रविवार, 3 जनवरी 2016

नवाज से ये कैसी दोस्ती

पहले अचानक थाईलैंड में भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं। कुछ ही दिन बात सुषमा स्वराज पाकिस्तान जाती हैं और फिर काबुल में ब्रेकफास्ट, लाहौर में लंच और दिल्ली में डिनर कर मोदी पूरी दुनिया को अचंभित कर देते हैं। विपक्ष में रहते पाकिस्तान से लव लेटर का आरोप लगाकर कांग्रेस सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते ही क्या हो गया है, जनता जानना चाहती है? रूस से अफगानिस्तान और वहां से दो घंटे के लिए मोदी के विमान का पाकिस्तान की सरजमी पर उतरने की असामान्य घटना हर भारतीयों के लिए चौंकाने वाली बात है। इतिहास के पन्नों को पलटते हुए उस समय पीठ में छुरा घोंपने जैसी घटना की आशंका भी जताई गई थी, जो सच निकली। कुछ ही दिन बाद पठानकोट में पाकिस्तानी दहशतगर्द एयरबेस पर हमला कर देते हैं। आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब तो नहीं हो पाते पर हमारे 7 जवान शहीद हो जाते हैं। 44 घंटे बाद अफगानिस्तान में भारतीय वाणिज्य दूतावास को भी निशाना बनाने की नाकाम कोशिश होती है। इस दौरान पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा फूटता है। विरोधी पार्टियां मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे पर सवाल उठाती हैं। कुछ तो इसे यात्रा के बदले में उपहार बताकर आलोचना करती हैं। पर इस पूरे घटनाक्रम में प्रधानमंत्री मोदी का रुख पाकिस्तान को लेकर सरकार के बदले नजरिए की ओर स्पष्‍ट संकेत दे रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मोदी और नवाज के बीच बढ़ी अचंभित कर देने वाली नजदीकी के निहितार्थ क्या हैं?
बड़ा सवाल यह है कि पठानकोट में पाकिस्तान से आए आतंकियों ने एयरबेस पर हमले का दुस्साहस किया लेकिन प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के खिलाफ सीधे तौर पर आलोचना से दूरी क्यों बनाई? उन्होंने मानवता के दुश्मनों की बात कह जवानों के जज्बे को सलाम किया। क्या मोदी और नवाज के बीच किसी दूसरी रणनीति पर चलने की रजामंदी हुई है? क्या दोनों नेता अब समझ चुके हैं कि ऐसे हमलों के बावजूद बातचीत के रास्ते बंद नहीं होने चा‌ह‌िए? लेकिन इस डील में ताे नुकसान हमारा है। उन जवानों के परिवारों को प्रधानमंत्री क्या सांत्वना देंगे जिनके आंसू थम नहीं रहे।
7 घरों के चिराग बुझ गए, देशवासी गुस्‍से में हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने फौरन अपने कथित दोस्त नवाज शरीफ को फोन कर विरोध जताना भी जरूरी नहीं समझा जबकि नातिन की शादी में नवाज के न्योते को पीएम ने बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लिया था। इसे भारत की विदेश नीति का बड़ा दिन भी बताया गया था क्योंकि इससे पहले तीन भारतीय प्रधानमंत्री ही पाकिस्तान गए थे। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों ने मोदी के इस रुख को वार्ता के लिहाज से अहम कदम करार दिया था। इसके बाद पठानकोट में हमला हो जाता है तो क्या इसे पाकिस्तान की वास्तविक सरकार यानी सेना और आईएसआई की बौखलाहट समझा जाए, जो नहीं चाहती कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व पर हावी रहने के लिए पाक फौज का भारत की ओर से खतरे का हौवा खड़ा करना जरूरी है।
इतिहास गवाह है कि जब भी तय तारीख पर किसी भारतीय पीएम का पाक दौरे का कार्यक्रम बनता है सीमा पर गोले बरसते हैं और माहौल तनावपूर्ण हो जाता है। ऐसे में मोदी का अचानक नवाज शरीफ को जन्मदिन का तोहफा देने लाहौर जाना सियासत की पिच पर मास्टरस्ट्रोक भी माना जा रहा है। इससे न सिर्फ भारत की शांतिपूर्ण भावना दुनिया में एकबार फिर उभर कर सामने आई बल्कि इसने पाकिस्तान की सियासत में भी अचानक गर्माहट ला दी। पाकिस्तान में भी मोदी के चाहने वाले बढ़े। माना जा रहा है कि मोदी नवाज शरीफ को राजनीतिक तौर पर सशक्त देखना चाहते हैं। पाक फौज और आईएसआई के सामने नवाज के कद को बढ़ाने के लिए ही उन्होंने दुनिया के सामने कई बार पाक समकक्ष को काफी तवज्जो दी है। तो क्या जवानाें की जान की कीमत पर यह बदली हुई मोदी नीति है? पाकिस्तान में सियासतदानों का कद सेना से हमेशा छोटा ही रहा है। ऐसे में जो भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठता है उसे पहले सेना और फिर वहां के कट्टरपंथियों के आगे
झुकना पड़ता है। वह चाहकर भी भारत से रिश्ते सुधारने के बारे में सोच नहीं पाता। बंटवारे के बाद से घटनाएं ही कुछ ऐसी हुईं कि सेना ने खुद को सियासी जमात से ऊपर कर लिया जिसे आजतक कोई भी वजीर-ए-आजम टस से मस नहीं कर सका।  नवाज शरीफ का एयरपोर्ट पर खड़े रहकर मोदी के आने का बेसब्री से इंतजार कर अगवानी करने का आखिर माजरा क्या है, यह सवाल भारत में न सही पाकिस्तान में दबी जुबान जरूर उठ रहा है।
हालांकि भारतीय नेतृत्व के ऐसे कदमों से जवानों का मनोबल जरूर कमजोर हुआ होगा। सीमा पर पाकिस्तान की गोलीबारी और घुसपैठ का जवाब देने के लिए डटे जवान अपनी जान न्योछावर करने में जरा भी नहीं हिचकते जबकि सरकार पाकिस्तान के साथ बातचीत करने को उत्सुक दिखाई दे रही है। तो क्या अब आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ चलने में कोई हर्ज नहीं है? जवानों की मौत पर सबसे गहरा दुख तो पत्नी, बच्चों और परिवार को होता है। देश उनके दुख में साथ जरूर खड़ा होता है पर राजनीतिक नेतृत्व को भी अपनी नई रणनीति में जवानों की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। एक छोटा सा देश इस्राइल है जहां दो जवानों की मौत पर ताबड़तोड़ जवाबी हमले शुरू हो जाते हैं। पूरी सरकार आक्रामक हो जाती है, ऐसे में जवानों को भी अपनी जान कीमती होने का अहसास होता होगा। पर शायद अपने देश में आम आदमी की छोड़िए, जवानों की भी जान की कोई कीमत नहीं है। सरकार को इस दिशा में सोचना होगा। 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

बिहार और बिग हार

बिहार में
करारी हार पर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। टीम शाह-मोदी नतीजों से कितना मायूस हुई है यह समझने के लिए जरा चुनाव नतीजे वाले दिन तमाम टीवी चैनलों पर पधारे भाजपा के प्रवक्ताओं के चेहरों को याद करिए। एंकर पूरे फार्म में थे उस दिन दनादन कंटीले और चुटीले शब्दों के बाण चलाए जा रहे थे। कौन कहता है असहिष्णुता बढ़ रही है? बेचारे प्रवक्ता तो सभी बाणों को मुस्कुराते हुए झेल रहे थे। कितने सहिष्णु दिख रहे थे, भाई वाह। पर दिल की टीस बनावटी मुस्कान से साफ झलक रही थी। संबित पात्रा जैसे मंझे हुए प्रवक्ता ने भी राहुल गांधी के तीखे हमले पर बस इतना कहा- आज उन बातों का जवाब देने का वक्त नहीं है। और तो और दिन भर सोशल मीडिया पर गजब की दलबदलू प्रवृत्ति देखी गई। खुद को कट्टर समर्थक बताने वाले भी पीएम के पुराने भाषण से कोई चर्चित बयान निकाल कर उसका माखौल उड़ाते नजर आ रहे थे। एक सज्जन ने तो यहां तक कह दिया- अजी ये तो होना ही था, ये टीम इंडिया है टीम इंडिया। जो किसी भी मैच को रोमांचक ही नहीं बनाती बल्कि पहले हार जाए तो आगे जीतने की राह खुल जाती है। पर शायद महापुरुष यह भूल गए कि भाजपा को धूल चटाने वाला बिहार पहला प्रांत नहीं, दिल्ली ने तो इससे भी बुरे दिन दिखाए थे। अब तमाम राजनीतिक पंडित विश्लेषण कर रहे हैं कि आखिर भाजपा की हार के कारण क्या रहे।
दरअसल, जनता नेताओं में अपना पालनहार खोजती है। विकास करो या बेच खाओ पर सज्जनता झलकनी चाहिए। एक तरफ जहां नीतीश कुमार ने घर-घर जाकर आम जनता से सीधे जुड़कर संवाद कायम किया और अपनी विकास पुरुष की छवि को बनाए रखा। वहीं भाजपा के नेताओं ने सारी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के कंधों पर डाल दी। अब पीएम साब विदेश से लौटे तब सीधा बिहार भागे। भाजपा की बड़ी भूल बिहार में सीएम प्रोजेक्ट न करना रही। हालांकि कुछ तर्क दिल्ली और बिहार भाजपा को लेकर यह भी है कि हो सकता है रणनीतिकारों ने किसी पर भरोसा ही न जताया हो। उन्हें लगा हो पीएम साब चुनाव जितवा दें बाद में किसी को भी सरकार चलाने को दे दिया जाएगा। बस यहीं चूक हो गई।
बिहार पिछड़ा भले है पर वहां के लोग राजनीतिक तौर पर दूसरे प्रांतों यहां तक कि यूपी से भी ज्यादा सशक्त सोच रखते हैं। जरा आसपास नजर दौड़ाइए, यूपी के गांवों में अखबार कितने घरों में आते हैं पर बिहार के गांवों में अखबारों के पाठक सबसे ज्यादा हैं। एक तरफ देश का प्रधानमंत्री बिहारियों से अनाम नेतृत्व के लिए वोट मांग रहा था तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार के दस साल के विकास की छवि मतदाताओं की आंख में बनी हुई थी।
मोदी ने इस बार सकारात्मक रूप से केवल विकास की बात की होती तो जनता को वादों में सच्चाई नजर भी आती पर वे तो उल्टे-सीधे जुमलों, बोरिंग संवादों और विपक्ष के कुछ हल्के नेताओं के बयानों के जवाब को ही चुनाव पेज की लीड बनाते गए। ग्रामीण जनता भी रंगीन पन्नों की तरह उड़नखटोले से उड़कर भारी तामझाम के साथ पहुंचे प्रधानमंत्री को देखने यूं ही चली जाती। भाजपावालों को लगता मोदी लहर पर यहां तो तूफान से पहले का सन्नाटा छाया हुआ था जिसे भांपने में बड़ी गलती हुई।
संघ प्रमुख, भाजपा अध्यक्ष से लेकर गिरि, साध्वी, योगी जैसे बड़े चेहरों ने टीवी पर अपने बयानों से ऐसा माहौल बनाया कि लगने लगा जैसे इनकी बात न मानने वाले सारे देशद्रोही मान लिए जाएंगे। असहिष्णुता जैसी कोई दूसरी बात थोड़े ही है। यह सब इनके मुंह से निकली जहरीली भाषा का ही दुष्परिणाम है। अब इनके लोग ही इन्हें सीख लेने की नसीहत देते फिर रहे हैं। पार्टी को बड़ी ही सहजता के साथ कथित घमंडी चोले को समझने और उतार फेंकने की जरूरत है। राष्ट्रवादी होना देशभक्ति की बात है पर हम ही ठीक बाकी सब गलत, ये भावना कम से कम नेताओं के पेशे से मेल नहीं खाती है।
एक बड़ी बात प्रचार के तरीके में भी रही जब बिहार में कोई नेतृत्व था ही नहीं तो किसी भी नेता ने खुद को जिम्मेदारी के खांचे में बांधा भी नहीं। सभी मोदी लहर में विधानसभा पहुंचने के दिवास्वप्न देखने लगे। दूसरी तरफ लालू के पास खोने को कुछ नहीं था, तो उन्होंने जीरो से शुरू किया जबकि नीतीश ने मोदी के ही पुराने रणनीतिकार की मदद से जबरदस्त माहौल बनाया। ये वही हैं जिनकी शानदार प्रचार प्रस्तुति ने लोकसभा चुनाव में जनता को मोदी का दीवाना बना दिया था। यकीन न हो तो नीतीश के प्रचार के लिए बनाया गया कोई एक एड सुन लीजिए यूट्यूब पर... शानदार जबरदस्त जिंदाबाद।
मोहन भागवत के आरक्षण के विवादित बयान से पहले जदयू-राजद के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था पर इसी बयान ने उन्हें बैठे बिठाए बीजेपी पर हावी कर दिया। बाद में पीएम ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की पर तब तक काफी देर हो चुकी थी। लालू ने यही मुद्दा उठा लिया और जनता को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि वह आरक्षण ही नहीं पिछड़े और दलितों के अधिकारों पर कैंची चलने नहीं देंगे। एक तरह से मतदाता के इसी डर का फायदा उठा लिया महागठबंधन ने। शाह यह जातिगत समीकरण हल नहीं सके। ऊपर से स्थानीय नेताओं पर कम भरोसा और टिकट बंटवारे की रणनीति भी भाजपा की विफल ही रही।  वैसे बिहार चुनाव के परिणाम से नीतीश की कुर्सी भले बच गई पर फायदा तो लालू और सोनिया को ही हुआ। लालू ने अपना जनाधार फिर से मजबूत कर लिया और लोकसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से वेंटिलेटर पर चल रही कांग्रेस को बिहार से संजीवनी मिल गई। अब यूपी में कांग्रेस से उम्मीदें बढ़ गई हैं। लालू भी राष्ट्रीय पटल पर सक्रियता बढ़ाएंगे।
अब क्या, यूपी समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों में भाजपा की रणनीति क्या होगी। जो भी हो, पर नेता अपना घमंड उतार फेंके और जमीनी हकीकत को समझते हुए समीकरण बनाएं तभी बात बनेगी अन्यथा बड़े-बड़े सूरमा हवा हो जाएंगे। चलिए अच्छा है अब पार्टी में ओवरहालिंग हो जाएगी। शत्रु और सिंह का क्या होगा, चैनलों में बड़ा कौतूहल है।
खैर, बहुत हो गया चुनाव। अब एक महत्वपूर्ण बात और आज की बात खत्म। लोकतंत्र में किसी एक पार्टी या नेता का राज्य के परिदृश्य से उभरकर देश और फिर सभी राज्यों को आसमान की तरह अपने आगोश में बटोरते जाना उनके समर्थकों के लिए भले ही ठीक हो पर आम जनमानस और लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं। अहम आ जाता है फिर जाता है जनता से ही। नमस्ते.... कुछ असहिष्णुता झलक आई हो तो माफी। 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बस इतना चाहते हैं सरकार...

कि आप बोलें, कुछ तो मुंह खोलें
आप हैं जो नहीं बोल रहे
बाकी सब बहुत बोल रहे

सब कह रहे, सब सुन रहे हम
देश को क्या हो गया है
माहौल खराब हो गया है

कोई कह रहा
संघ, शिवसेना वगैरह
हिंदू राष्ट्र के एजेंडे पर बढ़ रही आगे
किसी ने सम्मान लौटाया, तो किसी ने सवाल उठाया

पर हम डिगे नहीं
हमें यकीन है खुद पर देश पर और
सवा अरब भारतीयों की देशभक्ति, भाईचारे पर

फिर भी जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था
इसीलिए आपसे करबद्ध निवेदन है
बस, बहुत हो गया
चुनाव तो जीते-हारे जाते हैं
देश की एकता पर चोट दुस्साहस है
उनका, जो गलत मंशा पाले हैं
इसीलिए हम कह रहे हैं अपना खास हो
या हो सहयोगी
कुछ कार्रवाई तो करिए
लगे, हां सरकार हमारे वैसा नहीं होने देंगे
जैसा कह कुछ लोग डरा और डर रहे हैं

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
हम सब इस देश के हैं और
यह देश हमारा है
अब तो दिखा दो हुजूर
... बस इतना ही चाहते हैं सरकार

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

भावनाओं को समझो

बचपन से ही मैंने अपने घर में भोजन से पहले एक रोटी, थोड़ा चावल, सब्जी, दाल व रायते का भी एक अंश थाली से बाहर निकालने की परंपरा देखी है। पिताजी के भोग लगाने के बाद झट से मेरी या छोटे भाई की ड्यूटी रहती थी कि लो, इसे गऊ माता को खिला के आओ। मैं कम ही तैयार होता क्यूंकि मुझे डर लगता था। दरअसल गाय-भैंस के नजदीक जाने पर अक्सर वे अपनी सिंगों को आपकी तरफ कर देती हैं। इतने में तो मेरे दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। यही नहीं, पिता जी का सख्त निर्देश था कि रोटी हाथ से खिलाई जाएगी, जमीन पर रखकर या हौदे में डालकर नहीं। मुझे डर था कि ‌खिलाते समय गाय मेरी उंगली न चबा ले। एक और महत्वपूर्ण बात का जिक्र करना चाहूंगा। मेरे गांव में एक खास वर्ग के कुछ लोगों को गाय बेचने पर अघोषित पाबंदी थी। हमें डर होता था कि ज्यादा पैसे कमाने के लिए शायद वे जानवरों को कसाई को बेचते थे।

अब बात करते हैं चुनावी मौसम में बीफ विवाद की। जन्म देने वाली मां के अलावा हिंदू धर्म में धरती, गऊ और तुलसी को भी माता का दर्जा हासिल है। तो इस बात में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह तो आस्था की बात है और जहां आस्‍था होती है वहां पत्‍‌थर में भगवान दिखते हैं, काबा में अल्लाह और गिरजाघर में जीसस क्राइस्ट। ऐसे में 5000 साल से चली आ रही सनातन परंपरा को बेहतर तरीके से पेश करना जरूरी है, जिसका अभाव दिखता है। गोमांस के आरोप में नोएडा के एक गांव में एक मुस्लिम व्यक्ति की हत्या को किसी भी तरीके से जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद देशभर में गोमांस की अफवाह या भड़काऊ भाषणों ने ऐसा माहौल तैयार किया, जो भारत की शांतिपूर्ण समभाव वाली संस्कृति के बिल्कुल उलट है। एक तबका खुद को मॉडर्न ख्याल का बताते हुए खुलेआम गोमांस खाने की छूट चाहता है तो दूसरा समूह उनका है जो खुद को हिंदुओं के स्वघोषित लंबरदार और गऊ माता के पालनहार साबित करने में जुटे हैं। इन सबके बीच वो हिंदू नदारद हैं जो बरसों से मुसलमानों के घर ईद की सेवईंया खाते आ रहे हैं और वे मुस्लिम भी नहीं जो हिंदू के घर बड़े शानोशौकत से समारोह में शरीक होते हैं। तो कौन हैं ये लोग? हम क्यों भड़क जाते हैं इनकी बेतुकी बातों से? यह सवाल हिंदुओं ही नहीं मुसलमानों को भी अपने आप से करना चाहिए। अच्छा होता इस जघन्य अपराध के बाद हालात को संभालने का काम किया गया होता पर नहीं, बिसाहड़ा में राजनेताओं की बाढ़ ऐसे आई जैसे जितने ज्यादा नेता आएंगे उतनी जल्दी इकलाख वापस आ जाएगा।

 दरअसल, गोमांस खाने, न खाने का विवाद तो है ही नहीं। विवाद एक दूसरे पर अपनी बात को थोपने का है। कोई अपने घर में क्या खाता है उससे किसी को क्‍या लेना देना लेकिन अगर आप खुलेआम किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए गोमांस खाने की छूट मांगेंगे तो माहौल तो बिगड़ेगा ही। तरह-तरह के तर्क रखे जा रहे हैं। ऋषि-मुनि भी मांस खाते थे, वगैरह-वगैरह। अब जरा अपने दिमाग पर जोर डालिए, ऋषियों के समय क्या दाल-चावल, शाही पनीर, आलू की भुजिया या फिर कोफ्ता का प्रचलन था। अगर नहीं तो खानाबदोश जीवन में लोगों के लिए मांस ही आहार का मुख्य साधन था। लेकिन जब तुलसीदास जैसे ज्ञानियों ने रचनाएं की तो उन्होंने उन घटनाओं को दूर रखा जो उस समय के समाज से मेल न खाती हो पर पहले से चली आ रही हो। इसीलिए वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में भी कुछ अंतर देखने को मिलता है। जैसे-जैसे शास्‍त्र लिखे गए, उनमें सनातन परंपरा का भी उद्धरण पंक्तिबद्ध किया गया। क्या उस दौर और आज के युग की समानता करना उचित है? अगर आपके बगल में कोई परिवार गाय की हर रोज पूजा करता है तो क्या उसे यह बर्दाश्त होगा कि कोई उसी गाय को मार के खा जाए। अब लोग दक्षिण भारत या फिर नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण दे रहे हैं। अरे भैया, जैसा देश वैसा भेष... यहां देश का मतलब वह इलाका है जहां हम रहते हैं।
दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों में गायों को काटा जा रहा है, भारत के हिंदू उन देशों में रोक की मांग करते तो स्वतंत्रता का सवाल बनता। अपने देश में जानवर का मांस ही खाना है तो करीब 30 करोड़ जानवरों की आबादी है एक को छोड़कर खाते रहिए। गोमांस के एक समर्थक ने कहीं लिखा कि गरीबों के लिए जरूरी पोषण का यह मुख्य स्रोत है। हमें ऐसे लोगों की समझ को बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। भाई साब, गाय को मार के खा जाएंगे कितने दिन चलेगा? उसी गाय को घर में पालिए, रोज दूध, दही खाएंगे तो पोषण नहीं मिलेगा क्या? आजकल तो पशुपालन के लिए सरकार लोन भी दे रही है।

खैर, मैं किसी को कुछ भी खाने से रोक नहीं रहा न तो रोक सकता हूं और जिसे रोका नहीं जा सकता उस पर पों पों करना कोरा बकवास है। मेरा जोर बस एक बात पर है कि अगर आस्‍था है तो भावनाएं हैं और भावनाएं हैं तो वो आहत भी हो सकती हैं। हमें इसका ख्याल रखना चाहिए। कुछ लोग डॉ. अंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि ऋगवेद में लिखा है कि उस समय लोग गाय का मांस खाते थे। यानी गाय को पूज्यनीय मानने से पहले ब्राह्मण भी गोमांस से परहेज नहीं करते थे। ठीक बात है, पर ये बताइए उस समय कबायली या खानाबदोश जीवन में मांस के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी था क्या? ये किसी ने न बताया न लिखा।
इकलाख को क्यूं और किसने मारा यह तो जांच में सामने आएगा पर लोगों को भी जागरूक होने की जरूरत है। बिहार चुनाव से ठीक पहले सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने या ध्रुवीकरण की गंदी राजनीति तो नहीं है? इसकी भी जांच होनी चाहिए।

कश्मीर के इंजीनियर रशीद हों या केरल का कोई ब्राह्मण संपादक, अगर आप गाय का मांस खाना चाहते हैं तो बेझिझक खाएं पर इस एहतियात के साथ कि इसी देश में आपके ही मुहल्ले में कुछ लोगों को यह गंवारा नहीं है। स्लॉटर हाउस केवल मुस्लिम भाई के ही हैं ऐसा भी नहीं है। मुद्दा बस एक है भावनाओं को समझो। हमें एक बात और समझनी होगी कि ऐसे वाकये हमारी भाईचारे की पहचान को कलंकित करते हैं। नमस्ते लंदन के उस सीन को याद ‌कीजिए जब अक्षय कुमार कहते हैं कि हम उस देश से आते हैं जहां एक कैथोलिक सिख के लिए पीएम की कुर्सी छोड़ देती है और सिख एक मुस्लिम राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेता है। उस समय हमारा माथा फक्र से ऊंचा हो उठता है।

बेशक आप मेरी बातों की मुखालफत कर सकते हैं। कट्टर, संघी या फिर कुछ और कह सकते हैं अनुरोध बस इतना है कि फिर से ऐसा माहौल बनाइए कि बिसाहड़ा में किसी इशरार के घर कोई अनुराग सेवईं खाने को बेझिझक जाए और श्याम के घर पार्टी में शरीफ भी बेखौफ पहुंचे।