीमत पर यह बदली हुई मोदी नीति है? पाकिस्तान में सियासतदानों का कद सेना से हमेशा छोटा ही रहा है। ऐसे में जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठता है उसे पहले सेना और फिर वहां के कट्टरपंथियों के आगे
झुकना पड़ता है। वह चाहकर भी भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में सोच नहीं पाता। बंटवारे के बाद से घटनाएं ही कुछ ऐसी हुईं कि सेना ने खुद को सियासी जमात से ऊपर कर लिया जिसे आजतक कोई भी वजीर-ए-आजम टस से मस नहीं कर सका।  नवाज शरीफ का एयरपोर्ट पर खड़े रहकर मोदी के आने का बेसब्री से इंतजार कर अगवानी करने का आखिर माजरा क्या है, यह सवाल भारत में न सही पाकिस्तान में दबी जुबान जरूर उठ रहा है।
हालांकि भारतीय नेतृत्व के ऐसे कदमों से जवानों का मनोबल जरूर कमजोर हुआ होगा। सीमा पर पाकिस्तान की गोलीबारी और घुसपैठ का जवाब देने के लिए डटे जवान अपनी जान न्योछावर करने में जरा भी नहीं हिचकते जबकि सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने को उत्सुक दिखाई दे रही है। तो क्या अब आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ चलने में कोई हर्ज नहीं है? जवानों की मौत पर सबसे गहरा दुख तो पत्नी, बच्चों और परिवार को होता है। देश उनके दुख में साथ जरूर खड़ा होता है पर राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी नई रणनीति में जवानों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा देश इस्राइल है जहां दो जवानों की मौत पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले शुरू हो जाते हैं। पूरी सरकार आक्रामक हो जाती है, ऐसे में जवानों को भी अपनी जान कीमती होने का अहसास होता होगा। पर शायद अपने देश में आम आदमी की छोड़िए, जवानों की भी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार और बिग हार

बिहार में
करारी हार पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। टीम शाह-मोदी नतीजों से कितना मायूस हुई है यह समझने के लिए जरा चुनाव नतीजे वाले दिन तमाम टीवी चैनलों पर पधारे भाजपा के प्रवक्ताओं के चेहरों को याद करिए। एंकर पूरे फार्म में थे उस दिन दनादन कंटीले और चुटीले शब्दों के बाण चलाए जा रहे थे। कौन कहता है असहिष्णुता बढ़ रही है? बेचारे प्रवक्ता तो सभी बाणों को मुस्कुराते हुए झेल रहे थे। कितने सहिष्णु दिख रहे थे, भाई वाह। पर दिल की टीस बनावटी मुस्कान से साफ झलक रही थी। संबित पात्रा जैसे मंझे हुए प्रवक्ता ने भी राहुल गांधी के तीखे हमले पर बस इतना कहा- आज उन बातों का जवाब देने का वक्त नहीं है। और तो और दिन भर सोशल मीडिया पर गजब की दलबदलू प्रवृत्ति देखी गई। खुद को कट्टर समर्थक बताने वाले भी पीएम के पुराने भाषण से कोई चर्चित बयान निकाल कर उसका माखौल उड़ाते नजर आ रहे थे। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया- अजी ये तो होना ही था, ये टीम इंडिया है टीम इंडिया। जो किसी भी मैच को रोमांचक ही नहीं बनाती बल्कि पहले हार जाए तो आगे जीतने की राह खुल जाती है। पर शायद महापुरुष यह भूल गए कि भाजपा को धूल चटाने वाला बिहार पहला प्रांत नहीं, दिल्ली ने तो इससे भी बुरे दिन दिखाए थे। अब तमाम राजनीतिक पंडित विश्लेषण कर रहे हैं कि आखिर भाजपा की हार के कारण क्या रहे।
दरअसल, जनता नेताओं में अपना पालनहार खोजती है। विकास करो या बेच खाओ पर सज्जनता झलकनी चाहिए। एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने घर-घर जाकर आम जनता से सीधे जुड़कर संवाद कायम किया और अपनी विकास पुरुष की छवि को बनाए रखा। वहीं भाजपा के नेताओं ने सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर डाल दी। अब पीएम साब विदेश से लौटे तब सीधा बिहार भागे। भाजपा की बड़ी भूल बिहार में सीएम प्रोजेक्ट न करना रही। हालांकि कुछ तर्क दिल्ली और बिहार भाजपा को लेकर यह भी है कि हो सकता है रणनीतिकारों ने किसी पर भरोसा ही न जताया हो। उन्हें लगा हो पीएम साब चुनाव जितवा दें बाद में किसी को भी सरकार चलाने को दे दिया जाएगा। बस यहीं चूक हो गई।
बिहार पिछड़ा भले है पर वहां के लोग राजनीतिक तौर पर दूसरे प्रांतों यहां तक कि यूपी से भी ज्यादा सशक्त सोच रखते हैं। जरा आसपास नजर दौड़ाइए, यूपी के गांवों में अखबार कितने घरों में आते हैं पर बिहार के गांवों में अखबारों के पाठक सबसे ज्यादा हैं। एक तरफ देश का प्रधानमंत्री बिहारियों से अनाम नेतृत्व के लिए वोट मांग रहा था तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार के दस साल के विकास की छवि मतदाताओं की आंख में बनी हुई थी।
मोदी ने इस बार सकारात्मक रूप से केवल विकास की बात की होती तो जनता को वादों में सच्चाई नजर भी आती पर वे तो उल्टे-सीधे जुमलों, बोरिंग संवादों और विपक्ष के कुछ हल्के नेताओं के बयानों के जवाब को ही चुनाव पेज की लीड बनाते गए। ग्रामीण जनता भी रंगीन पन्नों की तरह उड़नखटोले से उड़कर भारी तामझाम के साथ पहुंचे प्रधानमंत्री को देखने यूं ही चली जाती। भाजपावालों को लगता मोदी लहर पर यहां तो तूफान से पहले का सन्नाटा छाया हुआ था जिसे भांपने में बड़ी गलती हुई।
संघ प्रमुख, भाजपा अध्यक्ष से लेकर गिरि, साध्वी, योगी जैसे बड़े चेहरों ने टीवी पर अपने बयानों से ऐसा माहौल बनाया कि लगने लगा जैसे इनकी बात न मानने वाले सारे देशद्रोही मान लिए जाएंगे। असहिष्णुता जैसी कोई दूसरी बात थोड़े ही है। यह सब इनके मुंह से निकली जहरीली भाषा का ही दुष्परिणाम है। अब इनके लोग ही इन्हें सीख लेने की नसीहत देते फिर रहे हैं। पार्टी को बड़ी ही सहजता के साथ कथित घमंडी चोले को समझने और उतार फेंकने की जरूरत है। राष्ट्रवादी होना देशभक्ति की बात है पर हम ही ठीक बाकी सब गलत, ये भावना कम से कम नेताओं के पेशे से मेल नहीं खाती है।
एक बड़ी बात प्रचार के तरीके में भी रही जब बिहार में कोई नेतृत्व था ही नहीं तो किसी भी नेता ने खुद को जिम्मेदारी के खांचे में बांधा भी नहीं। सभी मोदी लहर में विधानसभा पहुंचने के दिवास्वप्न देखने लगे। दूसरी तरफ लालू के पास खोने को कुछ नहीं था, तो उन्होंने जीरो से शुरू किया जबकि नीतीश ने मोदी के ही पुराने रणनीतिकार की मदद से जबरदस्त माहौल बनाया। ये वही हैं जिनकी शानदार प्रचार प्रस्तुति ने लोकसभा चुनाव में जनता को मोदी का दीवाना बना दिया था। यकीन न हो तो नीतीश के प्रचार के लिए बनाया गया कोई एक एड सुन लीजिए यूट्यूब पर... शानदार जबरदस्त जिंदाबाद।
मोहन भागवत के आरक्षण के विवादित बयान से पहले जदयू-राजद के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था पर इसी बयान ने उन्हें बैठे बिठाए बीजेपी पर हावी कर दिया। बाद में पीएम ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। लालू ने यही मुद्दा उठा लिया और जनता को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वह आरक्षण ही नहीं पिछड़े और दलितों के अधिकारों पर कैंची चलने नहीं देंगे। एक तरह से मतदाता के इसी डर का फायदा उठा लिया महागठबंधन ने। शाह यह जातिगत समीकरण हल नहीं सके। ऊपर से स्थानीय नेताओं पर कम भरोसा और टिकट बंटवारे की रणनीति भी भाजपा की विफल ही रही।  वैसे बिहार चुनाव के परिणाम से नीतीश की कुर्सी भले बच गई पर फायदा तो लालू और सोनिया को ही हुआ। लालू ने अपना जनाधार फिर से मजबूत कर लिया और लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से वेंटिलेटर पर चल रही कांग्रेस को बिहार से संजीवनी मिल गई। अब यूपी में कांग्रेस से उम्मीदें बढ़ गई हैं। लालू भी राष्ट्रीय पटल पर सक्रियता बढ़ाएंगे।
अब क्या, यूपी समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा की रणनीति क्या होगी। जो भी हो, पर नेता अपना घमंड उतार फेंके और जमीनी हकीकत को समझते हुए समीकरण बनाएं तभी बात बनेगी अन्यथा बड़े-बड़े सूरमा हवा हो जाएंगे। चलिए अच्छा है अब पार्टी में ओवरहालिंग हो जाएगी। शत्रु और सिंह का क्या होगा, चैनलों में बड़ा कौतूहल है।
खैर, बहुत हो गया चुनाव। अब एक महत्वपूर्ण बात और आज की बात खत्म। लोकतंत्र में किसी एक पार्टी या नेता का राज्य के परिदृश्य से उभरकर देश और फिर सभी राज्यों को आसमान की तरह अपने आगोश में बटोरते जाना उनके समर्थकों के लिए भले ही ठीक हो पर आम जनमानस और लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं। अहम आ जाता है फिर जाता है जनता से ही। नमस्ते.... कुछ असहिष्णुता झलक आई हो तो माफी। 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बस इतना चाहते हैं सरकार...

कि आप बोलें, कुछ तो मुंह खोलें
आप हैं जो नहीं बोल रहे
बाकी सब बहुत बोल रहे

सब कह रहे, सब सुन रहे हम
देश को क्या हो गया है
माहौल खराब हो गया है

कोई कह रहा
संघ, शिवसेना वगैरह
हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर बढ़ रही आगे
किसी ने सम्मान लौटाया, तो किसी ने सवाल उठाया

पर हम डिगे नहीं
हमें यकीन है खुद पर देश पर और
सवा अरब भारतीयों की देशभक्ति, भाईचारे पर

फिर भी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था
इसीलिए आपसे करबद्ध निवेदन है
बस, बहुत हो गया
चुनाव तो जीते-हारे जाते हैं
देश की एकता पर चोट दुस्साहस है
उनका, जो गलत मंशा पाले हैं
इसीलिए हम कह रहे हैं अपना खास हो
या हो सहयोगी
कुछ कार्रवाई तो करिए
लगे, हां सरकार हमारे वैसा नहीं होने देंगे
जैसा कह कुछ लोग डरा और डर रहे हैं

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
हम सब इस देश के हैं और
यह देश हमारा है
अब तो दिखा दो हुजूर
... बस इतना ही चाहते हैं सरकार

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भावनाओं को समझो

बचपन से ही मैंने अपने घर में भोजन से पहले एक रोटी, थोड़ा चावल, सब्जी, दाल व रायते का भी एक अंश थाली से बाहर निकालने की परंपरा देखी है। पिताजी के भोग लगाने के बाद झट से मेरी या छोटे भाई की ड्यूटी रहती थी कि लो, इसे गऊ माता को खिला के आओ। मैं कम ही तैयार होता क्यूंकि मुझे डर लगता था। दरअसल गाय-भैंस के नजदीक जाने पर अक्सर वे अपनी सिंगों को आपकी तरफ कर देती हैं। इतने में तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। यही नहीं, पिता जी का सख्त निर्देश था कि रोटी हाथ से खिलाई जाएगी, जमीन पर रखकर या हौदे में डालकर नहीं। मुझे डर था कि ‌खिलाते समय गाय मेरी उंगली न चबा ले। एक और महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना चाहूंगा। मेरे गांव में एक खास वर्ग के कुछ लोगों को गाय बेचने पर अघोषित पाबंदी थी। हमें डर होता था कि ज्यादा पैसे कमाने के लिए शायद वे जानवरों को कसाई को बेचते थे।

अब बात करते हैं चुनावी मौसम में बीफ विवाद की। जन्म देने वाली मां के अलावा हिंदू धर्म में धरती, गऊ और तुलसी को भी माता का दर्जा हासिल है। तो इस बात में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह तो आस्था की बात है और जहां आस्‍था होती है वहां पत्‍‌थर में भगवान दिखते हैं, काबा में अल्लाह और गिरजाघर में जीसस क्राइस्ट। ऐसे में 5000 साल से चली आ रही सनातन परंपरा को बेहतर तरीके से पेश करना जरूरी है, जिसका अभाव दिखता है। गोमांस के आरोप में नोएडा के एक गांव में एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या को किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद देशभर में गोमांस की अफवाह या भड़काऊ भाषणों ने ऐसा माहौल तैयार किया, जो भारत की शांतिपूर्ण समभाव वाली संस्कृति के बिल्कुल उलट है। एक तबका खुद को मॉडर्न ख्याल का बताते हुए खुलेआम गोमांस खाने की छूट चाहता है तो दूसरा समूह उनका है जो खुद को हिंदुओं के स्वघोषित लंबरदार और गऊ माता के पालनहार साबित करने में जुटे हैं। इन सबके बीच वो हिंदू नदारद हैं जो बरसों से मुसलमानों के घर ईद की सेवईंया खाते आ रहे हैं और वे मुस्लिम भी नहीं जो हिंदू के घर बड़े शानोशौकत से समारोह में शरीक होते हैं। तो कौन हैं ये लोग? हम क्यों भड़क जाते हैं इनकी बेतुकी बातों से? यह सवाल हिंदुओं ही नहीं मुसलमानों को भी अपने आप से करना चाहिए। अच्छा होता इस जघन्य अपराध के बाद हालात को संभालने का काम किया गया होता पर नहीं, बिसाहड़ा में राजनेताओं की बाढ़ ऐसे आई जैसे जितने ज्यादा नेता आएंगे उतनी जल्दी इकलाख वापस आ जाएगा।

 दरअसल, गोमांस खाने, न खाने का विवाद तो है ही नहीं। विवाद एक दूसरे पर अपनी बात को थोपने का है। कोई अपने घर में क्या खाता है उससे किसी को क्‍या लेना देना लेकिन अगर आप खुलेआम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए गोमांस खाने की छूट मांगेंगे तो माहौल तो बिगड़ेगा ही। तरह-तरह के तर्क रखे जा रहे हैं। ऋषि-मुनि भी मांस खाते थे, वगैरह-वगैरह। अब जरा अपने दिमाग पर जोर डालिए, ऋषियों के समय क्या दाल-चावल, शाही पनीर, आलू की भुजिया या फिर कोफ्ता का प्रचलन था। अगर नहीं तो खानाबदोश जीवन में लोगों के लिए मांस ही आहार का मुख्य साधन था। लेकिन जब तुलसीदास जैसे ज्ञानियों ने रचनाएं की तो उन्होंने उन घटनाओं को दूर रखा जो उस समय के समाज से मेल न खाती हो पर पहले से चली आ रही हो। इसीलिए वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी कुछ अंतर देखने को मिलता है। जैसे-जैसे शास्‍त्र लिखे गए, उनमें सनातन परंपरा का भी उद्धरण पंक्तिबद्ध किया गया। क्या उस दौर और आज के युग की समानता करना उचित है? अगर आपके बगल में कोई परिवार गाय की हर रोज पूजा करता है तो क्या उसे यह बर्दाश्त होगा कि कोई उसी गाय को मार के खा जाए। अब लोग दक्षिण भारत या फिर नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण दे रहे हैं। अरे भैया, जैसा देश वैसा भेष... यहां देश का मतलब वह इलाका है जहां हम रहते हैं।
दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों में गायों को काटा जा रहा है, भारत के हिंदू उन देशों में रोक की मांग करते तो स्वतंत्रता का सवाल बनता। अपने देश में जानवर का मांस ही खाना है तो करीब 30 करोड़ जानवरों की आबादी है एक को छोड़कर खाते रहिए। गोमांस के एक समर्थक ने कहीं लिखा कि गरीबों के लिए जरूरी पोषण का यह मुख्य स्रोत है। हमें ऐसे लोगों की समझ को बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। भाई साब, गाय को मार के खा जाएंगे कितने दिन चलेगा? उसी गाय को घर में पालिए, रोज दूध, दही खाएंगे तो पोषण नहीं मिलेगा क्या? आजकल तो पशुपालन के लिए सरकार लोन भी दे रही है।

खैर, मैं किसी को कुछ भी खाने से रोक नहीं रहा न तो रोक सकता हूं और जिसे रोका नहीं जा सकता उस पर पों पों करना कोरा बकवास है। मेरा जोर बस एक बात पर है कि अगर आस्‍था है तो भावनाएं हैं और भावनाएं हैं तो वो आहत भी हो सकती हैं। हमें इसका ख्याल रखना चाहिए। कुछ लोग डॉ. अंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि ऋगवेद में लिखा है कि उस समय लोग गाय का मांस खाते थे। यानी गाय को पूज्यनीय मानने से पहले ब्राह्मण भी गोमांस से परहेज नहीं करते थे। ठीक बात है, पर ये बताइए उस समय कबायली या खानाबदोश जीवन में मांस के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी था क्या? ये किसी ने न बताया न लिखा।
इकलाख को क्यूं और किसने मारा यह तो जांच में सामने आएगा पर लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है। बिहार चुनाव से ठीक पहले सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने या ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति तो नहीं है? इसकी भी जांच होनी चाहिए।

कश्मीर के इंजीनियर रशीद हों या केरल का कोई ब्राह्मण संपादक, अगर आप गाय का मांस खाना चाहते हैं तो बेझिझक खाएं पर इस एहतियात के साथ कि इसी देश में आपके ही मुहल्ले में कुछ लोगों को यह गंवारा नहीं है। स्लॉटर हाउस केवल मुस्लिम भाई के ही हैं ऐसा भी नहीं है। मुद्दा बस एक है भावनाओं को समझो। हमें एक बात और समझनी होगी कि ऐसे वाकये हमारी भाईचारे की पहचान को कलंकित करते हैं। नमस्ते लंदन के उस सीन को याद ‌कीजिए जब अक्षय कुमार कहते हैं कि हम उस देश से आते हैं जहां एक कैथोलिक सिख के लिए पीएम की कुर्सी छोड़ देती है और सिख एक मुस्लिम राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है। उस समय हमारा माथा फक्र से ऊंचा हो उठता है।

बेशक आप मेरी बातों की मुखालफत कर सकते हैं। कट्टर, संघी या फिर कुछ और कह सकते हैं अनुरोध बस इतना है कि फिर से ऐसा माहौल बनाइए कि बिसाहड़ा में किसी इशरार के घर कोई अनुराग सेवईं खाने को बेझिझक जाए और श्याम के घर पार्टी में शरीफ भी बेखौफ पहुंचे।